ElectionReform – ट्रंप ने कांग्रेस से मतदान नियमों में व्यापक सख्ती की मांग की
ElectionReform – अमेरिका में चुनावी प्रक्रिया को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गुरुवार को अपने तीखे बयान में अमेरिकी मतदान व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाते हुए इसे “अव्यवस्थित और भरोसे के लायक नहीं” बताया। ट्रंप ने दावा किया कि मौजूदा प्रणाली में व्यापक खामियां हैं, जिनके कारण चुनावों की विश्वसनीयता पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी संदेह जताया जा रहा है। यह पहली बार नहीं है जब उन्होंने मतदान प्रक्रिया पर नाराजगी जताई हो, लेकिन इस बार उनके स्वर पहले से अधिक आक्रामक और राजनीतिक रूप से निर्णायक दिखे। उनके बयानों ने न केवल वाशिंगटन बल्कि पूरे देश में नई चर्चा छेड़ दी है कि क्या चुनावी सुधार वास्तव में जरूरी हैं या यह महज राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है।

सेव अमेरिका एक्ट पर ट्रंप का जोर
ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया मंच ट्रुथ सोशल पर पोस्ट करते हुए रिपब्लिकन नेताओं से तथाकथित सेव अमेरिका एक्ट का समर्थन करने की अपील की। उनके अनुसार यह विधेयक चुनावी प्रणाली को “पारदर्शी और निष्पक्ष” बनाने के लिए आवश्यक है। व्हाइट हाउस ने भी बयान जारी कर पुष्टि की कि राष्ट्रपति चाहते हैं कि कांग्रेस जल्द से जल्द सेफगार्ड अमेरिकन वोटर एलिजिबिलिटी एक्ट को मंजूरी दे। इस विधेयक के तहत मतदाता पंजीकरण और पात्रता संबंधी नियमों को और सख्त बनाने का प्रस्ताव है, जिससे केवल योग्य नागरिक ही मतदान में भाग ले सकें। प्रशासन का तर्क है कि इससे चुनावी धोखाधड़ी की संभावनाएं कम होंगी और प्रक्रिया में जनता का भरोसा बढ़ेगा।
प्रस्तावित बदलावों की रूपरेखा
राष्ट्रपति ट्रंप ने कांग्रेस में रिपब्लिकन सांसदों से सीधे अपील करते हुए कहा कि यदि यह कानून पारित हो जाता है तो इससे पूरी चुनावी व्यवस्था “सुधर जाएगी।” उन्होंने चेतावनी भरे अंदाज में कहा कि यदि सुधार नहीं हुए तो देश की लोकतांत्रिक संरचना खतरे में पड़ सकती है। उनके प्रस्तावों में अनिवार्य वोटर आईडी, मतदाता पंजीकरण के लिए अमेरिकी नागरिकता का ठोस प्रमाण और मेल-इन बैलेट प्रणाली पर कड़े प्रतिबंध शामिल हैं। समर्थकों का मानना है कि ये कदम चुनावी पारदर्शिता बढ़ाएंगे, जबकि आलोचकों का कहना है कि इससे कई पात्र मतदाता मतदान से वंचित हो सकते हैं।
व्हाइट हाउस का बचाव
व्हाइट हाउस की प्रवक्ता कैरोलीन लैविट ने इस विधेयक का बचाव करते हुए कहा कि यह “सामान्य समझ पर आधारित नीतियों” पर टिका है और देश के लगभग 89 प्रतिशत लोग ऐसे उपायों का समर्थन करते हैं। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि मार्च 2025 में ट्रंप पहले ही एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर कर चुके हैं, जिसका उद्देश्य चुनावी नियमों को कड़ा बनाना था। इस आदेश में विदेशी हस्तक्षेप रोकने और मतदाताओं की नागरिकता की सघन जांच जैसे प्रावधान शामिल थे। प्रशासन का कहना है कि ये कदम राष्ट्रीय सुरक्षा और लोकतांत्रिक अखंडता के लिए जरूरी हैं।
राजनीतिक टकराव गहराया
हालांकि, सेव अमेरिका एक्ट को कड़े विरोध का सामना करना पड़ रहा है। डेमोक्रेटिक सांसदों का आरोप है कि ट्रंप मध्यावधि चुनावों से पहले चुनावी प्रक्रिया को राष्ट्रीय स्तर पर अपने नियंत्रण में लेने की कोशिश कर रहे हैं। उनका कहना है कि यह राज्यों के अधिकारों में हस्तक्षेप है, क्योंकि अमेरिका में चुनाव संचालन मुख्य रूप से राज्य सरकारों के अधीन आता है। ट्रंप ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि कई राज्यों में मतदान प्रणाली “भ्रष्ट” हो चुकी है और इसे सुधारना अनिवार्य है। उन्होंने रिपब्लिकनों से कम से कम 15 प्रमुख क्षेत्रों में चुनावी प्रक्रियाओं पर अधिक नियंत्रण की मांग की, हालांकि उन्होंने सभी क्षेत्रों का स्पष्ट विवरण नहीं दिया।
डेमोक्रेट्स की कड़ी प्रतिक्रिया
डेमोक्रेटिक पार्टी ने इस विधेयक के खिलाफ एकजुट रुख अपनाया है। सीनेट में डेमोक्रेटिक अल्पसंख्यक नेता चक शूमर ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि उनकी पार्टी इस तरह के किसी भी विधेयक के पक्ष में मतदान नहीं करेगी। उनके अनुसार यह कानून मताधिकार को सीमित करने और लोकतांत्रिक भागीदारी को कमजोर करने का प्रयास है। शूमर ने कहा कि चुनावी सुधार जरूरी हो सकते हैं, लेकिन उन्हें समावेशी और निष्पक्ष तरीके से लागू किया जाना चाहिए, न कि राजनीतिक लाभ के लिए।
आगे की राह
फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि सेव अमेरिका एक्ट कांग्रेस में पारित हो पाएगा या नहीं। रिपब्लिकन पार्टी के भीतर भी इस पर मतभेद हैं, जबकि डेमोक्रेट्स का विरोध इसे और जटिल बना रहा है। आने वाले महीनों में यह मुद्दा अमेरिकी राजनीति में प्रमुख केंद्र बिंदु बना रहेगा, क्योंकि यह न केवल चुनावी नियमों बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों से भी जुड़ा है।



