Saudi UAE Conflict 2025: जब अपनों पर ही बरसे सऊदी अरब के बम, क्या अब यूएई और सऊदी के बीच छिड़ेगी सीधी जंग…
Saudi UAE Conflict 2025: मिडिल ईस्ट की राजनीति में मंगलवार को एक ऐसा मोड़ आया जिसने पूरी दुनिया को सन्न कर दिया है। सऊदी अरब के नेतृत्व वाली गठबंधन सेना ने यमन के मुकल्ला शहर पर भीषण हवाई हमले किए, लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि इस बार निशाने पर दुश्मन हूती विद्रोही नहीं थे। सऊदी अरब ने अपने ही सबसे करीबी सहयोगी संयुक्त अरब अमीरात (UAE) द्वारा कथित तौर पर भेजे गए हथियारों के जखीरे को मलबे में तब्दील कर दिया। इस (military escalation) ने दशकों पुरानी दोस्ती में ऐसी दरार डाल दी है, जिसकी भरपाई करना फिलहाल नामुमकिन नजर आ रहा है।

मुकल्ला बंदरगाह पर आधी रात का एक्शन
सऊदी अरब का दावा है कि यूएई के फुजैराह बंदरगाह से दो संदिग्ध जहाज बिना किसी पूर्व सूचना या अनुमति के मुकल्ला पहुंचे थे। रियाद के खुफिया तंत्र के अनुसार, इन जहाजों ने अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन करते हुए अपना ट्रैकिंग सिस्टम बंद कर दिया था। सऊदी अरब ने आरोप लगाया कि (arms shipment) के जरिए साउदर्न ट्रांजिशनल काउंसिल (STC) के अलगाववादियों को घातक हथियार और बख्तरबंद गाड़ियां सप्लाई की जा रही थीं। जैसे ही ये जहाज मुकल्ला पहुंचे, सऊदी जेट विमानों ने आसमान से आग बरसाकर पूरे जखीरे को नेस्तनाबूद कर दिया।
सुरक्षा समझौता रद्द और 24 घंटे का अल्टीमेटम
इस हमले के फौरन बाद यमन की राजनीति में भी बड़ा उलटफेर देखने को मिला। सऊदी समर्थित यमन की राष्ट्रपति परिषद (PLC) ने यूएई के साथ हुए अपने तमाम सुरक्षा समझौतों को तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया। इतना ही नहीं, परिषद ने (ultimatum to UAE) जारी करते हुए अमीरात की सेना को महज 24 घंटे के भीतर यमन की सरजमीं छोड़ने का आदेश दे दिया है। यमन की वैध सरकार का यह कड़ा रुख स्पष्ट करता है कि अब वे यूएई को एक रक्षक नहीं, बल्कि अपनी संप्रभुता के लिए खतरा मान रहे हैं।
सऊदी अरब की ‘रेड लाइन’ और तेल का खेल
सऊदी अरब के लिए अपने पड़ोस में अलगाववादियों का मजबूत होना एक ऐसी ‘रेड लाइन’ थी, जिसे पार करना उसे मंजूर नहीं था। दरअसल, यूएई समर्थित एसटीसी विद्रोहियों ने हाल ही में यमन के तेल समृद्ध प्रांतों हदरमौत और महरा पर नियंत्रण हासिल कर लिया है। ये इलाके (strategic border) के लिहाज से सऊदी अरब और ओमान के लिए बेहद संवेदनशील हैं। रियाद का मानना है कि यूएई इन अलगाववादियों को हथियार देकर यमन के बंटवारे की साजिश रच रहा है, जो सऊदी अरब की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सीधा खतरा है।
यूएई की सफाई और सेना वापसी का ऐलान
दूसरी ओर, अबू धाबी ने सऊदी अरब के इन तमाम गंभीर आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। यूएई के विदेश मंत्रालय ने आधिकारिक बयान जारी कर कहा कि जहाजों में कोई हथियार नहीं थे, बल्कि वे वाहन थे जो वहां मौजूद यूएई की (anti-terror unit) के इस्तेमाल के लिए भेजे गए थे। यूएई ने स्पष्ट किया कि वह सऊदी अरब को अस्थिर करने वाली किसी भी गतिविधि का समर्थन नहीं करता है। हालांकि, बढ़ते तनाव को देखते हुए यूएई ने यमन से अपनी बची हुई सेना को वापस बुलाने की घोषणा कर दी है, ताकि सीधे सैन्य टकराव से बचा जा सके।
इजरायल कनेक्शन और लाल सागर की सियासत
मिडिल ईस्ट के रणनीतिकारों का मानना है कि इस विवाद के तार बहुत गहरे हैं और इसका एक ‘इजरायल कनेक्शन’ भी सामने आ रहा है। अब्राहम समझौते के बाद यूएई और इजरायल के संबंध काफी प्रगाढ़ हुए हैं। ऐसी चर्चाएं हैं कि इजरायल (independent state) के रूप में दक्षिण यमन को मान्यता देने पर विचार कर रहा है, ताकि लाल सागर और बाब अल-मंडेब जैसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों पर अपनी पकड़ मजबूत कर सके। सऊदी अरब एक अखंड यमन का पक्षधर है, जबकि यूएई का झुकाव दक्षिण यमन की आजादी चाहने वाले गुटों की तरफ साफ नजर आ रहा है।
वैश्विक बाजार और ऊर्जा संकट का डर
खाड़ी के इन दो दिग्गज देशों के बीच बढ़ती तल्खी का असर तुरंत आर्थिक जगत पर भी देखने को मिला। खबर सार्वजनिक होते ही खाड़ी देशों के (stock market crash) की खबरें आने लगीं। निवेशकों को डर है कि अगर दुनिया के दो सबसे बड़े तेल उत्पादक देश आपस में भिड़ते हैं, तो इसका सीधा असर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ेगा। क्षेत्रीय अस्थिरता का यह नया दौर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा खतरा साबित हो सकता है।
कूटनीति की विफलता और युद्ध की आहट
सऊदी अरब और यूएई के बीच का यह मतभेद अब महज जुबानी जंग नहीं रह गया है, बल्कि यह सीधे सैन्य प्रहार में बदल चुका है। कूटनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यदि (diplomatic mediation) के जरिए इस विवाद को तुरंत नहीं सुलझाया गया, तो मिडिल ईस्ट एक नए और भीषण युद्ध की आग में झुलस सकता है। ओमान और अन्य पड़ोसी देश इस तनाव को कम करने की कोशिशों में जुटे हैं, लेकिन रियाद और अबू धाबी के बीच अविश्वास की खाई अब बहुत गहरी हो चुकी है।



