राष्ट्रीय

DefenceDeal – भारत में बनेगी राफेल की ताकत हैमर मिसाइल

DefenceDeal – भारत और फ्रांस के बीच रक्षा सहयोग एक नए चरण में पहुंच गया है। दोनों देशों ने हवा से जमीन पर मार करने वाली हैमर मिसाइलों के निर्माण के लिए संयुक्त उपक्रम स्थापित करने पर सहमति जताई है। इस समझौते के तहत फ्रांस की कंपनी सैफरान और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (बीईएल) बराबर की हिस्सेदारी के साथ भारत में ही इन मिसाइलों का उत्पादन करेंगी। यह पहल ऐसे समय में सामने आई है जब देश में राफेल लड़ाकू विमानों के निर्माण की दिशा में भी तैयारी चल रही है।

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राफेल की मारक क्षमता को मिलेगी मजबूती

राफेल लड़ाकू विमान भारतीय वायुसेना की प्रमुख ताकत माने जाते हैं। इन विमानों की सटीक हमलावर क्षमता में हैमर मिसाइलों की अहम भूमिका होती है। अब तक इन मिसाइलों की आपूर्ति फ्रांस से की जाती रही है, लेकिन नए समझौते के बाद इनका उत्पादन देश में ही संभव हो सकेगा। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इससे आपूर्ति शृंखला पर निर्भरता कम होगी और संचालन क्षमता में निरंतरता बनी रहेगी।

संयुक्त उपक्रम की रूपरेखा

मंगलवार को हुए औपचारिक समझौते के अनुसार, सैफरान और बीईएल 50-50 प्रतिशत की भागीदारी के साथ नई इकाई स्थापित करेंगे। यह मिसाइल निर्माण के क्षेत्र में रूस के साथ ब्रह्मोस परियोजना के बाद भारत का दूसरा बड़ा अंतरराष्ट्रीय सहयोग होगा। इस पहल को रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

मारक दूरी और तकनीकी विशेषताएं

हैमर मिसाइलें हवा से जमीन पर सटीक प्रहार करने में सक्षम हैं। इनकी प्रभावी मारक दूरी लगभग 70 किलोमीटर तक बताई जाती है। विभिन्न संस्करणों में यह अलग-अलग क्षमता के बम और विस्फोटक ले जा सकती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, इन मिसाइलों को इस तरह डिजाइन किया गया है कि वे लक्ष्य पर उच्च सटीकता के साथ हमला कर सकें।

मौजूदा बेड़े में उपयोग

भारतीय वायुसेना के पास वर्तमान में 36 राफेल विमान हैं और उनमें हैमर मिसाइलों का उपयोग किया जा रहा है। इसके अलावा कुछ मिराज विमानों में भी इन्हें एकीकृत किया गया है। भविष्य में नौसेना के लिए 26 राफेल विमानों की आपूर्ति की योजना है, जबकि वायुसेना के लिए अतिरिक्त 114 विमानों की खरीद प्रक्रिया भी आगे बढ़ रही है। ऐसे में मिसाइलों की घरेलू उपलब्धता रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

सुरक्षा अभियानों में भूमिका

रक्षा विश्लेषकों का कहना है कि यह मिसाइल प्रणाली सीमापार स्थित आतंकी ठिकानों और मजबूत बंकरों को निशाना बनाने में प्रभावी साबित हुई है। इसे लेजर और उपग्रह आधारित मार्गदर्शन प्रणाली से लैस किया गया है, जिससे हर मौसम में संचालन संभव होता है। पूर्व अभियानों में इनकी सटीकता का परीक्षण किया जा चुका है, जिससे वायुसेना को भरोसेमंद विकल्प मिला है।

आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम

देश में मिसाइल निर्माण से न केवल तकनीकी क्षमता का विस्तार होगा, बल्कि रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में रोजगार और अनुसंधान को भी बढ़ावा मिलेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के संयुक्त उपक्रम से दीर्घकाल में निर्यात की संभावनाएं भी खुल सकती हैं। भारत की रक्षा नीति में स्वदेशी निर्माण को प्राथमिकता दी जा रही है और यह समझौता उसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

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