झारखण्ड

Political Promise Clash: झारखंड विधानसभा में गूंजा दर्द-ए-गीत, विपक्ष ने सरकार से पूछा- वादा तेरा वादा…

Political Promise Clash: झारखंड विधानसभा के शीतकालीन सत्र के अंतिम दिन कार्यवाही शुरू होने से पहले ही सदन के बाहर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जबरदस्त राजनीतिक टकराव देखने को मिला (politics)। दोनों ओर से वादाखिलाफी के आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए और माहौल कुछ ही मिनटों में गर्म हो गया। सत्ता हो या विपक्ष—हर किसी की जुबान पर एक ही सवाल था, “वादा… तेरा वादा… कहां गया वादा?” यह दृश्य दर्शाता है कि राज्य की राजनीति में चुनावी वादों को लेकर नाराजगी और उतावली दोनों तेजी से बढ़ रही है।

Political Promise Clash
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‘वादा तेरा वादा’—राजनीतिक माहौल में गूंज रहा नाराजगी का सुर

सदन के बाहर नेताओं द्वारा दोहराए जा रहे इस एक ही सवाल ने राजनीतिक हवा में एक नया तनाव पैदा कर दिया (debate)। सत्ता पक्ष के नेताओं का कहना था कि विपक्ष बिना वजह राज्य सरकार पर आरोप लगाता है, जबकि खुद केंद्र सरकार अपनी ही कही बातों पर नहीं टिक पा रही। दूसरी ओर विपक्ष लगातार यही पूछ रहा था कि “झारखंड की जनता से किए गए वादों का क्या हुआ?” दोनों पक्षों की इस तीखी नोकझोंक ने विधानसभा की शांत सुबह को अचानक गरमा दिया।


कांग्रेस विधायक ने केंद्र पर साधा जोरदार निशाना

सत्ता पक्ष की ओर से कांग्रेस विधायक सुरेश पासवान ने केंद्र सरकार पर वादाखिलाफी का सीधा आरोप लगाया (criticism)। उन्होंने कहा कि भाजपा ने चुनाव अभियान के दौरान बड़े-बड़े दावे किए थे, जिनमें से कई आज भी अधूरे हैं। पासवान ने प्रधानमंत्री द्वारा लोकसभा चुनावों के समय किए गए “खातों में पैसा भेजने” के बयान का उल्लेख करते हुए सवाल उठाया—“कहां गया उनका वादा?” उन्होंने कहा कि विपक्ष राज्य सरकार पर आरोप लगाने से पहले केंद्र सरकार की जवाबदेही तय करे।


केंद्र के वादों की याद दिलाते हुए सत्ता पक्ष का पलटवार

पासवान ने आगे कहा कि भाजपा नेताओं को अपने ही नेताओं द्वारा किए गए घोषणाओं को याद करना चाहिए (accountability)। उन्होंने कहा कि जनता अब सिर्फ भाषणों और आश्वासनों से संतुष्ट नहीं होती; उसे परिणाम चाहिए। सत्ता पक्ष का मानना है कि केंद्र द्वारा घोषित कई योजनाओं पर अपेक्षित गति से काम नहीं हुआ, जिससे झारखंड सहित कई राज्यों में विकास कार्य धीमे पड़ गए।


विपक्ष की नीरा यादव ने भी दिखाया कड़ा तेवर

उधर विपक्ष की ओर से भाजपा विधायक नीरा यादव भी बेहद आक्रामक अंदाज में सामने आईं (opposition)। उन्होंने कहा कि केंद्र पर आरोप लगाने से पहले सत्ता पक्ष को यह देखना चाहिए कि राज्य सरकार ने अपने वादों का क्या किया। यादव ने कहा—“अब झारखंड में रहते हैं, तो झारखंड की बात करिए। राज्य सरकार ने जनता से क्या-क्या वादे किए थे, और उनमें से कितने पूरे किए?”


‘केंद्र नहीं, राज्य की जवाबदेही महत्वपूर्ण’—विपक्ष का दावा

नीरा यादव ने स्पष्ट कहा कि जन समस्याओं को लेकर राज्य सरकार की जवाबदेही सबसे महत्वपूर्ण है (governance)। उनका कहना था कि सरकार केंद्र को बहाना बनाकर राज्य की नाकामियों को छिपाने की कोशिश कर रही है। उन्होंने दावा किया कि रोजगार, स्वास्थ्य, सड़क और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर राज्य सरकार लोगों को संतोषजनक जवाब नहीं दे पा रही।


जनता का सवाल—वादे पूरे क्यों नहीं हुए?

दोनों पक्षों के बीच चल रहे आरोप-प्रत्यारोप के केंद्र में झारखंड की आम जनता थी, जो हर चुनाव के बाद इन वादों के पूरे होने का इंतजार करती है (public)। लोगों का मानना है कि राज्य और केंद्र—दोनों सरकारों को अपने-अपने स्तर पर विकास कार्यों को तेज करना चाहिए और राजनीतिक रस्साकशी में आम जनता का समय बर्बाद नहीं होना चाहिए।


राजनीतिक आरोपों के बीच विधानसभा सत्र की गंभीरता भी प्रभावित

सत्र शुरू होने से पहले ही इस तरह का राजनीतिक तनाव उसके गंभीर एजेंडा को प्रभावित करता दिखा (assembly)। जहां एक ओर कई महत्वपूर्ण विधेयकों और नीतियों पर चर्चा होनी थी, वहीं दूसरी ओर राजनीतिक टकराव ने माहौल को पूरी तरह विरोधाभासी बना दिया।


सदन के बाहर का विवाद, सदन के भीतर की कार्यवाही पर छाया

माना जा रहा है कि सदन के बाहर की इस तीखी नोकझोंक के चलते भीतर की चर्चाएं भी प्रभावित होंगी (impact)। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि सदन में विपक्ष राज्य सरकार पर जनहित से जुड़े मुद्दों पर दवाब बढ़ाएगा, जबकि सत्ता पक्ष केंद्र के विकास कार्यों की तुलना करते हुए इसे राजनीतिक मोड़ देगा।


चुनावी मौसम से पहले बढ़ी राजनीतिक गर्माहट

विशेषज्ञों का मानना है कि आगामी चुनावी मौसम को देखते हुए सत्ता और विपक्ष दोनों ही अपने-अपने एजेंडे को मजबूत करने में जुटे हैं (strategy)। ऐसे में वादों की याद दिलाना और जवाबदेही की मांग आगामी दिनों में और बढ़ सकती है। यह स्थिति राज्य की राजनीति को और अधिक ध्रुवीकृत कर सकती है।


‘वादों का हिसाब’—राजनीति का नया हथियार

राजनीति में वादों की याद दिलाना अब एक शक्तिशाली हथियार बन चुका है (narrative)। विपक्ष राज्य सरकार से रोजगार, पेंशन और विकास कार्यों पर सवाल उठाता है, वहीं सत्ता पक्ष केंद्र से उसके वित्तीय वादों और योजनाओं पर जवाब चाहता है। यह देखा जा सकता है कि दोनों ही पक्ष जनता को रिझाने के लिए ‘वादे’ को एक मुख्य मुद्दा बना चुके हैं।


माहौल गरमा सकता है, लेकिन जनता जवाब चाहती है

राजनीतिक बयानबाजी और तीखी बहस आगे भी जारी रहने की संभावना है (election)। लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि जनता अब केवल सवाल नहीं, बल्कि वास्तविक काम देखना चाहती है। झारखंड के मतदाता लगातार यह महसूस कर रहे हैं कि विकास की रफ्तार तभी तेज हो सकती है जब सरकारें सिर्फ वादे नहीं बल्कि परिणाम देने की दिशा में कदम बढ़ाएं।


समापन: किसका वादा सच, किसका झूठ—जनता तय करेगी

अंत में यह साफ है कि “वादा… तेरा वादा…” का मुद्दा झारखंड की राजनीति में नया मोड़ ला चुका है (dialogue)। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही इस नारे के सहारे एक-दूसरे पर दबाव बना रहे हैं। लेकिन असली फैसला जनता ही करेगी, जो हर चुनाव में उन वादों को याद रखती है जिन्हें पूरा किया गया—और उन्हें भी जिन्हें भूल दिया गया।

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