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TempleControl – लखनऊ में मंदिर प्रबंधन पर बोले मोहन भागवत

TempleControl – राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने बुधवार को लखनऊ में आयोजित एक प्रमुख जन गोष्ठी में मंदिरों के प्रबंधन, सामाजिक एकता और देश की आर्थिक स्थिति जैसे मुद्दों पर विस्तार से अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि मंदिरों का संचालन भक्तों और धर्माचार्यों के हाथों में होना चाहिए, लेकिन इसके लिए समाज को संगठित और तैयार होने की आवश्यकता है। उनके अनुसार, इस दिशा में विश्व हिंदू परिषद सहित कई संगठन प्रयास कर रहे हैं।

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मंदिरों के संचालन पर स्पष्ट रुख

डॉ. भागवत ने कहा कि मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं, बल्कि समाज के सांस्कृतिक जीवन का केंद्र होते हैं। ऐसे में उनका प्रबंधन सरकार के बजाय श्रद्धालुओं और धर्माचार्यों द्वारा किया जाना अधिक उपयुक्त होगा। हालांकि उन्होंने यह भी जोड़ा कि किसी भी परिवर्तन से पहले ठोस तैयारी जरूरी है। उन्होंने संकेत दिया कि समाज यदि संगठित रूप से आगे आए तो यह व्यवस्था व्यवहारिक रूप ले सकती है। उनके मुताबिक, यह विषय केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक जिम्मेदारी से जुड़ा है।

हिंदू समाज और पंथनिरपेक्षता पर विचार

अपने संबोधन में उन्होंने हिंदू धर्म को मानवता पर आधारित व्यवस्था बताया। उनका कहना था कि विविधता को स्वीकार करने की परंपरा हिंदू समाज में लंबे समय से रही है। उन्होंने कहा कि अलग-अलग जाति, पंथ और संप्रदाय की पहचान से ऊपर उठकर समाज को एक साझा पहचान पर बल देना चाहिए। सामाजिक समरसता को उन्होंने राष्ट्रीय एकता की बुनियाद बताया और कहा कि आपसी सद्भाव ही समाज को मजबूत बनाता है।

वैश्विक हालात और भारत की भूमिका

डॉ. भागवत ने अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत आने वाले समय में वैश्विक दक्षिण के देशों के बीच नेतृत्व की भूमिका निभा सकता है। उन्होंने आर्थिक दबावों और टैरिफ से जुड़े मुद्दों पर कहा कि भारत की अर्थव्यवस्था केवल बड़े उद्योगों या बैंकों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी ताकत घर-घर में मौजूद है। उनका विश्वास था कि देश बाहरी दबावों का सामना करने में सक्षम है और समय के साथ परिस्थितियां संतुलित हो जाएंगी।

जाति व्यवस्था पर संघ का दृष्टिकोण

उन्होंने कहा कि संघ की कार्यपद्धति में किसी से जाति नहीं पूछी जाती। उनके अनुसार, नई पीढ़ी के व्यवहार में भी जातिगत भेदभाव कम होता दिख रहा है। समाज से जाति की भावना को समाप्त करने के लिए उसे व्यवहार से हटाना जरूरी है। उन्होंने सभी को सहोदर भाव से काम करने का आह्वान किया और कहा कि एकता की भावना ही सामाजिक परिवर्तन का आधार बन सकती है।

परिवार, संस्कार और शिक्षा पर जोर

डॉ. भागवत ने संयुक्त परिवार व्यवस्था में आ रहे बदलावों पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि आधुनिकता को अपनाने में कोई हानि नहीं, लेकिन अपनी सांस्कृतिक जड़ों से दूरी नहीं होनी चाहिए। बच्चों को परिवार के इतिहास, परंपराओं और रिश्तों से परिचित कराना आवश्यक है। उन्होंने सुझाव दिया कि परिवार वर्ष में कम से कम एक बार एकत्रित हों ताकि पीढ़ियों के बीच संवाद बना रहे। उनके अनुसार, धर्म और संस्कार की प्रारंभिक शिक्षा घर से ही शुरू होनी चाहिए।

गांवों के विकास का उल्लेख

संघ के कार्यों का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि संगठन व्यक्ति निर्माण के माध्यम से समाज परिवर्तन का प्रयास करता है। देश भर में हजारों गांवों को विकास के लिए चिन्हित किया गया है, जिनमें से सैकड़ों गांवों में उल्लेखनीय बदलाव देखने को मिले हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि कई स्थानों पर ग्रामीणों ने स्वयं आगे आकर शिक्षा और आधारभूत सुविधाओं का विकास किया है। उनका मानना है कि जब समाज आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम बढ़ाता है तो सकारात्मक परिणाम सामने आते हैं।

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