UP Panchayat Elections 2026: लोकतंत्र की बुनियाद पर छाया संकट, गायब हुए हजारों नाम
UP Panchayat Elections 2026: उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों की आहट के साथ ही सियासी पारा चढ़ने लगा है, लेकिन इस बार चुनावी चर्चा से ज्यादा शोर मतदाता सूची में हुई गड़बड़ियों का है। अनंतिम मतदाता सूची (provisional voter list) के प्रकाशन के बाद राज्य के लगभग हर जिले से चौंकाने वाली खबरें सामने आ रही हैं। गांवों की गलियों से लेकर तहसील के गलियारों तक उन लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी है, जिनके नाम इस बार सूची से नदारद हैं। यह सिर्फ एक तकनीकी त्रुटि नहीं, बल्कि उन हजारों नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकार पर सीधा प्रहार है जो आने वाले चुनाव में अपनी सरकार चुनना चाहते थे।

तहसीलों पर उमड़ा शिकायतों का सैलाब
मंगलवार का दिन दावा और आपत्ति दर्ज कराने का अंतिम अवसर था, जिसने प्रशासनिक अमले की नींद उड़ा दी। भारी संख्या में ग्रामीण (public grievance) दर्ज कराने के लिए अपने दस्तावेजों के साथ कार्यालयों पर जुटे नजर आए। 23 दिसंबर को जब निर्वाचन रजिस्ट्रीकरण अधिकारी कार्यालयों और मतदान केंद्रों पर विलोपित मतदाताओं की सूची चस्पा की गई, तो लोगों के होश उड़ गए। 30 दिसंबर की समय सीमा समाप्त होने तक प्रपत्र-2, 3 और 4 को भरने की होड़ मची रही, जिससे स्पष्ट होता है कि जमीनी स्तर पर डेटा प्रबंधन में भारी चूक हुई है।
बनारस के गांवों में पसरा सन्नाटा और आक्रोश
धर्म और राजनीति की नगरी वाराणसी के चिरईगांव इलाके (UP Panchayat Elections 2026) से जो आंकड़े आए हैं, वे बेहद डराने वाले हैं। जाल्हूपुर ग्राम पंचायत में 400 और तोफापुर में 450 मतदाताओं के नाम पिछली सूची में होने के बावजूद (electoral roll) से अचानक गायब हो गए हैं। पूरनपट्टी, तरयां और बीकापुर जैसे गांवों का भी यही हाल है, जहां सैकड़ों की तादाद में लोगों के नाम काट दिए गए हैं। चुनावी मैदान में उतरने का सपना संजोए संभावित प्रत्याशियों के लिए यह किसी बड़े झटके से कम नहीं है, क्योंकि उनके समर्थक ही अब सूची से बाहर हो चुके हैं।
बरेली के ब्लॉकों में रिकॉर्ड तोड़ आपत्तियां
रुहेलखंड के बरेली जिले में भी स्थिति कमोबेश वैसी ही बनी हुई है जैसी पूर्वांचल में दिखी। बिथरी ब्लॉक में सबसे अधिक 1131 लोगों ने अपनी आपत्ति दर्ज कराई है, जो प्रशासन के लिए (voter registration) प्रक्रिया की पारदर्शिता पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। क्यारा, फतेहगंज और भोजीपुरा ब्लॉक में भी सैकड़ों की संख्या में फॉर्म जमा किए गए हैं। हालांकि, खंड विकास अधिकारियों का आश्वासन है कि किसी भी पात्र व्यक्ति का नाम सूची से नहीं हटेगा, बशर्ते वे सही समय पर अपने दस्तावेज बीएलओ या ब्लॉक कार्यालय में जमा कर दें।
दावों के निस्तारण की अगली चुनौती
अब गेंद प्रशासन के पाले में है और दावों के निस्तारण के लिए सात जनवरी तक की समय सीमा तय की गई है। इस दौरान निर्वाचन आयोग (election commission) के दिशा-निर्देशों के अनुरूप हर एक आवेदन की बारीकी से जांच की जाएगी। अधिकारियों के सामने चुनौती यह है कि वे कम समय में इन हजारों विसंगतियों को दूर करें ताकि मतदाता सूची पूरी तरह शुद्ध और विश्वसनीय हो सके। ग्रामीण क्षेत्रों में इस बात को लेकर भी सुगबुगाहट है कि क्या ये नाम जानबूझकर किसी राजनीतिक दबाव में काटे गए हैं या यह महज एक लिपिकीय त्रुटि है।
नागरिकता और उम्र को लेकर सख्त नियम
मतदाता सूची में नाम जुड़वाने के लिए इस बार उम्र और जन्म स्थान के प्रमाणन को लेकर कड़ी शर्तें रखी गई हैं। जिन लोगों का जन्म एक जुलाई 1987 से पहले हुआ है और उनका नाम 2003 की सूची में नहीं है, उन्हें विशेष दस्तावेज (identity proof) प्रस्तुत करने होंगे। वहीं, 1987 से 2004 के बीच जन्मे मतदाताओं के लिए माता-पिता के रिकॉर्ड को भी आधार बनाया गया है। यदि माता या पिता का नाम पुरानी सूची में है, तो उसे साक्ष्य के रूप में पर्याप्त माना जाएगा, अन्यथा व्यक्ति को अपनी पात्रता सिद्ध करने के लिए पसीना बहाना पड़ सकता है।
इन दस्तावेजों के बिना नहीं बन पाएगा काम
प्रशासन ने स्पष्ट कर दिया है कि केवल मौखिक दावों से नाम नहीं जुड़ेंगे। मतदाताओं को सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी जन्म प्रमाण पत्र, पासपोर्ट, या मान्यता प्राप्त बोर्ड की हाईस्कूल की मार्कशीट (valid documentation) देनी होगी। इसके अलावा, सरकारी कर्मचारी अपना पहचान पत्र, पेंशन भुगतान आदेश या बैंक और डाकघर द्वारा जारी पुराने रिकॉर्ड का उपयोग कर सकते हैं। परिवार रजिस्टर की प्रति और जाति प्रमाण पत्र जैसे दस्तावेजों को भी इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है ताकि कोई भी अपात्र व्यक्ति मतदाता सूची में घुसपैठ न कर सके।
भविष्य की राजनीति और प्रशासनिक पारदर्शिता
उत्तर प्रदेश का पंचायत चुनाव हमेशा से ही विधानसभा और लोकसभा चुनावों का सेमीफाइनल माना जाता रहा है। ऐसे में मतदाता सूची (democratic process) की शुचिता बनाए रखना बेहद आवश्यक है। 7 जनवरी के बाद जब अंतिम सूची सामने आएगी, तभी स्पष्ट होगा कि कितने लोगों को उनका हक वापस मिला और कितने लोग वोट देने से वंचित रह गए। फिलहाल, प्रदेश के गांव-गांव में बीएलओ के चक्कर काटते ग्रामीण इस उम्मीद में हैं कि अगली सुबह उनकी पहचान फिर से मतदाता के रूप में बहाल हो जाएगी।



