ColorectalCancer – कम उम्र में बढ़ता आंत कैंसर, पेट की सूजन बड़ा कारण
ColorectalCancer – “पेट ठीक तो सेहत ठीक” कहावत अब सिर्फ कहावत नहीं रह गई है। हाल के वर्षों में पाचन तंत्र से जुड़ी बीमारियों के मामलों में तेजी से इजाफा हुआ है, और विशेषज्ञों की चिंता भी उसी अनुपात में बढ़ी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार, कोलोरेक्टल कैंसर दुनिया भर में तीसरा सबसे आम कैंसर है और कैंसर से होने वाली मौतों का दूसरा प्रमुख कारण भी। पहले यह बीमारी मुख्य रूप से 50 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में देखी जाती थी, लेकिन अब कम उम्र के लोगों में भी इसके मामले सामने आ रहे हैं, जो स्वास्थ्य विशेषज्ञों के लिए गंभीर संकेत है।

पेट की आम समस्या से बढ़ता जोखिम
हालिया अध्ययनों में सामने आया है कि आंतों की एक सामान्य लेकिन पुरानी समस्या आगे चलकर गंभीर रूप ले सकती है। शोधकर्ताओं ने पाया कि जिन लोगों को इंफ्लेमेटरी बाउल डिजीज (आईबीडी) रही है, उनमें कोलोरेक्टल कैंसर का खतरा सामान्य लोगों की तुलना में कई गुना अधिक हो सकता है। कुछ मामलों में यह जोखिम 600 प्रतिशत तक बढ़ा हुआ पाया गया है।
आईबीडी पाचन तंत्र में लगातार सूजन की स्थिति है, जो समय के साथ आंतों की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचा सकती है। यही क्षति भविष्य में कैंसर का कारण बन सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय तक अनदेखी की गई सूजन शरीर के भीतर खामोश खतरा पैदा कर सकती है।
किन लक्षणों को नजरअंदाज न करें
डॉक्टरों के अनुसार, बार-बार दस्त या कब्ज की समस्या, पेट में लगातार दर्द या ऐंठन, मल त्याग की आदतों में बदलाव, मल में खून आना, बिना कारण वजन कम होना या अत्यधिक थकान जैसे लक्षणों को हल्के में नहीं लेना चाहिए। ये संकेत आईबीडी के भी हो सकते हैं और आगे चलकर कोलोरेक्टल कैंसर के जोखिम से जुड़े पाए गए हैं।
विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि यदि ये लक्षण लंबे समय तक बने रहें तो चिकित्सकीय जांच कराना जरूरी है। समय रहते पहचान और उपचार से गंभीर जटिलताओं को टाला जा सकता है।
विशेषज्ञों की राय क्या कहती है
ब्रिटेन के किंग्स कॉलेज लंदन की न्यूट्रिशन साइंटिस्ट प्रोफेसर सारा बेरी के अनुसार, आईबीडी के मरीजों में लगातार सूजन कैंसर की संभावना को बढ़ा सकती है। उन्होंने बताया कि क्रोहन रोग और अल्सरेटिव कोलाइटिस जैसी स्थितियां आंतों को लंबे समय तक प्रभावित करती हैं, जिससे कोशिकाओं में असामान्य बदलाव की आशंका रहती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि कम उम्र में कोलोरेक्टल कैंसर के बढ़ते मामलों को गंभीरता से लेने की जरूरत है। आईबीडी से जूझ रहे लोगों की नियमित निगरानी और समय-समय पर जांच बेहद जरूरी है, ताकि शुरुआती चरण में ही किसी भी असामान्यता का पता लगाया जा सके।
भारत में भी बढ़ते मामले
भारत में भी कोलोरेक्टल कैंसर के मामलों में वृद्धि दर्ज की जा रही है। यह देश में पाए जाने वाले शीर्ष पांच कैंसरों में शामिल है। खासकर शहरी इलाकों में इसके अधिक मामले सामने आ रहे हैं। वर्ष 2022 के आंकड़ों के अनुसार, देश में 64 हजार से अधिक नए मामले दर्ज किए गए। इनमें से 15 से 20 प्रतिशत मरीज 50 वर्ष से कम आयु के थे, जो इस बीमारी के बदलते रुझान को दर्शाता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, शुरुआती लक्षण अक्सर साधारण पाचन समस्या जैसे लगते हैं, जिससे लोग उन्हें अनदेखा कर देते हैं। यही लापरवाही आगे चलकर गंभीर स्थिति पैदा कर सकती है।
जीवनशैली भी निभाती है अहम भूमिका
चिकित्सकों का मानना है कि मोटापा, शारीरिक गतिविधि की कमी और अत्यधिक शराब का सेवन इस बीमारी के जोखिम को बढ़ा सकते हैं। इसके अलावा, अत्यधिक प्रोसेस्ड और मीठे खाद्य पदार्थों का सेवन भी पाचन तंत्र पर प्रतिकूल असर डालता है।
स्वस्थ आहार, नियमित व्यायाम और समय-समय पर स्वास्थ्य जांच को कोलोरेक्टल कैंसर की रोकथाम में प्रभावी माना गया है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि यदि परिवार में इस बीमारी का इतिहास हो या आईबीडी जैसी समस्या हो, तो अतिरिक्त सतर्कता बरतनी चाहिए।
समय रहते जागरूकता और सही कदम उठाने से इस गंभीर बीमारी के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।



