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Madhya Pradesh High Court: इंदौर पेयजल संकट पर हाईकोर्ट सख्त, न्यायिक जांच आयोग गठित

Madhya Pradesh High Court: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने इंदौर में दूषित पेयजल से फैली बीमारी और उससे जुड़ी मौतों के मामले को गंभीर मानते हुए इसकी न्यायिक जांच के आदेश दिए हैं। इंदौर बेंच ने कहा कि प्रथम दृष्टया हालात चिंताजनक हैं और पूरे मामले की स्वतंत्र व निष्पक्ष जांच बेहद जरूरी है। इसी के साथ अदालत ने एक सदस्यीय न्यायिक आयोग के गठन का निर्देश देते हुए अंतरिम रिपोर्ट जमा करने की समय-सीमा भी तय कर दी है।

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देर रात जारी हुआ विस्तृत आदेश

न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की खंडपीठ ने दिनभर चली सुनवाई के बाद आदेश सुरक्षित रखा था, जिसे देर रात जारी किया गया। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने भागीरथपुरा क्षेत्र में फैली गैस्ट्रोएंटेराइटिस जैसी बीमारी से हुई मौतों को लेकर एक ऑडिट रिपोर्ट अदालत में पेश की। इस रिपोर्ट में कुल 23 मौतों का उल्लेख किया गया, जिनमें से 16 मौतों का संभावित कारण दूषित पानी से हुई उल्टी-दस्त की बीमारी बताया गया।

सरकारी रिपोर्ट पर अदालत की शंका

राज्य सरकार की ओर से प्रस्तुत रिपोर्ट इंदौर के महात्मा गांधी मेमोरियल मेडिकल कॉलेज के पांच विशेषज्ञों की समिति ने तैयार की थी। रिपोर्ट में दावा किया गया कि चार मौतों का इस बीमारी से कोई संबंध नहीं था, जबकि तीन मामलों में मौत के कारण को लेकर कोई स्पष्ट निष्कर्ष नहीं निकाला जा सका। अदालत ने सुनवाई के दौरान सरकार से पूछा कि इन निष्कर्षों का वैज्ञानिक आधार क्या है और किन तथ्यों के आधार पर यह वर्गीकरण किया गया।

‘वर्बल ऑटोप्सी’ शब्द पर आपत्ति

रिपोर्ट में इस्तेमाल किए गए ‘वर्बल ऑटोप्सी’ शब्द पर अदालत ने हैरानी जताई। पीठ ने कहा कि उसने यह शब्द पहली बार सुना है और इस तरह की शब्दावली स्थिति की गंभीरता को कम नहीं कर सकती। अदालत ने यह भी नोट किया कि इंदौर के पास महू क्षेत्र से भी दूषित पानी पीने के कारण लोगों के बीमार पड़ने की खबरें सामने आई हैं। याचिकाकर्ताओं और मीडिया रिपोर्टों में मृतकों की संख्या लगभग 30 बताई गई है, जबकि सरकारी रिपोर्ट में इसका स्पष्ट और ठोस आधार नजर नहीं आता।

स्वतंत्र जांच की आवश्यकता पर जोर

याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि पानी की पाइपलाइनों में लीकेज, सीवेज का मिलना और जल शुद्धिकरण मानकों की अनदेखी के कारण यह संकट पैदा हुआ। अदालत के समक्ष प्रस्तुत तस्वीरें, मेडिकल दस्तावेज और प्रशासन को दी गई शिकायतें इस ओर संकेत करती हैं कि मामला गंभीर है और इसकी जांच किसी स्वतंत्र व विश्वसनीय प्राधिकरण से कराई जानी चाहिए। अदालत ने माना कि आरोपों की प्रकृति ऐसी है, जिसमें निष्पक्ष जांच के बिना सच्चाई सामने नहीं आ सकती।

एक सदस्यीय न्यायिक आयोग का गठन

इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति सुशील कुमार गुप्ता को एक सदस्यीय न्यायिक जांच आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया है। आयोग इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में सप्लाई किए गए पानी की गुणवत्ता, उसमें गंदगी के स्रोत और स्वरूप की जांच करेगा। इसमें यह भी देखा जाएगा कि क्या पानी में सीवेज, औद्योगिक अपशिष्ट या पाइपलाइन की खराबी के कारण प्रदूषण फैला।

आयोग को दी गई व्यापक शक्तियां

अदालत ने आदेश में कहा कि आयोग को दीवानी अदालत जैसी शक्तियां प्राप्त होंगी। वह किसी भी अधिकारी या गवाह को तलब कर सकेगा और सरकारी विभागों, अस्पतालों, प्रयोगशालाओं तथा नगर निकायों से आवश्यक रिकॉर्ड मांग सकेगा। आयोग का दायित्व होगा कि वह जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों की पहचान कर उनकी भूमिका तय करे और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के उपाय सुझाए।

मुआवजे को लेकर उठी मांग

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के वकील ने यह भी मांग रखी कि जिन परिवारों ने दूषित पानी के कारण अपने परिजन खोए हैं, उन्हें वर्तमान में दिए जा रहे दो लाख रुपये के बजाय दस लाख रुपये का मुआवजा मिलना चाहिए। प्रशासन की ओर से अदालत को बताया गया कि अब तक 20 से अधिक मृतकों के परिजनों को दो-दो लाख रुपये की सहायता राशि दी जा चुकी है। इस मुद्दे पर अंतिम निर्णय जांच रिपोर्ट के बाद लिए जाने की संभावना है।

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