Jharkhand Municipal Election 2026: इस बार प्रत्याशियों ने खर्च की सीमा लांघी तो कुर्सी के साथ करियर भी होगा स्वाहा…
Jharkhand Municipal Election 2026: झारखंड में नगर निकाय चुनाव की सुगबुगाहट तेज होते ही राज्य निर्वाचन आयोग पूरी तरह एक्शन मोड में नजर आ रहा है। चुनावी मैदान में उतरने वाले दिग्गजों के लिए आयोग ने सख्त नियम कायदे जारी कर दिए हैं, ताकि धनबल के बेजा इस्तेमाल पर लगाम लगाई जा सके। आयोग ने (Election Expenditure Limit) को अंतिम रूप देते हुए स्पष्ट कर दिया है कि किस पद के लिए कितनी रकम खर्च की जा सकती है। अब प्रत्याशियों को अपने प्रचार अभियान के दौरान एक-एक पैसे का हिसाब डायरी में नोट करना होगा।

आबादी के हिसाब से तय हुआ खर्च का कोटा
झारखंड निर्वाचन आयोग ने राज्य के नगर निकायों को उनकी जनसंख्या के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में विभाजित किया है। सबसे महत्वपूर्ण घोषणा दस लाख से अधिक आबादी वाले नगर निगमों के लिए की गई है, जहां मेयर पद के प्रत्याशी अधिकतम 25 लाख रुपये खर्च कर पाएंगे। वहीं, इसी श्रेणी में पार्षद पद के उम्मीदवारों के लिए (Candidate Spending Cap) को पांच लाख रुपये तक सीमित रखा गया है। यह व्यवस्था इसलिए की गई है ताकि बड़े और छोटे क्षेत्रों के बीच चुनावी संसाधनों का संतुलन बना रहे।
नगर परिषद और पंचायतों के लिए अलग नियम
सिर्फ बड़े नगर निगम ही नहीं, बल्कि नगर परिषद और नगर पंचायतों के लिए भी खर्च की अलग-अलग सीमाएं तय की गई हैं। आयोग का मानना है कि (Local Body Elections) में अक्सर स्थानीय स्तर पर अनाप-शनाप खर्च देखने को मिलता है, जिसे रोकना अनिवार्य है। प्रत्येक श्रेणी के उम्मीदवार को नामांकन के समय से लेकर परिणाम आने तक के खर्च का पूरा विवरण सुरक्षित रखना होगा। इन नियमों का पालन करना हर प्रत्याशी के लिए कानूनी बाध्यता बना दी गई है।
हिसाब देने में देरी पड़ सकती है बहुत भारी
चुनाव खत्म होने के बाद असली परीक्षा शुरू होगी, जब प्रत्याशियों को अपने खर्च का ब्यौरा सरकारी दफ्तर में जमा करना होगा। आयोग के निर्देशानुसार, चुनाव संपन्न होने के ठीक 30 दिनों के भीतर सभी उम्मीदवारों को अपने संबंधित रिटर्निंग ऑफिसर को हिसाब देना अनिवार्य है। यदि कोई (Electoral Accountability) से बचने की कोशिश करता है या समय सीमा के भीतर दस्तावेज पेश नहीं करता, तो आयोग उसके खिलाफ बेहद कड़ा रुख अख्तियार करने के लिए तैयार है।
सदस्यता रद्द होने के साथ लगेगा तीन साल का बैन
झारखंड निर्वाचन आयोग ने इस बार नियमों को पहले से कहीं ज्यादा सख्त बना दिया है। यदि कोई जीता हुआ उम्मीदवार 30 दिनों के भीतर चुनावी खर्च का ब्यौरा देने में विफल रहता है, तो न केवल उसकी सदस्यता तत्काल प्रभाव से रद्द कर दी जाएगी, बल्कि उसे अगले तीन साल तक किसी भी (Disqualification Rule) के तहत चुनाव लड़ने से रोक दिया जाएगा। यह प्रावधान उन लोगों के लिए एक बड़ी चेतावनी है जो चुनाव जीतने के बाद प्रशासनिक नियमों को हल्के में लेने की भूल करते हैं।
झंडा और बैनर लगाने के लिए लेनी होगी लिखित इजाजत
प्रचार सामग्री को लेकर भी आयोग ने स्पष्ट गाइडलाइंस जारी की हैं ताकि सरकारी संपत्तियों को नुकसान न पहुंचे। किसी भी सरकारी भवन या खंभे पर झंडा-बैनर लगाना अब एफआईआर का कारण बन सकता है। इसके अलावा, यदि कोई प्रत्याशी किसी निजी मकान पर अपना प्रचार करना चाहता है, तो उसे (Campaign Regulation) का पालन करते हुए भवन मालिक से लिखित सहमति पत्र लेना होगा। बिना अनुमति के किसी के घर की दीवार पर पोस्टर चिपकाना अब भारी पड़ सकता है।
निर्वाचन अभिकर्ता की होगी बड़ी जिम्मेदारी
चुनाव की भागदौड़ में प्रत्याशी अक्सर खर्च का हिसाब भूल जाते हैं, इसलिए आयोग ने निर्वाचन अभिकर्ताओं की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया है। प्रत्याशी द्वारा नियुक्त किया गया एजेंट ही चुनावी खर्च के हर वाउचर और रसीद के लिए जिम्मेदार होगा। यह (Financial Monitoring) सुनिश्चित करेगी कि चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता बनी रहे और किसी भी स्तर पर भ्रष्टाचार की गुंजाइश न हो। आयोग की टीमें भी गुप्त रूप से उम्मीदवारों के खर्च पर नजर रखेंगी।
पारदर्शी चुनाव के लिए निर्वाचन आयोग का संकल्प
झारखंड में नगर निकाय चुनाव को लोकतंत्र के उत्सव के रूप में मनाने की तैयारी है, जहां हर नागरिक को निष्पक्ष तरीके से अपना प्रतिनिधि चुनने का मौका मिले। निर्वाचन आयोग का यह (Transparency in Elections) सुनिश्चित करने का प्रयास काबिले तारीफ है। इन कड़े नियमों से न केवल चुनावी खर्च में कमी आएगी, बल्कि ईमानदार और कर्मठ प्रत्याशियों को भी बराबरी का मौका मिलेगा, जो भारी-भरकम बजट के अभाव में पिछड़ जाते थे।



