Ajit Pawar Maharashtra Politics: बारामती विमान हादसे से पहले भावुक थे अजित पवार, करीबी दोस्त ने साझा की आखिरी बातचीत…
Ajit Pawar Maharashtra Politics: महाराष्ट्र की राजनीति के दिग्गज नेता और उपमुख्यमंत्री अजित पवार के आकस्मिक निधन ने पूरे राज्य को स्तब्ध कर दिया है। बारामती में हुए दुखद विमान हादसे से कुछ समय पहले के उनके विचार और भावनाएं अब उनके करीबियों के जरिए सामने आ रही हैं। उनके सबसे पुराने और भरोसेमंद साथी, बारामती विद्या प्रतिष्ठान के ट्रस्टी किरण गूजर ने खुलासा किया है कि पिछले कुछ समय से अजित पवार राजनीति और भागदौड़ भरी जिंदगी से काफी थक चुके थे। उनके निधन से न केवल राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) को अपूरणीय क्षति हुई है, बल्कि उनके समर्थकों के बीच भी शोक की लहर है।

राजनीति से मोहभंग और भविष्य की थकान
किरण गूजर के अनुसार, निधन से महज पांच दिन पहले अजित पवार ने उनसे अपने मन की व्यथा साझा की थी। एक निजी मुलाकात के दौरान उन्होंने कहा था कि वह अब इस सब से ऊब चुके हैं और उन्हें कुछ नहीं चाहिए। उन्होंने राजनीति से दूर जाने की इच्छा भी जताई थी। लोकसभा चुनाव के परिणामों के बाद वह काफी संवेदनशील हो गए थे और अक्सर यह सवाल करते थे कि इतनी कड़ी मेहनत और दिन-रात जनता की सेवा करने के बावजूद उन्हें आलोचनाओं और विफलताओं का सामना क्यों करना पड़ रहा है। यह उनकी शख्सियत का वह पहलू था जो आमतौर पर जनता के सामने नहीं आता था।
वैचारिक बदलाव और ईश्वर के प्रति दृष्टिकोण
अजित पवार के व्यक्तित्व में उम्र और अनुभव के साथ काफी बदलाव आया था। शुरुआत में वह भगवान और मंदिरों में जाने को लेकर काफी उदासीन रहते थे। उनके मन में यह टीस थी कि उनके पिता का साया बचपन में ही उठ गया और परिवार को कठिन समय देखना पड़ा। हालांकि, समय के साथ उनकी सोच में बदलाव आया। वह आस्तिक बने लेकिन कभी अंधविश्वासी नहीं रहे। उन्होंने अपनी धार्मिक आस्था को कभी राजनीति का जरिया नहीं बनाया। किरण गूजर, जिन्होंने 1984 में उन्हें राजनीति में आने के लिए प्रेरित किया था, ने उनके इस मानवीय और वैचारिक परिवर्तन को बहुत करीब से देखा था।
अंतिम विदाई और वह दर्दनाक मंजर
दुर्घटना वाले दिन की यादें साझा करते हुए गूजर भावुक हो उठे। उन्होंने बताया कि विमान में सवार होने से ठीक पहले अजित पवार ने उन्हें फोन कर जानकारी दी थी। किरण गूजर उन्हें लेने के लिए खुद हवाई अड्डे पहुंचे थे, लेकिन वहां उनकी आंखों के सामने ही विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया। उन्होंने बताया कि जब उपमुख्यमंत्री के पार्थिव शरीर को ले जाया जा रहा था, तब उन्होंने ही उसे अपने ‘दादा’ के रूप में पहचाना। उनके लिए यह किसी डरावने सपने जैसा था। अजित पवार, जो कभी घर-गृहस्थी की दुनिया में ही सीमित रहना चाहते थे, अंततः बारामती की जनता के लिए राजनीति में आए और अपनी अंतिम सांस भी वहीं ली।
राजनीतिक सफर की शुरुआत और चुनौतियां
अजित पवार का राजनीतिक सफर 1984 में छत्रपति कोऑपरेटिव शुगर फैक्ट्री के चुनाव से शुरू हुआ था। उस समय वह सक्रिय राजनीति में आने के इच्छुक नहीं थे, लेकिन सामाजिक जुड़ाव और युवाओं के नेतृत्व की आवश्यकता को देखते हुए उन्होंने यह कदम उठाया। पिछले कुछ वर्षों में उनके करियर में कई उतार-चढ़ाव आए, जिसमें पारिवारिक विवाद और गठबंधन की राजनीति की चुनौतियां शामिल रहीं। इन सबके बीच उनकी छवि एक कड़क और अनुशासित नेता की रही, लेकिन उनके करीबी जानते थे कि वह भीतर से बहुत कोमल और संवेदनशील व्यक्ति थे, जो अंततः शांति की तलाश में थे।



