Education Department issues: शिक्षा विभाग की करतूतें चरम पर, वेतन को तरसते गुरुजन, फाइलों में कैद हो गया भविष्य
Education Department issues: शिक्षा विभाग में हाल ही में हुई नियुक्तियों को लेकर कई तरह की समस्याएँ सामने आ रही हैं। विभाग द्वारा आउटसोर्सिंग प्रक्रिया के माध्यम से नियुक्त किए गए सीआरपी और बीआरपी को तीन महीने पूरे होने के बाद भी वेतन नहीं मिला है। यह स्थिति न सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही को दर्शाती है, बल्कि कर्मचारियों का मनोबल भी गिरा रही है। इस मुद्दे ने विभाग की overall credibility पर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिया है।

वेतन भुगतान में देरी का बढ़ता असर
सीआरपी और बीआरपी की भर्ती इस वर्ष सितंबर में की गई थी। कुल 955 पदों में से 580 पदों को भरा गया, लेकिन तीन महीने बीत जाने के बावजूद इन्हें वेतन नहीं मिला। शिक्षा विभाग का कहना है कि एमओयू में यह प्रावधान है कि आउटसोर्सिंग कंपनी पहले वेतन देगी और बाद में विभाग से भुगतान का दावा करेगी। यह प्रक्रिया payment system को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती है, क्योंकि वास्तविकता में कंपनी ने अब तक वेतन ही जारी नहीं किया है।
कर्मचारी नेताओं की नाराज़गी और विभागीय प्रतिक्रिया
भाजपा नेता रविंद्र जुगरान का कहना है कि शिक्षकों और कर्मचारियों को समय पर वेतन न देना उनके साथ घोर अन्याय है। वह इस मामले को अपर शिक्षा सचिव एमएम सेमवाल के सामने भी रख चुके हैं। वहीं विभाग का कहना है कि कंपनी को वेतन भुगतान के लिए निर्देश दे दिए गए हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने employee welfare से जुड़े बुनियादी सवालों को उजागर किया है।
औपबंधिक सहायक अध्यापकों की लंबित समस्या
प्रदेश में 2001 से 2003 के बीच नियुक्त किए गए 802 शिक्षा मित्रों को वर्ष 2015 में औपबंधिक सहायक अध्यापक बनाया गया। ये शिक्षक आज भी पर्वतीय और अति दुर्गम क्षेत्रों के प्राथमिक विद्यालयों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। इन शिक्षकों को शर्त के साथ नियुक्त किया गया था कि शिक्षक पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उनका औपबंधन हटा दिया जाएगा, जिससे उन्हें salary increment का लाभ मिल सके।
टीईटी पास करने के बाद भी नहीं हटा औपबंधन
69 औपबंधिक सहायक अध्यापकों ने टीईटी परीक्षा एक साल पहले ही पास कर ली, लेकिन इसके बावजूद विभाग ने उनका औपबंधन नहीं हटाया। कई बार आवेदन और अनुरोध देने के बावजूद इस मामले पर ठोस निर्णय नहीं लिया गया है। इससे न केवल इन शिक्षकों का आर्थिक नुकसान हो रहा है, बल्कि promotion process भी प्रभावित हो रहा है।
संघों की आपत्तियाँ और पुरानी स्थिति का संदर्भ
उत्तराखंड समायोजित प्राथमिक शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष ललित द्विवेदी बताते हैं कि आरटीई एक्ट लागू होने से पहले शिक्षा मित्रों की नियुक्ति हुई थी। इसलिए उनसे टीईटी की अनिवार्यता नहीं होनी चाहिए थी। एमएचआरडी और एनसीटीई ने भी इसे स्पष्ट किया था। पहले कुछ शिक्षकों का औपबंधन हटाया गया और उन्हें वेतन वृद्धि भी दी गई, लेकिन 69 शिक्षकों को छोड़ दिया गया। यह inconsistency विभाग की नीतियों पर सवाल खड़े करती है।
सरकारी विभागों में नीतिगत वैषम्य
आरटीई एक्ट लागू होने से पहले नियुक्त किए गए शिक्षकों के लिए टीईटी को अनिवार्य बनाए जाने पर संघ लगातार विरोध कर रहा है। उनका तर्क है कि ऐसा कदम teaching standards को समझे बिना लिया गया। वहीं, शिक्षा विभाग का कहना है कि भर्ती प्रक्रिया में टीईटी पास शिक्षकों को कुछ अंकों की वरीयता दी जा रही है और मेरिट सूची में स्थान मिलने के बाद ही औपबंधन हटेगा। यह merit-based approach कई शिक्षकों के लिए अनिश्चितता पैदा कर रही है।
समाधान की ओर बढ़ते कदम या नई उलझनें?
सीआरपी और बीआरपी के वेतन मसले पर विभागीय स्तर पर बातचीत जारी है, लेकिन समस्या का स्थायी समाधान अभी तक नहीं निकल पाया है। दूसरी ओर, औपबंधिक सहायक अध्यापकों के औपबंधन मुद्दे पर भी विभाग स्पष्ट निर्णय लेने में असमर्थ दिख रहा है। यह administrative delay पूरे शिक्षा तंत्र की कार्यप्रणाली पर गहरा प्रभाव डाल रहा है।



