High Court Lucknow Bench: इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा आदेश, पुलिस के कहने मात्र से बैंक खाते फ्रीज करना पड़ेगा भारी
High Court Lucknow Bench: इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने बैंकिंग और पुलिस कार्यप्रणाली को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि बैंक अब केवल पुलिस के अनुरोध पर बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के किसी भी व्यक्ति या संस्था का खाता फ्रीज नहीं कर सकते। यदि कोई बैंक इस कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन करता है, तो उसे संबंधित खाताधारक की वित्तीय हानि और सामाजिक प्रतिष्ठा को पहुंचे नुकसान के लिए दीवानी और आपराधिक कार्रवाई का सामना करना होगा। जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने इस मामले में पुलिस और बैंकों की जवाबदेही तय करने के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश भी जारी किए हैं।

मामला और याचिकाकर्ता की दलीलें
यह पूरा मामला ‘खालसा मेडिकल स्टोर’ के प्रोपराइटर यशवंत सिंह द्वारा दायर एक याचिका के बाद सामने आया। याचिकाकर्ता का एक्सिस बैंक में खाता था, जिसे हैदराबाद की राचकोंडा पुलिस के एक नोटिस के आधार पर पूरी तरह फ्रीज कर दिया गया था। पुलिस का आरोप था कि किसी साइबर धोखाधड़ी के मामले से जुड़े पैसे इस खाते में ट्रांसफर हुए हैं। सुनवाई के दौरान बैंक के वकील ने यह माना कि उन्हें नवंबर 2025 में डेबिट फ्रीज का निर्देश मिला था, लेकिन पुलिस ने न तो एफआईआर की कॉपी दी और न ही यह बताया कि कितनी राशि संदिग्ध है। कोर्ट ने पाया कि जब कोई स्पष्ट जब्ती आदेश ही नहीं है, तो खाता फ्रीज रखना पूरी तरह अवैध है।
बीएनएसएस की धारा 106 और पुलिस की शक्तियां
न्यायालय ने अपनी टिप्पणी में कहा कि अपराध की रकम को खुर्द-बुर्द होने से बचाने के लिए खाते को सीमित समय के लिए रोका जा सकता है, लेकिन यह पुलिस का अनिवार्य कर्तव्य है कि वह तीन-चार दिनों के भीतर बैंक को जब्ती आदेश और वाद संख्या उपलब्ध कराए। अदालत ने स्पष्ट किया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 106 पुलिस को यह अधिकार नहीं देती कि वे महज संदेह के आधार पर किसी के भी वित्तीय लेन-देन में दखल दें। पुलिस को ऐसी किसी भी कार्रवाई के लिए ठोस सबूत और कानूनी आधार पेश करने होंगे।
बैंक और भुगतान सेवा प्रदाताओं के लिए सख्त निर्देश
हाईकोर्ट ने बैंकों और डिजिटल भुगतान ऑपरेटरों को सचेत किया है कि यदि पुलिस बिना किसी एफआईआर या औपचारिक जब्ती आदेश के खाता रोकने का अनुरोध करती है, तो बैंक उसे स्वीकार करने से मना कर सकते हैं। कोर्ट ने आदेश दिया कि पुलिस किसी भी परिस्थिति में पूरे बैंक खाते को निलंबित करने के लिए नहीं कह सकती। नोटिस में केवल उस विशिष्ट राशि का उल्लेख होना चाहिए जो कथित अपराध से जुड़ी है, ताकि केवल उतनी ही रकम पर रोक (Lien) लगाई जा सके और बाकी के पैसों का इस्तेमाल खाताधारक कर सके।
पारदर्शिता के लिए मजिस्ट्रेट को सूचना देना अनिवार्य
अदालत द्वारा जारी गाइडलाइंस के अनुसार, जैसे ही किसी खाते को ब्लॉक या लियन मार्क किया जाता है, उसकी जानकारी 24 घंटे के भीतर संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट को देनी होगी। यदि निर्धारित समय सीमा के भीतर मजिस्ट्रेट को सूचित नहीं किया जाता है, तो बैंक द्वारा की गई वह कार्रवाई शून्य यानी अवैध मानी जाएगी। अदालत का मानना है कि इस प्रक्रिया से पुलिस की मनमानी पर अंकुश लगेगा और आम आदमी के बैंकिंग अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित होगी। यह फैसला उन हजारों खाताधारकों के लिए बड़ी राहत है जिनके खाते अक्सर बिना किसी पुख्ता जानकारी के महीनों तक फ्रीज पड़े रहते हैं।



