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Martyr Havildar Gajendra Singh Last Rites: शहीद की शहादत को सलाम लेकिन सिस्टम ने झुकाया सिर, बुजुर्ग माता-पिता ने किए लाल के अंतिम दर्शन

Martyr Havildar Gajendra Singh Last Rites: जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ में आतंकियों से लोहा लेते हुए अपनी जान न्यौछावर करने वाले हवलदार गजेंद्र सिंह गड़िया की बहादुरी ने पूरे देश का सीना गर्व से चौड़ा कर दिया है। उत्तराखंड के बागेश्वर जिले के कपकोट स्थित बीथी पन्याती गांव के रहने वाले इस वीर सपूत ने (Indian Army Martyrdom) की गौरवशाली परंपरा को निभाते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया। शहीद गजेंद्र सिंह की शहादत की खबर जैसे ही उनके पैतृक निवास पहुंची, पूरे इलाके में मातम छा गया और हर आंख नम हो गई।

Martyr Havildar Gajendra Singh Last Rites
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विकास के दावों की खुली पोल और माता-पिता की बेबसी

शहादत के गौरव के बीच एक ऐसी तस्वीर सामने आई जिसने प्रशासनिक दावों और जमीनी हकीकत के अंतर को उजागर कर दिया है। शहीद के गांव तक पक्की सड़क न होने के कारण उनके पार्थिव शरीर को घर तक ले जाना (Infrastructure Development Issues) की कमी की वजह से संभव नहीं हो सका। यह बेहद हृदयविदारक था कि जिस बेटे ने देश की सीमाओं की रक्षा के लिए अपने प्राण दिए, उसका शव उसके अपने आंगन तक भी नहीं पहुंच पाया।

चार किलोमीटर पैदल चलने को मजबूर बुजुर्ग माता-पिता

अपने लाडले के आखिरी दीदार के लिए शहीद के बुजुर्ग माता-पिता को उम्र के इस पड़ाव में भारी शारीरिक कष्ट झेलना पड़ा। सड़क के अभाव में मां चंद्रावती देवी और पिता धन सिंह को पहले चार किलोमीटर का पथरीला रास्ता (Difficult Mountain Terrain) पार कर पैदल चलना पड़ा। इसके बाद वे वाहन के जरिए 13 किलोमीटर का सफर तय कर कपकोट डिग्री कॉलेज मैदान पहुंचे, जहां उनके शहीद बेटे का पार्थिव शरीर अंतिम दर्शनों के लिए रखा गया था।

गांव वालों का गुस्सा और प्रशासन की दलीलें

शहीद के गांव बीथी पन्याती में सड़क न होने से केवल अंतिम विदाई में ही दिक्कत नहीं आई, बल्कि ग्रामीण वर्षों से इस समस्या से जूझ रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि सड़क न होने से (Rural Area Connectivity) पूरी तरह ठप है और आज भी मरीजों या गर्भवती महिलाओं को डोली में रखकर मुख्य मार्ग तक लाना पड़ता है। हालांकि, प्रशासन का कहना है कि अंतिम संस्कार स्थल का चुनाव सेना और शहीद के परिजनों के बीच आपसी सहमति से लिया गया निर्णय था।

सरयू के तट पर गूंजा भारत माता की जय का नारा

शहीद गजेंद्र सिंह गड़िया का पार्थिव शरीर जैसे ही सेना के हेलीकॉप्टर से कपकोट पहुंचा, पूरी घाटी ‘भारत माता की जय’ और ‘शहीद गजेंद्र सिंह अमर रहे’ के नारों से गूंज उठी। तिरंगे में लिपटे अपने वीर बेटे को देखकर (Nationalistic Emotions) से ओतप्रोत हजारों लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा। हर किसी की आंखों में आंसू थे, लेकिन दिल में इस बात का गर्व था कि उनके क्षेत्र के एक नौजवान ने मातृभूमि की रक्षा में अपनी आहुति दी है।

पूर्व विधायक के गांव की बदहाली पर उठे गंभीर सवाल

हैरानी की बात यह है कि बीथी पन्याती गांव उसी क्षेत्र के पूर्व विधायक शेर सिंह गड़िया का भी मूल निवास है, फिर भी यहां सड़क का निर्माण आज तक नहीं हो सका। ग्रामीणों के अनुसार (Basic Public Facilities) के लिए वे दशकों से गुहार लगा रहे हैं, लेकिन पोथिंग के बलिया पालत तक ही सड़क पहुंच पाई है। वहां से आगे का सफर आज भी दुर्गम चढ़ाई और ढलान के बीच पैदल ही तय करना पड़ता है, जो एक शहीद के गांव के लिए शर्मनाक है।

सैन्य सम्मान के साथ पंचतत्व में विलीन हुए वीर गजेंद्र

कपकोट के सरयू और खीरगंगा के पवित्र संगम पर शहीद गजेंद्र सिंह को पूरे सैन्य सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई। सेना की टुकड़ी ने गार्ड ऑफ ऑनर दिया और (Military Funeral Traditions) के अनुसार उन्हें अंतिम सलामी दी गई। जब शहीद के पिता ने अपने कलेजे के टुकड़े को मुखाग्नि दी, तो वहां मौजूद हर शख्स की रूह कांप गई। नम आंखों के बीच एक वीर नायक का सफर तो थम गया, लेकिन उसकी बहादुरी की कहानियां हमेशा जिंदा रहेंगी।

सिस्टम की नाकामी पर भारी पड़ी शहीद की विरासत

यह घटना याद दिलाती है कि हमारे जवान सीमाओं पर अपना वर्तमान देश के भविष्य के लिए कुर्बान कर देते हैं, लेकिन पीछे छूटे उनके परिवार को बुनियादी सुविधाओं के लिए भी (Government System Failure) का सामना करना पड़ता है। गजेंद्र सिंह की शहादत ने न केवल आतंकियों के खात्मे का संकल्प दोहराया है, बल्कि पहाड़ के दूरस्थ गांवों की बदहाली की ओर भी सबका ध्यान खींचा है। अब देखना होगा कि क्या इस बलिदान के बाद प्रशासन की नींद खुलती है या नहीं।

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