PregnancyNutrition – गर्भावस्था में सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी से बढ़ता खतरा
PregnancyNutrition – मां की कोख में पल रहा शिशु अपनी हर सांस, हर धड़कन और शरीर की हर नई बनती कोशिका के लिए पूरी तरह मां पर निर्भर होता है। गर्भावस्था केवल अधिक भोजन करने का समय नहीं है, बल्कि यह शरीर में जरूरी विटामिन और मिनरल्स के संतुलन का दौर है। अक्सर महिलाएं पर्याप्त कैलोरी तो ले लेती हैं, लेकिन सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी अनदेखी रह जाती है। यही स्थिति ‘छिपी हुई भूख’ का रूप ले लेती है, जो बाहर से दिखाई नहीं देती, लेकिन शिशु के भविष्य पर गहरा असर डाल सकती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि गर्भधारण से पहले और उसके दौरान पोषण की स्थिति आने वाले बच्चे के शारीरिक और मानसिक विकास की नींव तय करती है।

गर्भधारण से पहले पोषण की कमी बनती है जोखिम
स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. श्वेता गर्ग के अनुसार, कई महिलाएं उस समय गर्भधारण करती हैं जब उनके शरीर में पहले से ही आयरन, विटामिन डी या विटामिन बी12 जैसी जरूरी तत्वों की कमी होती है। विश्व स्तर पर एनीमिया महिलाओं में सबसे आम समस्या मानी जाती है। यदि गर्भावस्था की शुरुआत ही पोषण की कमी के साथ हो, तो भ्रूण को पर्याप्त पोषक तत्व नहीं मिल पाते। इसका असर गर्भ में शिशु की वृद्धि की रफ्तार पर पड़ सकता है। शुरुआती महीनों में होने वाला विकास बेहद संवेदनशील होता है, इसलिए उस समय की छोटी कमी भी लंबे समय तक असर छोड़ सकती है।
आयरन, फोलिक एसिड और विटामिन बी12 की अहम भूमिका
आयरन, फोलिक एसिड और विटामिन बी12 लाल रक्त कोशिकाओं के निर्माण में प्रमुख भूमिका निभाते हैं। यही रक्त कोशिकाएं शिशु तक ऑक्सीजन पहुंचाती हैं। आयरन की कमी से मां को एनीमिया और अत्यधिक थकान हो सकती है, जिसका असर गर्भस्थ शिशु पर भी पड़ता है। फोलिक एसिड और विटामिन बी12 विशेष रूप से शुरुआती गर्भावस्था में जरूरी होते हैं, क्योंकि ये शिशु को न्यूरल ट्यूब डिफेक्ट जैसी गंभीर स्थितियों से बचाने में मदद करते हैं। इनकी कमी से दिमाग और तंत्रिका तंत्र के विकास में बाधा आ सकती है, जिससे आगे चलकर सीखने और समझने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।
विटामिन डी और कैल्शियम से मजबूत होती हैं हड्डियां
शिशु की हड्डियों और दांतों के निर्माण में विटामिन डी और कैल्शियम की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यदि मां के शरीर में इनकी कमी हो, तो भ्रूण को पर्याप्त मात्रा नहीं मिल पाती। इससे जन्म के बाद हड्डियों की कमजोरी या विकास में देरी देखी जा सकती है। विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि गर्भावस्था के दौरान विटामिन डी की कमी से मां में गर्भकालीन मधुमेह का खतरा बढ़ सकता है, जो अप्रत्यक्ष रूप से शिशु के स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। संतुलित आहार और आवश्यक जांच इस जोखिम को कम कर सकती है।
ओमेगा-3 और कोलीन से दिमाग का विकास
ओमेगा-3 फैटी एसिड, खासकर डीएचए, शिशु के मस्तिष्क और आंखों के विकास के लिए जरूरी माना जाता है। यह मानसिक क्षमता और देखने की शक्ति को बेहतर बनाने में सहायक होता है। इसी तरह कोलीन भी दिमागी संरचना और याददाश्त से जुड़ा अहम तत्व है। शोध बताते हैं कि गर्भावस्था में इन तत्वों की पर्याप्त मात्रा शिशु की सीखने की क्षमता को मजबूत आधार देती है। यदि आहार में इनकी कमी हो, तो इसका प्रभाव लंबे समय तक महसूस किया जा सकता है।
आयोडीन से संतुलित रहता है तंत्रिका तंत्र
आयोडीन थायरॉयड हार्मोन के निर्माण में जरूरी होता है, जो शिशु के दिमाग और नर्वस सिस्टम के विकास को नियंत्रित करता है। गर्भावस्था के दौरान आयोडीन की कमी से बौद्धिक विकास प्रभावित हो सकता है। कई क्षेत्रों में अब भी आयोडीन की कमी एक सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बनी हुई है। इसलिए संतुलित और आयोडीन युक्त आहार पर विशेष ध्यान देने की सलाह दी जाती है।
जिंक और प्रोटीन से बनती है शरीर की बुनियाद
जिंक कोशिकाओं के निर्माण, प्रतिरक्षा तंत्र और डीएनए संश्लेषण में सहायक होता है। वहीं प्रोटीन को शरीर का निर्माण खंड कहा जाता है, क्योंकि यह ऊतकों और अंगों के विकास के लिए जरूरी है। गर्भावस्था में इनकी कमी से शिशु की वृद्धि प्रभावित हो सकती है। संतुलित भोजन, नियमित जांच और चिकित्सकीय सलाह के साथ इन आवश्यक तत्वों की पूर्ति सुनिश्चित की जा सकती है।
गर्भावस्था का समय केवल वजन बढ़ाने का नहीं, बल्कि सही पोषण चुनने का होता है। समय पर जांच और संतुलित आहार से न केवल मां स्वस्थ रह सकती है, बल्कि शिशु को भी बेहतर शुरुआत मिल सकती है।



