Social Activist Yogita Bhayana: जानें, कौन हैं न्याय की मशाल लेकर अंधेरों से लड़ती योगिता भयाना, जिसने सत्ता के गुरूर को किया चकनाचूर…
Social Activist Yogita Bhayana: उन्नाव रेप कांड की भयावहता ने जब पूरे देश की रूह को कंपा दिया था, तब एक चेहरा ऐसा था जो सत्ता और रसूख के खिलाफ चट्टान बनकर खड़ा हो गया। योगिता भयाना ने इस मामले के मुख्य आरोपी कुलदीप सेंगर को मिलने वाली हर रियायत का पुरजोर विरोध किया। जब दिल्ली हाई कोर्ट ने सेंगर की सजा को सस्पेंड करने का आदेश दिया, तब योगिता ही थीं जिन्होंने (legal advocacy for victims) के माध्यम से इस फैसले को चुनौती देने की अलख जगाई। वह केवल एक प्रदर्शनकारी नहीं, बल्कि पीड़िता की मां के लिए एक ऐसी ढाल बनीं, जिसने इंसाफ की उम्मीद को कभी टूटने नहीं दिया।

जंतर-मंतर से संसद तक गूंजी न्याय की हुंकार
योगिता भयाना का संघर्ष केवल सोशल मीडिया तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने सड़कों पर उतरकर व्यवस्था को आईना दिखाया। आरोपी कुलदीप सेंगर की जेल से रिहाई को रोकने के लिए उन्होंने (protest against injustice) का रास्ता चुना और जंतर-मंतर से लेकर संसद भवन के गलियारों तक अपनी आवाज पहुंचाई। दिल्ली हाई कोर्ट के बाहर उनके प्रदर्शनों ने न्यायपालिका और सरकार दोनों का ध्यान इस संवेदनशील मुद्दे की ओर खींचा। उनका स्पष्ट मानना था कि एक बलात्कारी का जेल से बाहर आना समाज की सुरक्षा और पीड़िता के हौसले पर सबसे बड़ा प्रहार है।
पीपीआरआई के जरिए रेप पीड़ितों की मसीहा बनीं
योगिता भयाना केवल एक आंदोलनकारी नहीं हैं, बल्कि वे एक सुव्यवस्थित संगठन ‘पीपल अगेंस्ट रेप इन इंडिया’ (PPRI) की प्रमुख के रूप में कार्य कर रही हैं। दिल्ली की रहने वाली योगिता अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति की एक सक्रिय कार्यकर्ता भी हैं। उनका यह संगठन (empowering rape survivors) की दिशा में काम करता है और उन्हें कानूनी व सामाजिक मदद मुहैया कराता है। इसके अलावा, उन्होंने दिल्ली में 200 से अधिक बेघर आश्रयों का संचालन कर मानवता की मिसाल पेश की है। उनका ‘नारी के 2 दिन’ अभियान आज भी चर्चा में है, जो महिलाओं के मुद्दों पर संसद का विशेष सत्र बुलाने की मांग करता है।
आपदा प्रबंधन की पढ़ाई और सामाजिक बदलाव का सफर
योगिता की शैक्षणिक पृष्ठभूमि और उनके अनुभव उन्हें अन्य कार्यकर्ताओं से अलग बनाते हैं। डिजास्टर मैनेजमेंट में पोस्ट ग्रेजुएट करने के बाद उन्होंने (professional social work) के क्षेत्र में कदम रखा। वह राष्ट्रीय महिला आयोग की विशेषज्ञ समितियों और दिल्ली सरकार के विभिन्न बोर्डों की महत्वपूर्ण सदस्य रही हैं। उनके सामाजिक कार्यकर्ता बनने की कहानी भी काफी मार्मिक है। एक सड़क हादसे के दौरान पुलिस और अस्पताल प्रशासन की संवेदनहीनता ने उन्हें इतना झकझोर दिया कि उन्होंने अपना जीवन दूसरों की मदद के लिए समर्पित कर दिया। 2012 के निर्भया कांड में भी उनकी सक्रियता ने देश को एकजुट करने में बड़ी भूमिका निभाई थी।
कोरोना काल में फरिश्ता बनकर बचाई बेसहारा लोगों की जान
जब साल 2020 में पूरी दुनिया कोविड-19 की महामारी से सहमी हुई थी, तब योगिता भयाना दिल्ली की सड़कों पर उन लोगों की तलाश कर रही थीं जिन्हें इलाज नहीं मिल पा रहा था। एम्स जैसे बड़े अस्पतालों से जब गंभीर मरीजों को वापस भेज दिया गया, तब उन्होंने (humanitarian aid during covid) का जिम्मा संभाला। कैंसर, हृदय रोग और जलने से घायल मरीजों को उनके घरों तक सुरक्षित पहुंचाने के लिए उन्होंने निजी खर्च पर बसों का इंतजाम किया। यह उनके व्यक्तित्व का वह पहलू था जिसने साबित किया कि उनकी संवेदनाएं केवल मंचों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे धरातल पर उतरकर लोगों के आंसू पोंछना जानती हैं।
किसानों का समर्थन और व्यवस्था के दमन के खिलाफ जंग
योगिता भयाना ने हमेशा दबे-कुचले लोगों की आवाज उठाई है, फिर चाहे वह रेप पीड़िता हो या अपने हक के लिए लड़ता किसान। तीन केंद्रीय कृषि कानूनों के विरोध में जब किसान सड़कों पर थे, तब योगिता ने (freedom of speech) का समर्थन करते हुए उनके पक्ष में आवाज उठाई। इसके बदले उन्हें दिल्ली पुलिस का नोटिस भी झेलना पड़ा, जिसे उन्होंने आवाज दबाने की कोशिश बताया। इतना ही नहीं, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कार्यालय के बाहर भी उन्होंने एक अन्य रेप पीड़िता के न्याय के लिए प्रदर्शन किया, जो उनकी निडरता को दर्शाता है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने बढ़ाया कानून पर भरोसा
कुलदीप सेंगर की जमानत पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा रोक लगाए जाने के बाद योगिता भयाना की आंखों में जीत की चमक साफ देखी जा सकती थी। उन्होंने इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि (judicial sensitivity in India) की जीत हुई है। योगिता ने इसके लिए मीडिया और सर्वोच्च न्यायालय का आभार व्यक्त किया। उनका मानना है कि इस तरह के कड़े फैसलों से देश की उन करोड़ों बेटियों को संदेश मिलता है कि उनके साथ होने वाले अन्याय के खिलाफ देश का कानून पूरी ताकत से खड़ा है।
निष्कर्ष: एक निस्वार्थ योद्धा की निरंतर लड़ाई
योगिता भयाना का जीवन आज की युवा पीढ़ी के लिए एक प्रेरणा है। उन्होंने साबित किया है कि अगर इरादे नेक हों और दिल में दूसरों के प्रति करुणा हो, तो बड़ी से बड़ी शक्तियों को भी घुटने टेकने पर मजबूर किया जा सकता है। उनकी यह (fight for gender justice) अभी थमी नहीं है। वे आज भी हर उस जगह खड़ी नजर आती हैं जहां किसी महिला की अस्मत के साथ खिलवाड़ होता है। समाज को आज ऐसी ही और योगिता भयानाओं की जरूरत है जो डर को पीछे छोड़कर न्याय की मशाल को जलाए रखें।



