Secret US Russia Pakistan Nuclear Documents: विनाश की दहलीज पर खड़ा है पाकिस्तान, बुश और पुतिन की सीक्रेट फाइल्स ने खोला बड़ा राज
Secret US Russia Pakistan Nuclear Documents: पाकिस्तान के परमाणु हथियारों को लेकर पश्चिमी देशों और रूस की चिंताएं केवल कयास नहीं, बल्कि एक कड़वी हकीकत रही हैं। हाल ही में अमेरिकी नेशनल सिक्योरिटी आर्काइव द्वारा सार्वजनिक की गई गोपनीय जानकारी ने दुनिया को चौंका दिया है। इन दस्तावेजों में (Global Nuclear Proliferation Risks) को लेकर 2001 से 2008 के बीच रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश के बीच हुई निजी बातचीत का ब्योरा दिया गया है। यह खुलासा साबित करता है कि बंद कमरों में दुनिया की दो सबसे बड़ी महाशक्तियां पाकिस्तान की परमाणु अस्थिरता को लेकर कितनी भयावह आशंकाओं से घिरी हुई थीं।

पुतिन की नजर में पाकिस्तान एक परमाणु संपन्न सैन्य जुंटा
जून 2001 में स्लोवेनिया में हुई पहली मुलाकात के दौरान ही व्लादिमीर पुतिन ने पाकिस्तान के प्रति अपना कड़ा रुख साफ कर दिया था। पुतिन ने पाकिस्तान की आलोचना करते हुए उसे एक (Military Junta Nuclear State) के रूप में परिभाषित किया था। रूस के राष्ट्रपति इस बात से बेहद नाराज थे कि पश्चिमी देश पाकिस्तान पर लोकतंत्र के लिए दबाव बनाने में पूरी तरह नाकाम रहे। उनके अनुसार, एक ऐसा देश जहां सेना का शासन हो और जिसके पास परमाणु बम की शक्ति हो, वह पूरी मानवता के लिए एक अस्थिर और खतरनाक मिश्रण है।
बुश और पुतिन के बीच ए.क्यू. खान का खौफ
जिस समय बुश और पुतिन के बीच यह गुप्त संवाद चल रहा था, उस समय दुनिया पाकिस्तान के परमाणु जनक ए.क्यू. खान की गतिविधियों से अनजान थी। हालांकि, इन दोनों नेताओं को अंदेशा था कि (Nuclear Technology Black Market) के जरिए पाकिस्तान अपने परमाणु डिजाइन को दुनिया के अन्य देशों को बेच रहा है। पुतिन और बुश दोनों ही परमाणु शक्ति के इस अवैध प्रसार के खिलाफ थे, लेकिन कूटनीतिक मजबूरियों के कारण वे सार्वजनिक रूप से उस समय पाकिस्तान के खिलाफ कोई बड़ा कदम नहीं उठा पा रहे थे।
ईरान और पाकिस्तान के बीच ‘परमाणु सांठगांठ’ का सच
सार्वजनिक किए गए दस्तावेजों में सबसे चौंकाने वाला हिस्सा ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़ा है। पुतिन ने बुश से बातचीत के दौरान स्पष्ट कहा था कि ईरान के पास प्रयोगशालाओं में क्या है, यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं है, लेकिन उनका (Iran Pakistan Nuclear Cooperation) काफी गहरा और चिंताजनक है। पुतिन ने यह तक दावा किया कि ईरान के सेंट्रीफ्यूज में पाकिस्तानी मूल का यूरेनियम मिला है, जिसने आईएईए (IAEA) के नियमों का सरेआम उल्लंघन किया था। यह जानकारी उस समय के अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मानकों के लिए एक बड़ा झटका थी।
मुशर्रफ की भूमिका पर राष्ट्रपति बुश का संदेह
अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने बातचीत में स्वीकार किया था कि उन्होंने पाकिस्तानी जनरल परवेज मुशर्रफ से इस बारे में सीधी बात की थी। बुश ने मुशर्रफ को आगाह किया था कि (Nuclear Proliferation Monitoring) के तहत ईरान और उत्तर कोरिया को परमाणु तकनीक का हस्तांतरण अमेरिका के लिए बर्दाश्त से बाहर है। बुश का मानना था कि मुशर्रफ या तो सच नहीं जानते या फिर जानबूझकर पूरी जानकारी छिपा रहे हैं। ए.क्यू. खान को हाउस अरेस्ट में रखना केवल दुनिया की आंखों में धूल झोंकने जैसा था, जबकि परमाणु तस्करी का जाल बहुत गहरा था।
धार्मिक उन्मादियों के हाथ में परमाणु बम का डर
बातचीत के दौरान पुतिन और बुश दोनों ने ही इस बात पर सहमति जताई थी कि पाकिस्तान और ईरान जैसे देशों में परमाणु शक्ति का होना खतरनाक है। बुश ने स्पष्ट कहा था कि उन्हें (Religious Extremist Nuclear Threat) से सबसे ज्यादा डर लगता है। ईरान में धार्मिक कट्टरपंथियों का शासन और पाकिस्तान में अस्थिर सैन्य सत्ता के बीच परमाणु बमों का होना एक ऐसी तबाही को न्योता देना था, जिसे रोक पाना शायद किसी के बस में नहीं होता। पुतिन ने भी जोर देकर कहा था कि पाकिस्तान की परमाणु तकनीक का प्रसार रूस के लिए भी एक बड़ा सिरदर्द है।
भारत की चेतावनी और अमेरिका की दोहरी नीति
पाकिस्तान के परमाणु खतरे को लेकर भारत दशकों से वैश्विक मंचों पर आवाज उठाता रहा है। लेकिन, विडंबना यह रही कि अमेरिका ने (Geopolitical Strategic Partnership) के नाम पर हमेशा पाकिस्तान की गलतियों को नजरअंदाज किया। 9/11 के बाद अफगानिस्तान में आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई के लिए अमेरिका को पाकिस्तान की जरूरत थी, इसलिए वाशिंगटन ने इस्लामाबाद के हजारों गुनाहों पर पर्दा डाला। भारत की चेतावनियों को उस समय वैश्विक राजनीति की भेंट चढ़ा दिया गया, जबकि आज वही सच दस्तावेजों के रूप में दुनिया के सामने है।
बाइडन प्रशासन और पाकिस्तान के बदलते रिश्ते
जैसे ही बाइडन प्रशासन के दौरान अमेरिकी सैनिक अफगानिस्तान से बाहर निकले, वाशिंगटन में पाकिस्तान की अहमियत घटने लगी। एक समय ऐसा भी आया जब खबरें उठीं कि जो बाइडन ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री का फोन तक उठाना बंद कर दिया था। हालांकि, (International Diplomatic Shifts) ने एक बार फिर करवट ली और अपनी आर्थिक बदहाली और सुरक्षा जरूरतों के कारण पाकिस्तान फिर से अमेरिका के करीब जाने की कोशिश कर रहा है। राजनीति के इस चक्र ने पाकिस्तान को एक बार फिर महाशक्तियों की गोटी बना दिया है।
वैश्विक सुरक्षा के लिए पाकिस्तान आज भी एक पहेली
पुतिन और बुश के बीच की यह ऐतिहासिक बातचीत आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी दो दशक पहले थी। पाकिस्तान की परमाणु संपदा की सुरक्षा पर (Global Nuclear Security Standards) के तहत आज भी सवाल उठ रहे हैं। क्या पाकिस्तान के परमाणु हथियार वाकई सुरक्षित हाथों में हैं या फिर किसी तख्तापलट की स्थिति में ये कट्टरपंथियों के हाथ लग सकते हैं? यह एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब आज भी दुनिया की खुफिया एजेंसियां ढूंढ रही हैं। बुश और पुतिन के ये दस्तावेज केवल इतिहास नहीं, बल्कि भविष्य के लिए एक बड़ी चेतावनी हैं।



