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India Iran Diplomatic Relations: भारत का बड़ा कदम, ईरान के खिलाफ पश्चिमी देशों के प्रस्ताव को नकारा

India Iran Diplomatic Relations: संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) के 39वें विशेष सत्र में अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का एक नया अध्याय लिखा गया, जिसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। ईरान में मानवाधिकारों की कथित बिगड़ती स्थिति को लेकर पश्चिमी देशों द्वारा लाए गए निंदा प्रस्ताव पर भारत ने तेहरान का खुलकर समर्थन किया है। भारत ने न केवल पश्चिमी देशों के इस प्रस्ताव का विरोध किया, बल्कि मतदान के दौरान सक्रिय रूप से (Against Voting) का विकल्प चुनकर अमेरिका और यूरोपीय संघ को हैरत में डाल दिया। यह फैसला भारत की विदेश नीति में एक साहसी और स्वतंत्र रुख को दर्शाता है, जो अंतरराष्ट्रीय मंचों पर तेजी से बदल रही वैश्विक व्यवस्था की गवाही दे रहा है।

India Iran Diplomatic Relations
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पश्चिमी प्रस्ताव का मूल आधार और विवाद की वजह

यह संपूर्ण विवाद प्रस्ताव संख्या A/HRC/S-39/L.1 पर केंद्रित था, जिसका मुख्य उद्देश्य ईरान के भीतर चल रहे नागरिक विरोध प्रदर्शनों के दौरान मानवाधिकार उल्लंघन की निंदा करना था। दिसंबर 2025 के अंत में शुरू हुए इन प्रदर्शनों को लेकर पश्चिमी देश चाहते थे कि ईरान पर कड़े अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध और कानूनी कार्रवाई का दबाव बनाया जाए। हालांकि, भारत सहित ग्लोबल साउथ के कई प्रमुख देशों ने इस प्रस्ताव को एकतरफा और (Geopolitical Agenda) से प्रेरित करार देते हुए सिरे से खारिज कर दिया। उनका मानना है कि ऐसे प्रस्ताव अक्सर चुनिंदा देशों को निशाना बनाने के लिए राजनीतिक हथियार के रूप में उपयोग किए जाते हैं।

मतदान का गणित और दो धड़ों में बंटी दुनिया

असेंबली हॉल में जब वोटिंग शुरू हुई, तो पूरा माहौल कूटनीतिक तनाव से भरा हुआ था। स्क्रीन पर आए नतीजों ने स्पष्ट कर दिया कि दुनिया अब एकध्रुवीय नहीं रही। प्रस्ताव के पक्ष में कुल 25 देशों ने मतदान किया, जबकि 14 देश तटस्थ रहे। चौंकाने वाली बात यह रही कि भारत उन 7 चुनिंदा देशों में शामिल था, जिन्होंने पूरी मजबूती के साथ (Negative Vote) दर्ज कराया। इस मतदान ने साफ कर दिया कि दुनिया के बड़े लोकतंत्र अब मानवाधिकारों के नाम पर होने वाली ‘सेलेक्टिव पॉलिटिक्स’ के आगे झुकने को तैयार नहीं हैं।

भारत, चीन और पाकिस्तान का एक ही सुर में आना

इस मतदान की सबसे दुर्लभ और ऐतिहासिक घटना यह रही कि भारत, चीन और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देश, जिनके बीच अक्सर तनाव बना रहता है, इस बार एक ही सुर में नजर आए। इन तीनों देशों के साथ इंडोनेशिया, वियतनाम और क्यूबा ने भी ‘NO’ खेमे में खड़े होकर (Regional Solidarity) का उदाहरण पेश किया। यह कूटनीतिक एकता पश्चिमी देशों के प्रभुत्व के खिलाफ एशियाई देशों के एक साझा दृष्टिकोण को प्रदर्शित करती है। यह संभवतः हाल के वर्षों का पहला ऐसा मौका है जब भारत ने किसी तीसरे देश के मुद्दे पर चीन और पाकिस्तान के साथ मिलकर समान वोटिंग की है।

यूरोपीय देशों और अमेरिकी गुट की घेराबंदी

ईरान को घेरने के लिए फ्रांस, जर्मनी, इटली और यूनाइटेड किंगडम जैसे यूरोपीय देशों ने एक मजबूत मोर्चा तैयार किया था। इनका साथ जापान और दक्षिण कोरिया जैसे अमेरिकी सहयोगियों ने भी दिया। इन 25 देशों के ‘YES’ खेमे का तर्क था कि ईरान में मानवाधिकारों की रक्षा के लिए (International Intervention) अनिवार्य है। हालांकि, बहुमत के आधार पर यह प्रस्ताव पारित तो हो गया, लेकिन भारत और इंडोनेशिया जैसे प्रभावशाली देशों के कड़े विरोध ने इस प्रस्ताव की नैतिक और कूटनीतिक साख पर बड़े सवालिया निशान लगा दिए हैं।

भारत की बदलती विदेश नीति और रणनीतिक स्वायत्तता

आमतौर पर भारत इस तरह के संवेदनशील प्रस्तावों पर ‘तटस्थ’ रहने का रास्ता चुनता रहा है, लेकिन इस बार ‘NO’ वोट करना भारत की नई और मुखर विदेश नीति का परिचायक है। भारत ने स्पष्ट संदेश दिया है कि वह अपनी (Strategic Autonomy) के साथ किसी भी प्रकार का समझौता नहीं करेगा। ईरान के साथ भारत के सदियों पुराने सांस्कृतिक संबंध, ऊर्जा सुरक्षा और चाबहार बंदरगाह जैसे महत्वपूर्ण रणनीतिक हित जुड़े हुए हैं। भारत ने यह साफ कर दिया है कि वह किसी भी देश के आंतरिक मामलों में बाहरी दखलंदाजी को स्वीकार नहीं करेगा और अपने मित्रों के साथ मजबूती से खड़ा रहेगा।

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