BJPStrategy – पश्चिम बंगाल में मिशन 160 पर फोकस
BJPStrategy – पश्चिम बंगाल की सियासत में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर हलचल तेज है। भारतीय जनता पार्टी ने राज्य में अपने ‘मिशन 160’ के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए सीटवार रणनीति पर काम शुरू कर दिया है। पार्टी का जोर उन क्षेत्रों पर रहेगा जहां पिछली बार उसे सफलता मिली थी, साथ ही उन सीटों पर भी जहां सामाजिक और राजनीतिक समीकरण उसके पक्ष में बन सकते हैं।

पिछले चुनाव में भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच लगभग साढ़े छह प्रतिशत वोटों का अंतर रहा था। इसके बावजूद सीटों की संख्या में बड़ा फासला देखने को मिला। भाजपा को 38 प्रतिशत से अधिक वोट मिले थे, जबकि तृणमूल कांग्रेस करीब 45 प्रतिशत मतों के साथ 200 से ज्यादा सीटें जीतने में सफल रही थी। पार्टी के रणनीतिकारों का मानना है कि यदि सीमित वोट स्विंग भी होता है, तो नतीजों में बड़ा बदलाव संभव है।
सीटों की श्रेणी बनाकर तैयारी
सूत्रों के अनुसार भाजपा ने संभावित रूप से जीतने योग्य करीब 160 सीटों की पहचान की है। इनमें वे 77 सीटें शामिल हैं, जहां पार्टी ने पिछली बार जीत दर्ज की थी। इसके अलावा लगभग 50 सीटों को बी श्रेणी में रखा गया है, जहां पार्टी को मजबूत संभावना नजर आ रही है। करीब 50 सीटें ऐसी हैं, जिन्हें सी श्रेणी में रखा गया है और जहां मुकाबला कड़ा रहने की उम्मीद है।
पार्टी की योजना ए और बी श्रेणी की सीटों पर संसाधनों और प्रचार को प्राथमिकता देने की है। वहीं सी श्रेणी वाली सीटों पर स्थानीय समीकरणों और उम्मीदवारों के प्रभाव के आधार पर रणनीति तय की जाएगी। बाकी सीटों पर परिस्थितियों के अनुसार अभियान चलाया जाएगा।
वोट प्रतिशत के गणित पर नजर
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बंगाल में आमतौर पर दो से तीन प्रतिशत वोटों का बदलाव भी नतीजों को प्रभावित कर सकता है। भाजपा के भीतर यह आकलन किया जा रहा है कि यदि तृणमूल कांग्रेस के कुछ प्रतिशत मतदाता उसके पक्ष में आते हैं, तो सीटों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है।
पार्टी का मानना है कि सीधा मुकाबला होने के कारण जनादेश स्पष्ट रहेगा। ऐसे में छोटे-छोटे अंतर भी निर्णायक साबित हो सकते हैं। रणनीति इसी सोच के साथ तैयार की जा रही है कि सीमित वोट स्विंग से भी लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।
रथ यात्रा और प्रचार अभियान
सूत्र बताते हैं कि प्रस्तावित रथ यात्रा का मार्ग इस प्रकार तय किया जा रहा है कि पार्टी की पकड़ वाली अधिकांश सीटें कवर हो सकें। अभियान का उद्देश्य केवल जनसभाएं करना नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं को सक्रिय करना और मतदाताओं तक सीधा संदेश पहुंचाना है।
पार्टी नेतृत्व यह भी कोशिश कर रहा है कि राज्य में बदलाव की भावना को मजबूत किया जाए। कुछ नेताओं का मानना है कि जब जनता के बीच सत्ता परिवर्तन की धारणा बनती है, तो चुनावी परिणाम आंकड़ों से अलग भी हो सकते हैं।
चुनौतियां भी कम नहीं
हालांकि भाजपा के सामने कई चुनौतियां भी हैं। पार्टी को अब भी राज्य में मजबूत और व्यापक रूप से स्वीकार्य बंगाली नेतृत्व की कमी महसूस होती है। दूसरी ओर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद को क्षेत्रीय पहचान और सांस्कृतिक अस्मिता से जोड़कर पेश करती रही हैं, जिसका उन्हें लाभ मिलता रहा है।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि बंगाल की राजनीति में स्थानीय मुद्दे और सामाजिक समीकरण अहम भूमिका निभाते हैं। ऐसे में किसी भी दल के लिए केवल गणितीय आकलन पर्याप्त नहीं होता।
आगे की राह
चुनाव से पहले के महीनों में दोनों प्रमुख दलों की गतिविधियां और तेज होने की संभावना है। भाजपा जहां मिशन 160 को लेकर संगठित तैयारी कर रही है, वहीं तृणमूल कांग्रेस अपने मौजूदा आधार को मजबूत बनाए रखने की कोशिश में है।
अंततः फैसला मतदाताओं के हाथ में होगा। लेकिन इतना तय है कि पश्चिम बंगाल का यह चुनाव राज्य की राजनीति में एक और महत्वपूर्ण अध्याय जोड़ने जा रहा है।



