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India US Trade Deal Controversy: क्या अमेरिकी वाणिज्य मंत्री की ‘सॉरी’ वाली धमकी के पीछे छिपा है कोई बड़ा भू-राजनीतिक खेल…

India US Trade Deal Controversy: अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टीम में सबसे रसूखदार चेहरों में शुमार हॉवर्ड लुटनिक ने एक बार फिर भारत के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। लुटनिक ने हाल ही में एक सार्वजनिक मंच से यह कड़ा संदेश दिया है कि भारत ने अमेरिका के साथ व्यापारिक समझौता करने का एक सुनहरा अवसर खो दिया है। उनका दावा है कि (US Department of Commerce) के माध्यम से जो रियायतें और शर्तें पहले भारत को दी गई थीं, वे अब इतिहास का हिस्सा बन चुकी हैं और भविष्य में वैसी डील दोबारा कभी नहीं मिलेगी।

India US Trade Deal Controversy
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कौन हैं अरबपति हॉवर्ड लुटनिक?

हॉवर्ड लुटनिक का नाम वैश्विक स्तर पर तब चर्चा में आया जब उन्हें ट्रंप प्रशासन में वाणिज्य मंत्री की जिम्मेदारी सौंपी गई। ‘कैंटर फिट्जगेराल्ड’ जैसी विशालकाय कंपनी के सर्वेसर्वा लुटनिक न केवल ट्रंप के करीबी मित्र हैं, बल्कि वे (US Billionaire Politicians) की उस जमात से आते हैं जो व्यापार को सीधे लाभ और हानि के चश्मे से देखते हैं। टाइम्स पत्रिका ने उन्हें 2025 के सबसे प्रभावशाली लोगों की सूची में जगह दी थी और उनकी कुल संपत्ति 2 बिलियन डॉलर से अधिक आंकी गई है।

न्यूयॉर्क से वॉशिंगटन तक का सफर

लुटनिक का जन्म 14 जुलाई 1961 को न्यूयॉर्क में हुआ था और उन्होंने अर्थशास्त्र की गहरी समझ हार्वरफोर्ड कॉलेज से हासिल की। वे उन अधिकारियों में प्रमुखता से शामिल हैं जिन्होंने डोनाल्ड ट्रंप को आयातित वस्तुओं पर भारी टैरिफ लगाने के लिए प्रेरित किया था। दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत (Democratic Party Background) के साथ की थी, लेकिन बाद में ट्रंप की विचारधारा से प्रभावित होकर वे रिपब्लिकन खेमे में शामिल हो गए और आज अमेरिका की आर्थिक नीतियों के सबसे बड़े रणनीतिकार बन गए हैं।

‘भारत माफी मांगेगा’ वाले बयान की हकीकत

बीते साल सितंबर में लुटनिक ने एक अत्यंत विवादास्पद बयान देकर भारतीय कूटनीतिज्ञों को हैरान कर दिया था। उन्होंने ब्लूमबर्ग को दिए इंटरव्यू में कहा था कि भारत जल्द ही अमेरिका के पास वापस आएगा और डोनाल्ड ट्रंप से माफी मांगते हुए डील के लिए मिन्नतें करेगा। लुटनिक का मानना था कि (Aggressive Trade Negotiations) के दबाव में भारत को झुकना ही पड़ेगा, लेकिन भारत ने अपनी स्वतंत्र विदेश नीति और स्वाभिमान को सर्वोपरि रखकर उनकी इस भविष्यवाणी को अब तक गलत साबित किया है।

सिर्फ एक फोन कॉल और टूट गई डील?

हाल ही में एक पॉडकास्ट के दौरान लुटनिक ने डील विफल होने का एक नया और चौंकाने वाला कारण पेश किया है। उन्होंने दावा किया कि भारत और अमेरिका के बीच सब कुछ लगभग तय हो चुका था, लेकिन ऐन वक्त पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रपति ट्रंप को फोन नहीं किया। लुटनिक के अनुसार, (Diplomatic Phone Calls) की कमी के कारण यह समझौता अधर में लटक गया। उन्होंने पूरी जिम्मेदारी भारत पर थोपते हुए कहा कि भारत ने अपनी झिझक के कारण एक बेहतरीन मौका गंवा दिया है।

किसानों के हितों पर भारत का अडिग रुख

अमेरिकी दबाव के बावजूद भारत सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि वह किसी भी देश के साथ व्यापारिक संबंधों के लिए अपने देश के करोड़ों अन्नदाताओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं करेगी। भारत का मानना है कि (Agriculture Subsidy Issues) और डेयरी उत्पाद जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में विदेशी हस्तक्षेप की अनुमति देना आत्मघाती हो सकता है। भारत की नीति रही है कि व्यापार हमेशा बराबरी और परस्पर सम्मान के आधार पर होना चाहिए, न कि किसी शक्तिशाली देश की शर्तों पर।

टैरिफ युद्ध और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर

डोनाल्ड ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति के तहत टैरिफ को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। हॉवर्ड लुटनिक इस नीति के सबसे बड़े पैरोकार हैं, जिनका मानना है कि टैरिफ के जरिए ही अमेरिकी विनिर्माण क्षेत्र को पुनर्जीवित किया जा सकता है। हालांकि, (International Trade Tariffs) की यह होड़ वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को बाधित कर रही है। भारत जैसे देशों के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि उन्हें अपने निर्यात को बचाए रखने के साथ-साथ घरेलू उद्योगों का भी संरक्षण करना है।

भविष्य की राह: दबाव या संवाद?

हॉवर्ड लुटनिक के तेवर भले ही सख्त हों, लेकिन भारत-अमेरिका संबंधों की गहराई केवल व्यापार तक सीमित नहीं है। रक्षा, तकनीक और रणनीतिक क्षेत्रों में दोनों देश एक-दूसरे के अनिवार्य साझेदार हैं। ऐसे में (India US Strategic Partnership) को केवल एक व्यापारिक डील के टूटने से आंकना जल्दबाजी होगी। लुटनिक के बयानों को अक्सर दबाव की राजनीति का हिस्सा माना जाता है, लेकिन भारत ने यह संदेश स्पष्ट कर दिया है कि उसे डराकर या ‘सॉरी’ बुलवाकर मेज पर नहीं लाया जा सकता।

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