Justice through DNA Testing: कागजों पर ‘कफन’ ओढ़ चुका था यह शख्स, डीएनए की एक रिपोर्ट ने पलट दी पूरी बाजी और…
Justice through DNA Testing: उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले से एक ऐसी रोंगटे खड़े कर देने वाली कहानी सामने आई है, जो हमारे सिस्टम की खामियों और इंसानी लालच की पराकाष्ठा को दर्शाती है। खोराबार के छितौना गांव के रहने वाले रामकेवल को कागजों में ‘मृत’ घोषित कर दिया गया था, लेकिन न्याय की चौखट पर (Scientific Evidence Validity) के सहारे उन्होंने एक बार फिर अपनी पहचान वापस पा ली है। डीएनए रिपोर्ट ने यह साबित कर दिया कि रामकेवल कोई बहरूपिया नहीं, बल्कि उसी परिवार के रक्त संबंधी हैं, जिनके सदस्यों ने उन्हें मरा हुआ बताकर जेल भिजवा दिया था।

जमीन के टुकड़े के लिए अपनों ने ही रचा मौत का नाटक
इस पूरे विवाद की जड़ में 29 डिसमिल जमीन का एक टुकड़ा था, जिसे रामकेवल ने फरवरी 2023 में रामसिंह नामक व्यक्ति की पत्नी को बेचा था। जैसे ही इस सौदे की खबर रामकेवल के भतीजों, रामसरन और श्रवण को हुई, उन्होंने एक (Property Dispute Investigation) के तहत साजिश रच डाली। भतीजे रामसरन ने दावा किया कि उनके असली चाचा रामकेवल पुत्र विपत की बहुत पहले मृत्यु हो चुकी है और जिस व्यक्ति ने जमीन बेची है, वह रामकिशुन का पुत्र है जिसने धोखाधड़ी से खुद को रामकेवल बताया है।
दरोगा की लापरवाही और बेगुनाह को मिली सलाखों के पीछे जगह
मामले की तफ्तीश कर रहे दरोगा ने गहराई से जांच करने के बजाय केवल आधार कार्ड में पिता का नाम अलग होने को आधार बनाया और चार्जशीट दाखिल कर दी। जब रामकेवल कोर्ट में पेश नहीं हुए, तो उनके खिलाफ गैर-जमानती वारंट (Judicial Custody Rules) के तहत जारी कर दिया गया। 20 सितंबर को पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। एक जिंदा इंसान के लिए यह किसी त्रासदी से कम नहीं था कि उसे अपने ही अस्तित्व को साबित करने के लिए जेल की सलाखों के पीछे संघर्ष करना पड़ रहा था।
बहन की ममता और हाईकोर्ट का ऐतिहासिक हस्तक्षेप
रामकेवल के जेल जाने के बाद उनकी बहन ने हार नहीं मानी और इलाहाबाद हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल की। उन्होंने मजबूती से तर्क दिया कि पुलिस ने (Wrongful Identity Arrest) के कारण एक निर्दोष व्यक्ति को जेल में निरुद्ध किया है। न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति संजीव कुमार की खंडपीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए वैज्ञानिक तरीके से पहचान स्थापित करने का निर्णय लिया। कोर्ट ने आदेश दिया कि दूध का दूध और पानी का पानी करने के लिए डीएनए प्रोफाइलिंग कराई जाए, जो किसी भी पहचान पत्र से ज्यादा विश्वसनीय है।
फॉरेंसिक लैब की रिपोर्ट ने बेनकाब किया भतीजे का झूठ
हाईकोर्ट के निर्देश पर 20 नवंबर को सीजेएम कोर्ट में रामकेवल और शिकायतकर्ता रामसरन के खून के नमूने लिए गए। जब लखनऊ की फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी से (Forensic DNA Profiling) की रिपोर्ट आई, तो चौंकाने वाला खुलासा हुआ। वैज्ञानिक अधिकारी डॉ. प्रतिभा तिवारी ने पुष्टि की कि दोनों के पुरुष वंश के डीएनए में पूर्ण समानता है। यानी जेल में बंद व्यक्ति और शिकायतकर्ता एक ही खानदान के रक्त संबंधी हैं। इस रिपोर्ट ने उन सभी दावों को ध्वस्त कर दिया जिसमें रामकेवल को बाहरी या जालसाज बताया गया था।
सिस्टम की अनदेखी का शिकार हुए बचपन से बिछड़े रामकेवल
रामकेवल की आपबीती सुनकर किसी की भी आंखें भर आएं। उन्होंने बताया कि वह बचपन में ही अपने गांव छितौना को छोड़कर गगहा के गजपुर में जाकर बस गए थे। गांव और परिवार से लंबा (Social Separation Impact) होने के कारण सरकारी दस्तावेजों में उन्हें मृत मान लिया गया। उन्हें इस बात का इल्म भी नहीं था कि उनकी अनुपस्थिति का फायदा उठाकर उन्हें फाइलों में दफन कर दिया गया है। जब वे अपनी पैतृक जमीन बेचने आए, तब उन्हें पता चला कि अपनों की नजरों में वे अब जिंदा नहीं रहे।
तीन महीने की अवैध कैद के बाद मिली आजादी
हाईकोर्ट ने डीएनए रिपोर्ट को आधार मानते हुए रामकेवल की गिरफ्तारी और जेल में रखने को पूरी तरह गैरकानूनी करार दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब यह सिद्ध हो चुका है कि वह (Family Blood Relation) का हिस्सा हैं, तो उन्हें धोखेबाज नहीं माना जा सकता। हालांकि कोर्ट ने जमीन की बिक्री के अन्य आपराधिक पहलुओं पर कोई टिप्पणी नहीं की, लेकिन पहचान के संकट को खत्म करते हुए उन्हें तत्काल रिहा करने का आदेश दिया। करीब तीन महीने तक तिल-तिल कर मरने के बाद रामकेवल आखिरकार एक ‘जिंदा’ इंसान के तौर पर जेल से बाहर आए।
न्याय की जीत और सिस्टम के लिए एक बड़ा सबक
यह मामला हमारे पुलिस प्रशासन और राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवालिया निशान खड़े करता है। अगर (Legal Justice System) ने समय रहते डीएनए जांच का सहारा न लिया होता, तो एक जिंदा इंसान अपनी पहचान साबित किए बिना ही दुनिया छोड़ देता। रामकेवल की घर वापसी केवल एक व्यक्ति की रिहाई नहीं है, बल्कि यह उस वैज्ञानिक सच्चाई की जीत है जिसने दस्तावेजों के सफेद झूठ को हरा दिया। यह कहानी हमें सिखाती है कि चाहे साजिश कितनी भी गहरी क्यों न हो, सत्य को हमेशा के लिए दबाया नहीं जा सकता।



