Dals and Legumes Digestion Issues: क्या दालें बन रही हैं आपके पेट का दुश्मन, जानिए क्यों प्रोटीन से भरपूर खाना दे रहा है दर्द…
Dals and Legumes Digestion Issues: दाल, राजमा और छोले भारतीय थाली का अभिन्न हिस्सा हैं, जिन्हें हम बचपन से प्रोटीन और फाइबर का सबसे बेहतरीन स्रोत मानते आए हैं। लेकिन आज के समय में एक बड़ी आबादी ऐसी है जो इन पौष्टिक चीजों को खाने के बाद पेट फूलने, भारीपन और गैस जैसी (Common Digestive Problems) समस्याओं से परेशान रहती है। अक्सर लोग इस तकलीफ के कारण अपनी पसंदीदा दालों को ही डाइट से बाहर कर देते हैं, यह सोचकर कि शायद यह उनके शरीर को सूट नहीं करतीं। प्रसिद्ध न्यूट्रिशनिस्ट निकिता बार्डिया के अनुसार, समस्या दाल में नहीं बल्कि आपके शरीर के काम करने के तरीके में छिपी हो सकती है।

दाल को दोष देने से पहले अपनी पाचन शक्ति को परखें
यह समझना बेहद जरूरी है कि दाल, राजमा और छोले स्वभाव से जटिल खाद्य पदार्थ होते हैं जिन्हें तोड़ने के लिए शरीर को काफी मेहनत करनी पड़ती है। जब आपकी (Strong Digestive Fire) या जठराग्नि कमजोर होती है, तो यह जटिल प्रोटीन और फाइबर ठीक से नहीं टूट पाते। इसके परिणामस्वरूप, यह भोजन आपकी आंतों में जाकर फर्मेंट या सड़ने लगता है, जिससे जहरीली गैसें बनती हैं और आपको ब्लोटिंग महसूस होने लगती है। इसलिए दाल को छोड़ने के बजाय अपनी पाचन शक्ति को बढ़ाने पर ध्यान देना अधिक समझदारी भरा फैसला होता है।
भिगोने की प्रक्रिया में लापरवाही पड़ सकती है भारी
दालों और फलियों से होने वाली गैस का सबसे प्रमुख और वैज्ञानिक कारण उन्हें ठीक से न भिगोना है। बिना भिगोए पकाई गई दालों में ‘फाइटिक एसिड’ और अन्य एंटी-पोषक तत्व मौजूद रहते हैं जो (Anti Nutrients in Legumes) पाचन को बहुत मुश्किल बना देते हैं। यह एसिड न केवल आपके पेट में गड़बड़ी पैदा करता है, बल्कि शरीर में महत्वपूर्ण मिनरल्स के अवशोषण को भी रोक देता है। दालों को कम से कम 8 से 12 घंटे तक पानी में भिगोकर रखना न केवल उन्हें नरम बनाता है, बल्कि उनके भीतर मौजूद गैस पैदा करने वाले तत्वों को भी काफी हद तक खत्म कर देता है।
प्रेशर कुकर का अति उपयोग और खोते प्राकृतिक एंजाइम
आधुनिक जीवन की भागदौड़ में हम समय बचाने के लिए दालों को बहुत अधिक प्रेशर कुक करते हैं, जो सेहत के लिहाज से नुकसानदेह हो सकता है। अधिक तापमान और दबाव पर दाल पकाने से उसके (Natural Digestive Enzymes) पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं, जो मूल रूप से पाचन में सहायता करने के लिए होते हैं। दाल को धीमी आंच पर या खुले बर्तन में पकाना हमेशा बेहतर माना जाता है। इसके अलावा, दाल पकाते समय ऊपर आने वाले सफेद झाग को निकाल देना चाहिए, क्योंकि वही झाग अक्सर यूरिक एसिड और गैस की समस्या का मुख्य कारण बनता है।
समय का गलत चुनाव और रात का भारी भोजन
आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान दोनों ही रात के समय भारी भोजन से बचने की सलाह देते हैं। शाम ढलने के बाद हमारा मेटाबॉलिज्म काफी धीमा हो जाता है, जिससे (Nighttime Protein Digestion) की प्रक्रिया सुस्त पड़ जाती है। रात के खाने में राजमा, छोले या उड़द जैसी भारी दालों का सेवन करने से वे पेट में पूरी रात बिना पचे पड़ी रहती हैं। इसके अलावा, अक्सर लोग दाल के साथ कच्चा सलाद या बहुत ज्यादा पनीर जैसी चीजें मिला लेते हैं, जिससे पेट पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है और पाचन तंत्र पूरी तरह चरमरा जाता है।
पेट के कमजोर एसिड की अनदेखी करना है खतरनाक
आमतौर पर लोग सोचते हैं कि सीने में जलन और गैस का कारण ‘ज्यादा एसिड’ बनना है, लेकिन न्यूट्रिशनिस्ट निकिता बार्डिया एक अलग पहलू की ओर इशारा करती हैं। कई मामलों में असल वजह (Low Stomach Acid) या कमजोर हाइड्रोक्लोरिक एसिड होता है। जब पेट में एसिड की मात्रा पर्याप्त नहीं होती, तो प्रोटीन को पचाने वाले एंजाइम सक्रिय नहीं हो पाते और दालें कच्ची अवस्था में ही छोटी आंत में पहुंच जाती हैं। यही कारण है कि स्वस्थ दिखने वाला खाना भी आपके लिए जहर जैसा व्यवहार करने लगता है।
समाधान: दाल को छोड़ें नहीं, पकाने का तरीका बदलें
अगर आप चाहते हैं कि दालें आपकी दोस्त बनी रहें, तो कुछ आसान लेकिन असरदार नियम अपनाएं। हमेशा दाल और छोले को रात भर भिगोएं और उबालने के बाद उस पानी को फेंक दें। खाना बनाते समय (Digestive Spices Benefits) जैसे हींग, अजवाइन, जीरा और सोंठ का भरपूर उपयोग करें, जो गैस को बनने से रोकते हैं। इन भारी प्रोटीनों को हमेशा दोपहर के भोजन में शामिल करें जब आपकी पाचन शक्ति चरम पर होती है। याद रखें, समस्या दाल में नहीं, बल्कि उसे अपनाने के गलत तरीके और आपके कमजोर पाचन तंत्र में है।



