Menopause – वैलेंटाइन डे पर क्यों बढ़ता है अकेलेपन का एहसास
Menopause – 14 फरवरी को दुनिया भर में वैलेंटाइन डे प्यार और साथ के जश्न के रूप में मनाया जाता है। इस दिन लोग अपने साथी के लिए खास तोहफे चुनते हैं, संदेश लिखते हैं और रिश्ते को खास बनाने की कोशिश करते हैं। लेकिन हर किसी के लिए यह दिन एक जैसा नहीं होता। खासकर उन महिलाओं के लिए जो मेनोपॉज के दौर से गुजर रही होती हैं, यह समय भावनात्मक रूप से थोड़ा भारी पड़ सकता है। जहां बाहर दुनिया प्रेम का उत्सव मना रही होती है, वहीं भीतर एक अनकहा खालीपन महसूस हो सकता है।

मेनोपॉज के दौरान भावनात्मक बदलाव
विशेषज्ञों के अनुसार मेनोपॉज केवल शारीरिक परिवर्तन नहीं है। यह जीवन का वह चरण है जब शरीर और मन दोनों एक साथ बदलाव से गुजरते हैं। हार्मोनल उतार-चढ़ाव के कारण मूड में अचानक परिवर्तन, चिड़चिड़ापन, बेचैनी और नींद की कमी जैसी स्थितियां आम हो जाती हैं। इन बदलावों का असर सीधे तौर पर भावनात्मक जुड़ाव पर पड़ता है। कई बार महिला खुद भी समझ नहीं पाती कि वह पहले जैसी क्यों महसूस नहीं कर रही। ऐसे में प्यार के बीच भी एक दूरी का एहसास जन्म ले सकता है।
रिश्तों में बदलता अनुभव
मेनोपॉज कोच और स्वास्थ्य विशेषज्ञ तमन्ना सिंह बताती हैं कि उनकी क्लिनिकल प्रैक्टिस में अक्सर महिलाएं कहती हैं, “रिश्ता तो है, लेकिन अब पहले जैसा नहीं लगता।” यह शिकायत किसी एक कारण से नहीं जुड़ी होती। दरअसल, शरीर के भीतर हो रहे बदलाव रिश्ते की संवेदनशीलता को प्रभावित करते हैं। एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन के स्तर में गिरावट से ऊर्जा, नींद और यौन इच्छा पर असर पड़ता है। ऐसे में साथी के साथ निकटता का तरीका बदल जाता है, जिसे कई बार गलत समझ लिया जाता है।
अकेलेपन की असली वजह क्या है
अकेलापन हमेशा साथी की कमी से नहीं आता। कई बार यह खुद से दूरी का परिणाम होता है। जब महिला अपने बदलते शरीर और भावनाओं को समझने में उलझी होती है, तो वह भीतर से असुरक्षित महसूस कर सकती है। यदि इस दौरान खुलकर बातचीत न हो, तो साथी इस बदलाव को भावनात्मक दूरी समझ सकता है। गलतफहमियां यहीं से शुरू होती हैं। असल में जरूरत होती है सहानुभूति और धैर्य की, न कि आरोप-प्रत्यारोप की।
हार्मोनल प्रभाव और मानसिक स्थिति
मेनोपॉज के दौरान स्ट्रेस हार्मोन के प्रति संवेदनशीलता बढ़ सकती है। छोटी-छोटी बातें भी भारी लगने लगती हैं। हॉट फ्लैशेज, थकान और लो लिबिडो जैसी स्थितियां आत्मविश्वास को प्रभावित कर सकती हैं। जब महिला खुद को पहले जैसा सक्रिय या आकर्षक महसूस नहीं करती, तो उसका असर रिश्ते पर भी दिखता है। यह एक जैविक प्रक्रिया है, जिसे समझना जरूरी है। इसे व्यक्तिगत असफलता मान लेना स्थिति को और कठिन बना देता है।
संवाद क्यों है सबसे बड़ा सहारा
विशेषज्ञों का मानना है कि इस दौर में सबसे अहम भूमिका स्पष्ट और शांत संवाद की होती है। यदि महिला अपने साथी को यह बता सके कि उसका व्यवहार जानबूझकर नहीं है, बल्कि शरीर में हो रहे बदलाव का असर है, तो रिश्ते में पारदर्शिता बढ़ती है। साथी को भी यह समझने की जरूरत होती है कि निकटता की भावना खत्म नहीं हुई, बल्कि उसका रूप बदल रहा है। ईमानदार बातचीत से भरोसा दोबारा मजबूत हो सकता है।
खुद से जुड़ाव की जरूरत
मेनोपॉज के समय शरीर अतिरिक्त देखभाल मांगता है। संतुलित आहार, हल्की नियमित कसरत, पर्याप्त नींद और तनाव प्रबंधन बेहद जरूरी हो जाते हैं। जब महिला खुद को प्राथमिकता देती है, तो उसकी भावनात्मक स्थिरता भी लौटने लगती है। यह बदलाव रिश्ते को भी सकारात्मक दिशा देता है। आत्म-देखभाल केवल स्वास्थ्य का मुद्दा नहीं, बल्कि रिश्ते की मजबूती का आधार भी है।
मिडलाइफ का प्यार अलग क्यों होता है
युवावस्था का प्यार अक्सर उत्साह और रोमांच से भरा होता है, जबकि मिडलाइफ का प्यार शांत और गहरा होता है। इसमें कम शब्द होते हैं, लेकिन ज्यादा भरोसा होता है। कई बार साथ बैठकर चुप रहना भी एक मजबूत जुड़ाव का संकेत होता है। मेनोपॉज के दौरान महसूस होने वाला अकेलापन किसी अंत का संकेत नहीं है। यह रिश्ते को नए स्तर पर समझने और संवारने का अवसर भी हो सकता है।
सकारात्मक दृष्टिकोण की अहमियत
स्वास्थ्य विशेषज्ञ मानते हैं कि सही जानकारी और भावनात्मक सहयोग के साथ यह दौर सहज बनाया जा सकता है। मेनोपॉज जीवन का स्वाभाविक चरण है। इसे स्वीकार कर, खुलकर बातचीत कर और खुद की देखभाल कर रिश्तों को पहले से अधिक मजबूत बनाया जा सकता है। हर बदलाव दूरी नहीं लाता, कई बदलाव रिश्तों को और गहरा कर देते हैं।



