Weather Forecast India 2026: 2026 की शुरुआत में मौसम के बदलते मिजाज ने बदल दिया पूरा आंकलन : 2026 की शुरुआत में मौसम के बदलते मिजाज ने बदल दिया पूरा आंकलन
Weather Forecast India 2026: नए साल की शुरुआत के साथ ही देश के अलग-अलग हिस्सों में मौसम के दो चरम रूप देखने को मिल सकते हैं। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के ताजा पूर्वानुमान के अनुसार, इस साल जनवरी से मार्च के बीच दक्षिण और मध्य भारत में सामान्य से बेहतर बारिश होने की उम्मीद है। हालांकि, जहां एक ओर दक्षिण के किसान खुश हैं, वहीं पंजाब और हरियाणा जैसे (Northwest India Rain) के मुख्य क्षेत्रों में सामान्य से कम बारिश होने का अंदेशा जताया गया है, जिससे उत्तर भारत के शुष्क रहने की संभावना बढ़ गई है।

रबी फसलों पर मौसम के बदले रुख का संभावित असर
जब भी बारिश कम होने का अनुमान आता है, तो सबसे पहली चिंता खेती और खाद्य सुरक्षा को लेकर होती है। आईएमडी के महानिदेशक मृत्युंजय महापात्रा ने स्पष्ट किया है कि उत्तर-पश्चिमी हिस्सों में बारिश की कमी का (Rabi Crop Production) पर कोई खास नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसका मुख्य कारण यह है कि इन क्षेत्रों में सिंचाई की बुनियादी संरचना बेहद मजबूत है और बीते मानसून की अच्छी बारिश की बदौलत देश के जलाशय वर्तमान में अपनी पूरी क्षमता के साथ भरे हुए हैं।
कड़ाके की ठंड और राजस्थान में बदलता तापमान का ग्राफ
सर्दी के मौसम में तापमान का उतार-चढ़ाव लोगों की सेहत और दिनचर्या को सीधे प्रभावित करता है। मौसम विभाग के अनुसार, पूर्वोत्तर भारत, बिहार और विदर्भ के कुछ इलाकों में इस बार सामान्य के मुकाबले एक से तीन दिन अधिक (Winter Chill) महसूस की जा सकती है। इसके विपरीत, राजस्थान जैसे मरुस्थलीय राज्यों में इस साल ठंड का असर पिछले वर्षों की तुलना में थोड़ा कम रहने का अनुमान है, जो स्थानीय निवासियों के लिए एक राहत भरी खबर हो सकती है।
जनवरी की ठिठुरन और न्यूनतम तापमान का नया गणित
जनवरी का महीना अपनी सर्द रातों के लिए जाना जाता है और इस बार भी देश के अधिकांश हिस्सों में न्यूनतम तापमान सामान्य से नीचे रहने वाला है। हालांकि, मौसम के मिजाज में एक विरोधाभास भी देखा जा रहा है, क्योंकि उत्तर-पूर्वी भारत और प्रायद्वीपीय भारत के कुछ विशिष्ट क्षेत्रों में (Minimum Temperature Trends) सामान्य से अधिक रहने की भविष्यवाणी की गई है। यह स्थिति दर्शाती है कि क्षेत्रीय स्तर पर मौसम के पैटर्न में बड़े बदलाव आ रहे हैं।
दिसंबर की खुश्की और पश्चिमी विक्षोभ की बेरुखी
बीता दिसंबर कई राज्यों के लिए सूखे जैसा रहा और उम्मीद के मुताबिक बारिश या बर्फबारी देखने को नहीं मिली। इसके पीछे का सबसे बड़ा कारण (Western Disturbance) की अनुपस्थिति या उनकी तीव्र गति को माना जा रहा है। आमतौर पर ये विक्षोभ उत्तर-पश्चिमी और मध्य भारत में शीतकालीन वर्षा का मुख्य स्रोत होते हैं, लेकिन इस बार ये या तो उत्तर की ओर खिसक गए या इतनी तेजी से आगे बढ़े कि जमीन तक नमी पहुंचाने में नाकाम रहे।
जलवायु परिवर्तन और बिगड़ता हुआ मौसमी संतुलन
प्राकृतिक घटनाओं के इस तरह के असामान्य व्यवहार के पीछे वैज्ञानिक अब सीधे तौर पर ग्लोबल वार्मिंग को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। मृत्युंजय महापात्रा ने जोर देकर कहा कि पश्चिमी विक्षोभों के मार्ग में आ रहा बदलाव सीधे तौर पर (Climate Change Impacts) का ही नतीजा है। यह चिंता का विषय है क्योंकि हिमालयी क्षेत्रों में कम बर्फबारी न केवल सर्दियों के पारिस्थितिकी तंत्र को बिगाड़ती है, बल्कि आने वाले समय में जल संकट का कारण भी बन सकती है।
ला नीना का प्रभाव और भविष्य के मानसून का संकेत
भूमध्यरेखीय प्रशांत क्षेत्र में समुद्र की सतह के ठंडे होने की प्रक्रिया, जिसे ला नीना कहा जाता है, वर्तमान में सक्रिय है। वैश्विक मौसम मॉडलों का अनुमान है कि मार्च तक (ENSO Neutral Conditions) की स्थिति बन जाएगी। वैज्ञानिकों का मानना है कि जून-जुलाई तक इस स्थिति के बने रहने से आगामी दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान अच्छी बारिश होने के प्रबल संकेत मिल रहे हैं, जो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक सकारात्मक पहलू है।
बढ़ती तपिश और गर्म होते सालों का डरावना रिकॉर्ड
आंकड़ों की दृष्टि से देखें तो धरती का तापमान लगातार नए रिकॉर्ड कायम कर रहा है। साल 2025 को 1901 के बाद से आठवां सबसे गर्म वर्ष घोषित किया गया है, लेकिन (Global Warming Statistics) में सबसे ऊपर 2024 का नाम दर्ज है। पिछले साल भारत का वार्षिक औसत तापमान दीर्घकालिक औसत से 0.65 डिग्री सेल्सियस अधिक था, जो यह चेतावनी दे रहा है कि भविष्य में गर्म हवाएं और बेमौसम गर्मी एक सामान्य घटना बन सकती है।



