Global Wildfire Emission Trends: ग्लोबल वार्मिंग और सेहत के लिए गहराता संकट
Global Wildfire Emission Trends: जर्नल एनवायरमेंटल साइंस एंड टेक्नोलॉजी में प्रकाशित एक हालिया शोध ने दुनिया भर के पर्यावरण विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। इस अध्ययन के अनुसार, वैश्विक स्तर पर जंगलों, घास के मैदानों और पीटलैंड में लगने वाली आग अब पहले के अनुमानों की तुलना में कहीं अधिक विनाशकारी (Global Wildfire Emission Trends) साबित हो रही है। शोधकर्ताओं ने 1997 से 2023 तक के आंकड़ों का गहन विश्लेषण किया, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि आग से निकलने वाली जहरीली गैसें और कार्बनिक यौगिक हमारी वायु गुणवत्ता को तेजी से नष्ट कर रहे हैं। जंगलों की आग से निकलने वाला धुआं अब केवल एक स्थानीय समस्या नहीं रह गया है, बल्कि यह एक वैश्विक स्वास्थ्य आपातकाल का रूप ले चुका है।

धुएं में छिपे सूक्ष्म कणों का अदृश्य खतरा
जंगलों की आग से निकलने वाले धुएं का रासायनिक विश्लेषण करने पर कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस धुएं में केवल कार्बन डाइऑक्साइड ही नहीं होती, बल्कि इसमें कई जटिल कार्बनिक यौगिक (Organic Trace Compounds) भी शामिल होते हैं। इनमें विशेष रूप से इंटरमीडिएट और सेमी-वोलाटाइल ऑर्गेनिक कंपाउंड्स की मात्रा बहुत अधिक पाई गई है। ये यौगिक अत्यधिक गर्मी के संपर्क में आते ही गैस में बदल जाते हैं और वायुमंडल में पहुंचकर अत्यंत महीन कणों का रूप धारण कर लेते हैं। ये कण सांस के जरिए सीधे फेफड़ों और रक्तप्रवाह में प्रवेश कर गंभीर बीमारियों का कारण बन रहे हैं।
गंगा के मैदानी इलाकों से अमेजन तक का प्रदूषण चक्र
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की रिपोर्ट ने पुष्टि की है कि प्रदूषण का यह चक्र भौगोलिक सीमाओं को पार कर चुका है। भारत के गंगा के मैदानी इलाकों में छाई धुंध और अमेजन के वर्षावनों से उठने वाला काला धुआं (Transboundary Air Pollution) पारिस्थितिक तंत्र को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है। वर्ष 2024 में अमेजन के जंगलों में लगी भीषण आग का असर हजारों किलोमीटर दूर स्थित महानगरों में भी महसूस किया गया। रिपोर्ट के मुताबिक, कनाडा और साइबेरिया जैसे ठंडे क्षेत्रों में लगी आग ने भी पीएम 2.5 के स्तर को रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचा दिया है, जिससे कृषि पैदावार और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।
दो दशकों में सीओ2 उत्सर्जन में रिकॉर्ड वृद्धि
जर्नल साइंस में छपे एक अन्य महत्वपूर्ण शोध पत्र में बताया गया है कि साल 2001 के बाद से वनाग्नि के कारण होने वाले कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में लगभग 60 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इस (Carbon Sequestration Loss) प्रक्रिया ने पृथ्वी के प्राकृतिक कूलिंग सिस्टम को कमजोर कर दिया है। विशेष रूप से उत्तरी बोरियल वनों में, जो जलवायु परिवर्तन के प्रति बहुत अधिक संवेदनशील हैं, वहां उत्सर्जन की दर लगभग तीन गुना तक बढ़ गई है। यह स्थिति दर्शाती है कि हमारे वन अब कार्बन को सोखने के बजाय उसे वातावरण में छोड़ने वाले स्रोतों में तब्दील होते जा रहे हैं।
उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों से बाहर फैलता आग का दायरा
नवीनतम शोध से यह भी संकेत मिलते हैं कि अब आग लगने की घटनाएं केवल गर्म उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों तक सीमित नहीं रह गई हैं। उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों के बाहर स्थित जंगलों से हर साल लगभग 50 करोड़ टन अतिरिक्त सीओ2 वातावरण (Boreal Forest Wildfires) में घुल रही है। तस्मानिया विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों का मानना है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण अब आग लगने का मौसम (Fire Season) पहले की तुलना में अधिक लंबा और तीव्र होता जा रहा है। यह बदलाव न केवल जैव विविधता को नष्ट कर रहा है, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए शुद्ध हवा की उपलब्धता पर भी सवालिया निशान खड़ा कर रहा है।
पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ता दीर्घकालिक प्रभाव
जंगलों की आग से होने वाला नुकसान केवल पेड़ों के जलने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मिट्टी की गुणवत्ता और जल चक्र को भी स्थायी रूप से बिगाड़ देता है। जब पीटलैंड जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में आग लगती है, तो वहां सदियों से जमा कार्बन (Peatland Degradation Impact) अचानक मुक्त हो जाता है। इससे निकलने वाली गर्मी और हानिकारक गैसें ओजोन परत को भी नुकसान पहुंचा रही हैं। विशेषज्ञों का सुझाव है कि यदि समय रहते वैश्विक स्तर पर वनों के प्रबंधन और आग की रोकथाम के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो वायु प्रदूषण का यह स्तर मानव जीवन के लिए असहनीय हो जाएगा।



