Breaking News Today: क्या अलग दिखना ही बन गया एंजेल चकमा की मौत का कारण…
Breaking News Today: त्रिपुरा के शांत इलाकों से निकलकर देश की सेवा में जुटे एक बीएसएफ जवान के घर आज मातम पसरा है। एंजेल चकमा, जिसने अभी जीवन की दहलीज पर कदम ही रखा था, नफरत की भेंट चढ़ गया। एक होनहार बेटे का अपने पिता को आराम देने का सपना (Victim Justice) चकनाचूर हो चुका है। चकमा के पिता, जो बीएसएफ में हेड कॉन्स्टेबल के रूप में तैनात हैं, आज अपने उस बेटे की यादों के सहारे जी रहे हैं जिसने कभी किसी का बुरा नहीं चाहा था। बचपन से ही पिता के साथ अलग-अलग बीएसएफ कैंपों में रहने के कारण एंजेल ने हर माहौल में ढलना सीख लिया था, लेकिन उसे क्या पता था कि जिस समाज को वह अपना मान रहा है, वहीं कुछ लोग उसकी जान के दुश्मन बन जाएंगे।

नफरत की आग में झुलसी मासूमियत और नस्लीय दर्द
एंजेल चकमा की हत्या (Breaking News Today) महज एक आपराधिक घटना नहीं है, बल्कि यह उस कड़वी सच्चाई को बयां करती है जहां इंसानियत हार जाती है। पार्टी के दौरान कुछ लोगों ने उन पर सिर्फ इसलिए हमला कर दिया क्योंकि वह उनकी तरह नहीं दिखते थे। यह (Hate Crime Awareness) हमारे समाज के चेहरे पर एक गहरा दाग है। शरीर पर आई गंभीर चोटें इतनी गहरी थीं कि डॉक्टरों की तमाम कोशिशों के बावजूद एंजेल को बचाया नहीं जा सका। पुलिस ने इस मामले में पांच आरोपियों को हिरासत में लिया है, जिनमें दो नाबालिग भी शामिल हैं, जबकि मुख्य आरोपी अभी भी कानून की पहुंच से बाहर है।
पूर्वोत्तर के छात्रों में बढ़ता खौफ और असुरक्षा
इस हृदयविदारक घटना के बाद न केवल त्रिपुरा बल्कि पूरे पूर्वोत्तर भारत के छात्रों में डर और चिंता का माहौल है। जिस असुरक्षा (Northeast Student Safety) की भावना ने एंजेल को अपनी चपेट में लिया, वही डर आज हजारों युवाओं के चेहरों पर साफ देखा जा सकता है। छात्र संगठन और एंजेल के साथी अब इंसाफ की गुहार लगा रहे हैं। लोग सवाल पूछ रहे हैं कि क्या देश के विभिन्न हिस्सों में पढ़ाई या नौकरी करने जाने वाले युवाओं को सिर्फ उनके लुक या उनकी पहचान की वजह से निशाना बनाया जाना जारी रहेगा?
पहली सैलरी और घर लौटने की अधूरी ख्वाहिश
एंजेल ने अभी एक महीने पहले ही फ्रांस की एक नामी मल्टीनेशनल कंपनी में अच्छे पैकेज पर नौकरी जॉइन की थी। अपनी पहली तनख्वाह मिलने के बाद (Job Success Story) उसके मन में ढेर सारे अरमान थे। वह चाहता था कि अब उसके पिता को बॉर्डर पर मेहनत न करनी पड़े। उसने अपने पिता से बड़े गर्व के साथ कहा था कि “पापा, आपने हमारे लिए बहुत कष्ट सहे, अब आप वीआरएस ले लीजिए और आराम कीजिए।” वह अपने कंधों पर परिवार की पूरी जिम्मेदारी उठाने को तैयार था, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।
जिम्मेदार बेटा और भाई का भविष्य संवारने का संकल्प
एंजेल केवल एक बेटा ही नहीं, बल्कि अपने छोटे भाई माइकल के लिए एक आदर्श भी था। रिश्तेदारों का कहना है कि एंजेल ने तय किया था कि वह अपने भाई की पढ़ाई का पूरा खर्च खुद उठाएगा ताकि (Family Responsibility) पिता की आर्थिक चिंताएं कम हो सकें। उसने अपने पिता को सलाह दी थी कि वह अपनी पोस्टिंग गुवाहाटी में करवा लें ताकि वहां से त्रिपुरा का घर पास रहे और पूरा परिवार एक साथ सुकून से रह सके। उसकी बातों में हमेशा अपनों के लिए प्यार और सुरक्षा का भाव झलकता था।
पहाड़ों से मोहब्बत और वो आखिरी ट्रेकिंग शूज
देहरादून से उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले एंजेल को उत्तराखंड की वादियों और ऊंचे पहाड़ों से गहरा लगाव था। वह अक्सर ट्रेकिंग के लिए निकल जाया करता था और (Trekking Adventures) उसका जुनून था। 22 दिसंबर को उसने अपने भाई के साथ चंद्रशिला ट्रेकिंग पर जाने की योजना बनाई थी। इसके लिए उसने ऑनलाइन नए ट्रेकिंग शूज भी ऑर्डर किए थे। विडंबना देखिए कि वह जूता तब घर पहुंचा जब एंजेल इस दुनिया को छोड़कर जा चुका था। वह जूता आज भी घर के कोने में पड़ा अपने मालिक का इंतजार कर रहा है।
वक्त से पहले मिला तजुर्बा और परिपक्वता
एंजेल के मामा मोमेन चकमा बताते हैं कि देश के अलग-अलग कोनों में रहने की वजह से वह अपनी उम्र से कहीं ज्यादा समझदार और जिम्मेदार हो गया था। उसे (Cultural Diversity) बखूबी समझ में आती थी और वह लोगों से बहुत जल्दी दोस्ती कर लेता था। बहस से दूर रहने वाला और हमेशा मुस्कुराने वाला एंजेल जीवन की चुनौतियों को हंसकर स्वीकार करता था। उसकी परिपक्वता ही थी जिसने उसे एक सफल प्रोफेशनल बनाया था, लेकिन उसकी यही सादगी क्रूर हमलावरों को रास नहीं आई।
न्याय की प्रतीक्षा में सिसकता त्रिपुरा का वह घर
आज त्रिपुरा का वह पैतृक घर जहां एंजेल अपने परिवार के साथ सुकून के पल बिताना चाहता था, वहां सन्नाटा पसरा है। एक मां की चीखें और एक फौजी पिता की खामोशी (Justice For Victim) की मांग कर रही है। कानून अपनी कार्रवाई कर रहा है, लेकिन क्या वह एंजेल के उन सपनों को लौटा पाएगा जो एक नई नौकरी और पहली सैलरी के साथ शुरू हुए थे? समाज को आज आत्ममंथन करने की जरूरत है कि आखिर कब तक रंग-रूप और पहचान के नाम पर बेगुनाहों का खून बहता रहेगा।



