Haldwani School Drug Abuse Cases: बच्चों के बस्ते में मिला बर्बादी का सामान, हर माता-पिता की नींद उड़ा देगी यह खबर
Haldwani School Drug Abuse Cases: हल्द्वानी के प्रतिष्ठित निजी स्कूलों से हाल ही में जो खबरें निकलकर सामने आई हैं, उन्होंने देवभूमि की शांत फिजाओं में खौफ पैदा कर दिया है। शिक्षा के मंदिर कहे जाने वाले स्कूलों के भीतर अब (Adolescent Drug Addiction) जैसी गंभीर समस्या ने अपने पैर पसार लिए हैं। कल्पना कीजिए उस मंजर की, जब एक मासूम छात्रा की पानी की बोतल से पानी नहीं बल्कि शराब बरामद होती है। यह महज एक घटना नहीं, बल्कि हमारे समाज के खोखले होते जा रहे नैतिक मूल्यों और बच्चों के भटकते भविष्य का एक डरावना संकेत है।

बोतल में शराब और बाथरूम में सिगरेट का धुंआ
मामला तब और भी गंभीर हो गया जब एक दूसरे नामी स्कूल में एक छात्र को स्कूल के बाथरूम के भीतर सिगरेट पीते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया। स्कूल प्रबंधन ने जब (School Disciplinary Action) के तहत जांच की, तो सामने आया कि नशे की यह लत अब किसी एक बच्चे तक सीमित नहीं रही। ये घटनाएं बताती हैं कि बच्चे जिस उम्र में सुनहरे भविष्य के सपने बुनते हैं, उस उम्र में वे धुएं और नशे की गिरफ्त में फंसकर अपनी जिंदगी दांव पर लगा रहे हैं।
मनोचिकित्सकों की शरण में डरे हुए अभिभावक
इन मामलों के उजागर होते ही स्कूल प्रबंधन ने आनन-फानन में बच्चों के माता-पिता को तलब किया। स्थिति की संवेदनशीलता को देखते हुए अब मेडिकल कॉलेज के (Psychological Counseling for Students) विभाग की मदद ली जा रही है। विशेषज्ञ इन बच्चों से बातचीत कर यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि आखिर मासूमियत की उम्र में इन बच्चों के हाथ नशे तक कैसे पहुंचे। विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों को सजा देने के बजाय उन्हें इस दलदल से बाहर निकालना फिलहाल सबसे बड़ी प्राथमिकता है।
क्यों भटक रहे हैं मासूम: कारणों की तलाश
एसटीएच के मनोवैज्ञानिक डॉ. युवराज पंत ने बताया कि पिछले दो महीनों में ऐसे मामलों में (Increase in Juvenile Delinquency) की दर तेजी से बढ़ी है। विशेषज्ञ इसके पीछे कई जटिल कारण मानते हैं, जिनमें सोशल मीडिया का नकारात्मक प्रभाव, फिल्मों में नशे का महिमामंडन और पढ़ाई का बढ़ता मानसिक बोझ शामिल है। जब बच्चों को घर या स्कूल में अपनी भावनाओं को व्यक्त करने का सही मंच नहीं मिलता, तो वे अक्सर गलत संगत की ओर खिंचे चले जाते हैं।
डिजिटल दुनिया और एकाकीपन का खतरनाक मेल
आज के दौर में मोबाइल और इंटरनेट ने बच्चों को पूरी दुनिया से तो जोड़ दिया है, लेकिन वे अपने ही परिवार से कटते जा रहे हैं। (Negative Peer Pressure) और अकेलेपन के कारण बच्चे नई चीजों को ‘ट्राय’ करने के नाम पर नशे की शुरुआत करते हैं। माता-पिता की अत्यधिक व्यस्तता और बच्चों के साथ संवाद की कमी इस आग में घी डालने का काम कर रही है। जब घर के भीतर बच्चा खुद को उपेक्षित महसूस करता है, तो बाहर के असामाजिक तत्व उसे आसानी से अपना शिकार बना लेते हैं।
विशेषज्ञों की चेतावनी: स्थिति बेहद चिंताजनक है
डॉ. पंत के अनुसार, बीते दो महीनों में शराब और सिगरेट के सेवन के कई मामले सामने आए हैं, जो यह दर्शाते हैं कि (Teenage Mental Health Crisis) अब एक इमरजेंसी की स्थिति में पहुंच चुका है। स्कूलों में बच्चों के बैग की अचानक तलाशी और शिक्षकों की कड़ी निगरानी के बावजूद बच्चे नशे के सामान को अंदर ले जाने के नए-नए तरीके ढूंढ रहे हैं। यह स्थिति केवल हल्द्वानी ही नहीं, बल्कि देशभर के शहरी इलाकों के स्कूलों के लिए एक बड़ा रेड फ्लैग है।
अभिभावकों के लिए सतर्क रहने का समय
इस संकट से उबरने के लिए विशेषज्ञों ने अभिभावकों को सख्त हिदायत दी है कि वे अपने बच्चों के साथ (Parent-Child Communication) को बेहतर बनाएं। बच्चों की दिनचर्या, उनकी पसंद-नापसंद और उनके दोस्तों की मंडली पर पैनी नजर रखना अब बेहद जरूरी हो गया है। यदि बच्चा अचानक चिड़चिड़ा हो जाए, अकेला रहने लगे या उसकी आंखों में लाली दिखने लगे, तो इसे सामान्य मानकर नजरअंदाज न करें। यह वक्त बच्चों पर चिल्लाने का नहीं, बल्कि उनके साथ मित्रवत व्यवहार कर उन्हें सुरक्षा का अहसास कराने का है।
एक सामूहिक जिम्मेदारी और सुरक्षा का संकल्प
शिक्षा संस्थानों और समाज को मिलकर इस नशे के खिलाफ एक बड़ा अभियान छेड़ना होगा। स्कूलों को केवल (Educational Environment Safety) तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए नियमित सत्र आयोजित करने चाहिए। हम सभी को यह समझना होगा कि यदि आज हमने अपने बच्चों के बैग में छिपी इन बोतलों और सिगरेटों को नहीं रोका, तो कल ये हमारे पूरे समाज की बुनियाद को कमजोर कर देंगी। बच्चों को किताबों के साथ-साथ नैतिक साहस की भी जरूरत है ताकि वे नशे को ‘ना’ कह सकें।



