CalcuttaHighCourt – सहमति संबंधों को रेप मानने से अदालत का इनकार
CalcuttaHighCourt – कलकत्ता हाईकोर्ट ने शादी के वादे और सहमति से बने संबंधों से जुड़े एक मामले में अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी रिश्ते का अंत कड़वाहट में होता है या विवाह नहीं हो पाता, तो मात्र इस आधार पर पहले बने सहमति वाले शारीरिक संबंधों को बलात्कार नहीं माना जा सकता। न्यायालय ने कहा कि ऐसे मामलों में यह साबित होना जरूरी है कि शुरुआत से ही आरोपी का इरादा धोखा देने का था।

मामले की पृष्ठभूमि
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह मामला वर्ष 2017 में शुरू हुए एक रिश्ते से जुड़ा है। महिला ने आरोप लगाया था कि आरोपी ने शादी का वादा कर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए और बाद में वादा निभाने से इनकार कर दिया। शिकायत में यह भी कहा गया कि वर्ष 2018 में उसे नशीला पदार्थ देकर दुष्कर्म किया गया और बाद में वर्ष 2020 में गर्भवती होने पर गर्भपात कराया गया।
महिला ने दावा किया कि वह शादी के आश्वासन के कारण चुप रहीं और संबंध जारी रखा। जब आरोपी ने विवाह से इनकार किया, तब फरवरी 2022 में पश्चिम मिदनापुर में प्राथमिकी दर्ज कराई गई। इसके बाद आरोपी को गिरफ्तार भी किया गया था।
अदालत की टिप्पणी
मामले की सुनवाई कर रहीं न्यायमूर्ति चैताली चटर्जी (दास) ने कहा कि यदि यह साबित नहीं होता कि संबंध की शुरुआत ही छल या गलत मंशा से हुई थी, तो केवल बाद में विवाह न होने को बलात्कार का आधार नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने कहा कि दोनों वयस्कों के बीच लंबे समय तक चले रिश्ते और उनके व्यवहार से आपसी सहमति के संकेत मिलते हैं।
न्यायालय ने अपने आदेश में उल्लेख किया कि दोनों पक्ष कई वर्षों तक साथ रहे, अलग-अलग स्थानों की यात्राएं कीं और होटल में साथ ठहरे। रिकॉर्ड में यह भी सामने आया कि महिला के गर्भवती होने के बाद गर्भपात दोनों की सहमति से कराया गया।
रिश्ते की अवधि और व्यवहार
अदालत ने कहा कि वर्ष 2017 से 2022 तक संबंध जारी रहा। इस दौरान महिला ने किसी प्रकार की आपत्ति या शिकायत दर्ज नहीं कराई। न्यायालय ने यह भी कहा कि उपलब्ध तथ्यों से यह स्पष्ट नहीं होता कि महिला लंबे समय तक किसी भ्रम या दबाव में थीं।
जज ने टिप्पणी की कि यदि किसी रिश्ते में दोनों पक्ष स्वेच्छा से शामिल हों और साथ रहने का निर्णय लें, तो बाद में मतभेद या अलगाव होने से पूर्व सहमति वाले संबंध स्वतः आपराधिक श्रेणी में नहीं आ जाते।
केस रद्द करने का निर्णय
इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने आरोपी के खिलाफ दर्ज मामला निरस्त कर दिया। अदालत का मानना था कि उपलब्ध साक्ष्य बलात्कार के आरोप को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।
हालांकि, न्यायालय ने यह भी दोहराया कि हर मामला अपने तथ्यों के आधार पर अलग-अलग परखा जाता है। यदि किसी मामले में शुरुआत से ही धोखाधड़ी का स्पष्ट इरादा साबित होता है, तो कानून के तहत कड़ी कार्रवाई संभव है।
व्यापक कानूनी परिप्रेक्ष्य
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि शादी के वादे पर बने संबंधों से जुड़े मामलों में अदालतें यह देखती हैं कि क्या सहमति वास्तविक थी या किसी झूठे आश्वासन के कारण प्राप्त की गई। इस फैसले से यह संकेत मिलता है कि लंबे समय तक चले रिश्ते और दोनों पक्षों के व्यवहार का मूल्यांकन अहम भूमिका निभाता है।
फिलहाल, यह निर्णय सहमति और आपराधिक आरोपों की कानूनी परिभाषा को लेकर एक महत्वपूर्ण संदर्भ के रूप में देखा जा रहा है।



