Bangladesh Hindu Minority Safety: नरसिंगदी कांड पर लग गई पारिवारिक झगड़े की मुहर और डरे दब गई हिंदुओं की चीखें
Bangladesh Hindu Minority Safety: बांग्लादेश के नरसिंगदी जिले में हुई एक हिंदू युवक की नृशंस हत्या ने पूरे देश के सामाजिक ताने-बने को हिला कर रख दिया है। जहाँ एक तरफ (minority persecution) की खबरों से अंतरराष्ट्रीय समुदाय चिंतित है, वहीं दूसरी तरफ अंतरिम सरकार ने इसे सांप्रदायिक रंग देने की कोशिशों को सिरे से खारिज कर दिया है। मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस के कार्यालय ने स्पष्ट किया है कि यह कोई लक्षित हमला नहीं, बल्कि एक व्यक्तिगत रंजिश का परिणाम है।

मोहम्मद यूनुस सरकार का प्रोपेगैंडा वाला पलटवार
सरकार की ओर से जारी आधिकारिक बयानों में इस बात पर जोर दिया गया है कि मोनी चक्रवर्ती की मौत को गलत तरीके से पेश किया गया। यूनुस के सहायक प्रेस सचिव फोयेज अहमद ने दावा किया कि (religious violence in Bangladesh) से जुड़ी खबरें अक्सर बिना जांच-पड़ताल के फैलाई जाती हैं। सरकार का मानना है कि इस हत्या के पीछे सिर्फ और सिर्फ व्यापारिक रंजिश और घरेलू विवाद थे, जिसे बाहरी तत्वों ने तूल दिया।
पुलिसिया जांच और ‘पुरानी रंजिश’ का नया एंगल
अधिकारियों का कहना है कि पुलिस की शुरुआती जांच में कुछ ऐसे सुराग मिले हैं जो इस घटना को सांप्रदायिक हमलों की श्रेणी से अलग करते हैं। सरकारी तंत्र ने इसे (family dispute investigation) का हिस्सा बताया है और कहा है कि पीड़ित के हिंदू होने की वजह से ही कुछ लोग इसे मजहबी उन्माद के रूप में प्रचारित कर रहे हैं। हालांकि, स्थानीय निवासियों और पीड़ित के करीबियों के बीच इस दलील को लेकर भारी संशय बना हुआ है।
क्या सांप्रदायिक सद्भाव के नाम पर दबाया जा रहा है सच?
प्रेस सचिव फोयेज अहमद ने चेतावनी दी है कि गलत सूचनाओं के प्रसार से समाज की एकता को अपूरणीय क्षति पहुंच सकती है। उनका तर्क है कि (communal harmony) को बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि किसी भी बयान को देने से पहले तथ्यों की धरातल पर जांच की जाए। सरकार का आरोप है कि कुछ ताकतें जानबूझकर बांग्लादेश की अंतरिम सरकार की छवि खराब करने के लिए ऐसे उकसावे वाले नैरेटिव गढ़ रही हैं।
बेखौफ कातिल और एक मासूम किराना दुकानदार का अंत
नरसिंगदी के चारसिंदूर बाजार में मोनी चक्रवर्ती की हत्या जिस क्रूरता के साथ की गई, उसने सुरक्षा व्यवस्था पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। जब वह रात को अपनी दुकान बंद कर घर लौट रहे थे, तब (brutal murder) को अंजाम देने वाले हमलावरों ने उन पर धारदार हथियारों से वार किया। 40 वर्षीय मोनी की मौके पर ही मौत हो गई, जिससे पूरे बाजार में दहशत का माहौल व्याप्त हो गया और लोग अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित हो उठे।
दोस्त की गवाही और सरकार के दावों में विरोधाभास
मोनी चक्रवर्ती के करीबी मित्र राजेंद्र चौहान की बातें सरकार की ‘रंजिश’ वाली थ्योरी पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह लगाती हैं। राजेंद्र ने नम आंखों से बताया कि (human rights violation) जैसी क्रूरता के शिकार हुए मोनी इतने सरल स्वभाव के व्यक्ति थे कि उनका किसी से कोई विवाद होना नामुमकिन था। उनके अनुसार, मोनी का कोई ज्ञात दुश्मन नहीं था, जिससे इस हत्या के पीछे की असल मंशा को लेकर रहस्य और गहरा गया है।
डर के साये में जीने को मजबूर अल्पसंख्यक समुदाय
आज नरसिंगदी के अल्पसंख्यकों के मन में जो सबसे बड़ा सवाल है, वह यह कि क्या उनकी जान की कोई कीमत नहीं है? राजेंद्र चौहान का कहना है कि इस समय (minority community fear) इतना अधिक है कि उनके पास सच बोलने की हिम्मत तक नहीं बची है। जब समाज का एक सम्मानित व्यक्ति अपने घर लौटते समय मार दिया जाता है, तो न्याय की उम्मीद करना और सरकार की ‘पारिवारिक झगड़े’ वाली बात पर भरोसा करना मुश्किल हो जाता है।
भारत की पैनी नजर और अंतरिम सरकार की जिम्मेदारी
बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ बढ़ती हिंसा की घटनाओं ने पड़ोसी देश भारत को भी विचलित कर दिया है। भारत सरकार ने इस मामले में (diplomatic pressure) का इस्तेमाल करते हुए अंतरिम सरकार से हिंदुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने का कड़ा आग्रह किया है। यह देखना दिलचस्प होगा कि मोहम्मद यूनुस की सरकार आने वाले समय में इन हत्याओं को रोकने के लिए सिर्फ बयानों का सहारा लेती है या कोई ठोस कदम भी उठाती है।
तथ्य बनाम प्रोपेगैंडा: एक अनसुलझी पहेली
अंततः, मोनी चक्रवर्ती की मौत का सच क्या है, यह अब फाइलों और राजनीतिक बयानों के बीच कहीं दब गया है। सरकार इसे (social stability) के लिए खतरा मानकर सच से किनारा कर रही है या वाकई यह एक निजी दुश्मनी थी, इसका फैसला होना अभी बाकी है। लेकिन इतना तय है कि इस घटना ने बांग्लादेश के लोकतंत्र और वहां रह रहे अल्पसंख्यकों के भविष्य पर एक गंभीर बहस छेड़ दी है।



