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India Judicial Reform 2026: अब इंसाफ के लिए आधी रात में भी खुलेंगे सुप्रीम कोर्ट के द्वार, CJI सूर्य कांत ने किया ऐलान

India Judicial Reform 2026: भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत ने देश की न्याय प्रणाली को लेकर एक ऐसी क्रांतिकारी पहल की है, जो आम आदमी के मन में कानून के प्रति विश्वास को और गहरा कर देगी। मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट कर दिया है कि न्याय अब केवल कार्यकालों और फाइलों का मोहताज नहीं रहेगा। उनके विजन के अनुसार, मौलिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए देश का कोई भी नागरिक (legal assistance) के लिए अब आधी रात को भी अदालत का दरवाजा खटखटा सकेगा। यह निर्णय भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित होने जा रहा है, जिसका उद्देश्य न्याय की पहुंच को सर्वसुलभ बनाना है।

India Judicial Reform 2026
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अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड की तरह होगी अदालत

एक साक्षात्कार के दौरान सीजेआई सूर्य कांत ने अदालतों की तुलना जीवन रक्षक प्रणाली से करते हुए एक बहुत ही मार्मिक और पेशेवर उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि संवैधानिक अदालतों को अस्पताल के (emergency services) की तरह काम करना चाहिए, जहां मरीज के लिए डॉक्टर हर समय उपलब्ध रहते हैं। ठीक उसी तरह, यदि किसी नागरिक की स्वतंत्रता या उसके संवैधानिक अधिकारों पर कोई ‘लीगल इमरजेंसी’ आती है, तो सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट्स उसके अधिकारों की रक्षा के लिए 24 घंटे तत्पर रहेंगे। उनका यह प्रयास शीर्ष न्यायालय को सही मायने में ‘जनता की अदालत’ बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

अदालती कार्यवाही में तेजी लाने के लिए नई एसओपी

केवल न्याय की उपलब्धता ही नहीं, बल्कि न्याय की गति को बढ़ाना भी सीजेआई की प्राथमिकता सूची में शीर्ष पर है। इसी क्रम में सुप्रीम कोर्ट ने (standard operating procedure) जारी की है, जो अदालतों की कार्यप्रणाली में एक बड़े बदलाव का संकेत देती है। इस नई गाइडलाइन के माध्यम से केस की सुनवाई के दौरान होने वाली देरी को कम करने की कोशिश की गई है। अक्सर देखा जाता है कि लंबी बहस और दलीलों के कारण मामले सालों तक खिंचते चले जाते हैं, लेकिन अब नई व्यवस्था के तहत वकीलों को सख्त नियमों का पालन करना होगा।

वकीलों की मौखिक दलीलों के लिए तय हुई समय-सीमा

नई एसओपी के तहत अब वरिष्ठ अधिवक्ताओं और दलील रखने वाले वकीलों को अपनी मौखिक बहस के लिए पहले से ही समय-सीमा निर्धारित करनी होगी। अब किसी भी मामले की (oral arguments) शुरू होने से कम से कम एक दिन पहले वकीलों को यह बताना होगा कि उन्हें अपनी बात रखने के लिए कितना समय चाहिए। यह जानकारी ‘एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड’ के लिए उपलब्ध कराए गए ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से देनी होगी। इससे पीठ को यह समझने में आसानी होगी कि मामले की सुनवाई में कुल कितना वक्त लगेगा और दिन की कार्यसूची को बेहतर तरीके से व्यवस्थित किया जा सकेगा।

संक्षिप्त नोट और लिखित निवेदन के कड़े नियम

न्यायालय ने वकीलों द्वारा पेश किए जाने वाले लिखित दस्तावेजों को लेकर भी काफी सख्ती दिखाई है। नए परिपत्र के अनुसार, वरिष्ठ अधिवक्ताओं को सुनवाई की तारीख से कम से कम तीन दिन पहले अपना संक्षिप्त नोट या लिखित प्रस्तुति दाखिल करनी होगी। महत्वपूर्ण बात यह है कि यह प्रस्तुति (legal documentation) के मानकों के अनुरूप पांच पृष्ठों से अधिक की नहीं होनी चाहिए। साथ ही, इसकी एक प्रति विपक्षी पक्ष को भी समय पर उपलब्ध करानी होगी। इस कदम से अनावश्यक कागजी कार्रवाई कम होगी और जज मामले के मूल बिंदुओं पर सीधे ध्यान केंद्रित कर सकेंगे।

तकनीकी समाधान और ऑनलाइन पोर्टल का महत्व

डिजिटल इंडिया के दौर में न्यायपालिका भी खुद को हाई-टेक बना रही है। एसओपी में ऑनलाइन उपस्थिति पर्ची और पोर्टल के माध्यम से समय-सीमा जमा करने की व्यवस्था अनिवार्य की गई है। इस (digital transformation) से न केवल वकीलों का समय बचेगा, बल्कि न्यायालय के प्रशासनिक कार्य भी सुचारू रूप से चलेंगे। सीजेआई का मानना है कि तकनीक का सही इस्तेमाल ही अदालतों में लंबित करोड़ों मामलों के बोझ को कम करने का एकमात्र रास्ता है। यह पोर्टल पारदर्शिता और जवाबदेही तय करने में भी सहायक होगा।

संवैधानिक गरिमा और व्यक्ति की आजादी सर्वोपरि

मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत का यह पूरा रोडमैप व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा के इर्द-गिर्द घूमता है। उन्होंने साफ किया है कि किसी भी नागरिक को यह महसूस नहीं होना चाहिए कि समय के अभाव में या प्रक्रियात्मक (judicial delay) की वजह से उसे न्याय नहीं मिल पाया। जब अदालतें आधी रात को भी सुनवाई के लिए उपलब्ध होंगी, तो यह उन तत्वों के लिए एक कड़ा संदेश होगा जो कानून का उल्लंघन करने का साहस करते हैं। न्याय का पहरा अब हर पल मुस्तैद रहेगा ताकि लोकतंत्र की जड़ें और मजबूत हो सकें।

न्यायिक सुधारों से आम आदमी को क्या मिलेगा?

इन बदलावों का सबसे बड़ा लाभ उस आम नागरिक को मिलेगा जो न्याय पाने के लिए वर्षों तक इंतजार करता है। समय-सीमा निर्धारित होने से मामलों का निस्तारण (case disposal) तेजी से होगा और न्याय की लागत भी कम होगी। सीजेआई का यह विजन दर्शाता है कि भारतीय न्यायपालिका अब अपनी पारंपरिक छवि से बाहर निकलकर अधिक सक्रिय और जन-हितैषी बन रही है। नए साल के साथ लागू होने वाली ये व्यवस्थाएं आने वाले समय में देश की निचली अदालतों के लिए भी एक आदर्श प्रस्तुत करेंगी।

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