HD Revanna Acquittal Case: सत्ता के गलियारों में गूंजा न्याय का फैसला, एचडी रेवन्ना को मिली बड़ी राहत
HD Revanna Acquittal Case: कर्नाटक की राजनीति में उस वक्त एक बड़ा मोड़ आ गया जब बेंगलुरु की एक विशेष अदालत ने जनता दल (सेक्युलर) के कद्दावर नेता और पूर्व मंत्री एचडी रेवन्ना को यौन उत्पीड़न के एक गंभीर मामले से बरी कर दिया। अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के एन शिवकुमार ने इस बहुचर्चित (Judicial Verdict) को सुनाते हुए होलेनारसीपुर टाउन थाने में दर्ज मुकदमे पर अपना फैसला दिया। इस निर्णय के बाद रेवन्ना समर्थकों में खुशी की लहर दौड़ गई है, जबकि कानूनी गलियारों में अदालत द्वारा दी गई दलीलों पर गहन चर्चा शुरू हो गई है।

शिकायत में देरी बनी बरी होने का मुख्य आधार
अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया कि आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 354ए के तहत शिकायत दर्ज करने में हुई अत्यधिक देरी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। न्यायाधीश ने कहा कि (Legal Prosecution) की प्रक्रिया शुरू करने में जो समय बीता, उसके पीछे के ठोस कारणों का अभाव दिख रहा है। इसी तकनीकी और प्रक्रियात्मक कमी को आधार बनाते हुए अदालत ने आरोपी नंबर एक के खिलाफ लगाए गए दंडनीय अपराध के आरोपों का संज्ञान लेने से साफ इनकार कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें दोषमुक्त करार दिया गया।
हाईकोर्ट के निर्देश और निचली अदालत का गहन विश्लेषण
इससे पहले यह मामला कर्नाटक उच्च न्यायालय के समक्ष भी पहुंचा था, जहां एचडी रेवन्ना ने अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने की याचिका दायर की थी। उच्च न्यायालय ने मामले की गंभीरता को देखते हुए इसे वापस निचली अदालत को भेज दिया था ताकि वह (Statute of Limitations) और शिकायत में हुई चार साल की लंबी देरी के कानूनी पहलुओं की जांच कर सके। निचली अदालत ने इसी बिंदु पर ध्यान केंद्रित किया कि क्या इतने वर्षों बाद दर्ज कराई गई शिकायत की विश्वसनीयता को बरकरार रखा जा सकता है।
प्रज्वल रेवन्ना मामले से जुड़ी थीं कड़ियां
एचडी रेवन्ना पर यौन उत्पीड़न के ये आरोप उस समय लगे थे जब उनके बेटे और हासन के पूर्व सांसद प्रज्वल रेवन्ना के खिलाफ बलात्कार और यौन शोषण के कई वीभत्स मामले सामने आए थे। उस दौर में (Criminal Investigation) के दौरान एक महिला शिकायतकर्ता ने पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा के बेटे रेवन्ना पर भी उत्पीड़न के आरोप लगाए थे। पिता और पुत्र दोनों पर एक साथ कानूनी शिकंजा कसने से जेडीएस पार्टी की छवि पर भी गहरा असर पड़ा था, जिसे अब इस फैसले से कुछ हद तक राहत मिली है।
प्रज्वल रेवन्ना की बढ़ती मुश्किलें और कानूनी पेच
जहां एक तरफ पिता को राहत मिली है, वहीं प्रज्वल रेवन्ना के लिए मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। प्रज्वल को पहले ही यौन शोषण के एक मामले में दोषी ठहराया जा चुका है और उनके खिलाफ अन्य (Sexual Assault Charges) की सुनवाई जारी है। हालांकि एचडी रेवन्ना के मामले में अदालत ने समय सीमा को महत्व दिया, लेकिन प्रज्वल के खिलाफ मौजूद साक्ष्यों और गवाहों ने उनके मामले को अत्यंत पेचीदा बना दिया है, जिससे रेवन्ना परिवार की कानूनी लड़ाई अभी समाप्त नहीं हुई है।
सुप्रीम कोर्ट से प्रज्वल रेवन्ना को नहीं मिली राहत
हाल ही में 11 दिसंबर को देश की सर्वोच्च अदालत ने प्रज्वल रेवन्ना की उस याचिका को खारिज कर दिया था जिसमें उन्होंने अपने मामलों को दूसरी अदालत में स्थानांतरित करने की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट की (Judiciary Independence) पर भरोसा जताते हुए पीठ ने कहा कि न्यायाधीश की टिप्पणियों को पक्षपात का आधार नहीं बनाया जा सकता। इस झटके के बाद रेवन्ना परिवार को उम्मीद थी कि कम से कम एचडी रेवन्ना के मामले में कुछ सकारात्मक निकलकर आएगा, जो आखिरकार सोमवार को सच साबित हुआ।
राजनीतिक भविष्य और जेडीएस की साख पर प्रभाव
इस फैसले के बाद अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या एचडी रेवन्ना अपनी राजनीतिक जमीन को फिर से मजबूत कर पाएंगे। यौन उत्पीड़न जैसे संगीन आरोपों से (Public Image) को जो नुकसान पहुंचा था, उसे ठीक करने में समय लगेगा। हालांकि, अदालत द्वारा बरी किए जाने को उनके समर्थक उनकी बेगुनाही की जीत के रूप में देख रहे हैं। विपक्षी दल अभी भी इस मामले में नैतिक आधार पर सवाल उठा रहे हैं, लेकिन कानूनी रूप से रेवन्ना ने एक बड़ी बाधा पार कर ली है।
न्याय प्रणाली और विलंब पर छिड़ी नई बहस
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस केस ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि समय पर न्याय की मांग करना कितना अनिवार्य है। अदालत का यह मानना कि (Victim Rights) के साथ-साथ अभियुक्त के अधिकारों का भी ध्यान रखा जाना चाहिए, एक महत्वपूर्ण नजीर पेश करता है। चार साल की देरी ने अभियोजन पक्ष के दावों को कमजोर कर दिया, जिससे एक हाई-प्रोफाइल आरोपी को कानून की बारीकियों का लाभ मिला। अब देखना होगा कि क्या शिकायतकर्ता पक्ष इस फैसले के खिलाफ ऊपरी अदालत का दरवाजा खटखटाता है।



