उत्तराखण्ड

Uttarakhand Farmer Suicide Controversy: क्या सिर्फ मजिस्ट्रेटी जांच है एक किसान की जान की कीमत…

Uttarakhand Farmer Suicide Controversy: उत्तराखंड के काशीपुर में एक किसान की मौत ने न केवल देवभूमि को झकझोर कर रख दिया है, बल्कि हमारी पूरी सामाजिक और प्रशासनिक व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया है। सुखवंत सिंह नामक किसान ने काठगोदाम के एक होटल में अपनी जीवनलीला समाप्त करने से पहले जो कदम उठाया, वह दिल दहला देने वाला था। उन्होंने (social media live streaming) के जरिए दुनिया को अपनी व्यथा सुनाई और उन चेहरों को बेनकाब किया जिन्होंने उन्हें इस आत्मघाती मोड़ पर धकेल दिया। यह घटना महज एक सुसाइड नहीं, बल्कि व्यवस्था की उस बहरापन का प्रमाण है जहाँ एक आम आदमी न्याय की उम्मीद में थककर मौत को गले लगा लेता है।

Uttarakhand Farmer Suicide Controversy
Uttarakhand Farmer Suicide Controversy
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सत्ता के गलियारों में हलचल और सीएम की सख्ती

इस दर्दनाक हादसे के बाद उत्तराखंड की राजनीति में उबाल आ गया है और सरकार को चौतरफा आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए तुरंत (Uttarakhand Farmer Suicide Controversy) जारी कर दिए हैं। मुख्यमंत्री ने कुमाऊं कमिश्नर दीपक रावत को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना के पीछे की हर परिस्थिति और तथ्य की गहराई से जांच की जाए। सीएमओ ने साफ किया है कि इस पारदर्शी जांच के जरिए उन सभी पर्दों को उठाया जाएगा जो इस मौत के पीछे छिपे हुए हैं।

जब रक्षक ही मौन हो जाएं तो न्याय कहाँ जाए?

सुखवंत सिंह ने अपने आखिरी वीडियो में पुलिस प्रशासन पर जो आरोप लगाए हैं, वे बेहद गंभीर और चौंकाने वाले हैं। उन्होंने दावा किया कि वे धोखाधड़ी की शिकायत लेकर अधिकारियों के पास गए थे, लेकिन उनकी (law enforcement negligence) ने उन्हें निराश कर दिया। मुख्यमंत्री ने इस बिंदु पर कड़ा रुख अपनाते हुए मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक से विस्तृत रिपोर्ट तलब की है। शासन का कहना है कि यदि जांच में किसी भी स्तर पर पुलिसकर्मियों की लापरवाही पाई गई, तो उनके खिलाफ ऐसी कार्रवाई होगी जो एक नजीर पेश करेगी।

चार करोड़ की ठगी और एक किसान का उजड़ता सपना

सुखवंत सिंह की मौत के पीछे की कहानी जमीन के सौदे में हुई एक बड़ी धोखाधड़ी से जुड़ी है। मरने से पहले जारी वीडियो में उन्होंने बताया कि उनके साथ लगभग (land deal fraud) के जरिए 4 करोड़ रुपये की ठगी की गई। उन्हें बक्सौरा गांव में सात एकड़ का एक उपजाऊ टुकड़ा दिखाया गया था, लेकिन धोखे से रजिस्ट्री किसी दूसरी बंजर जमीन की कर दी गई। इस जालसाजी में उनसे 3 करोड़ रुपये नकद और 1 करोड़ रुपये बैंक ट्रांजेक्शन के जरिए वसूले गए थे, जिसने उन्हें आर्थिक और मानसिक रूप से पूरी तरह तोड़ दिया।

पत्नी और मासूम बेटे की आंखों के सामने खूनी मंजर

इस घटना का सबसे वीभत्स और दुखद पहलू वह है जो होटल के कमरे के अंदर घटित हुआ। उस वक्त सुखवंत के साथ उनकी पत्नी प्रदीप कौर और उनका 14 साल का बेटा भी मौजूद थे। रात के सन्नाटे में जब (witness trauma impact) की गवाह बनी उनकी पत्नी की नींद खुली, तो उन्होंने सुखवंत को विक्षिप्त अवस्था में पाया। डर और अनहोनी की आशंका के चलते वह मदद के लिए रिसेप्शन की ओर भागीं, लेकिन उनके निकलते ही सुखवंत ने दरवाजा बंद कर लिया और फिर एक धमाके ने सब कुछ खामोश कर दिया।

फोरेंसिक साक्ष्य और वीडियोग्राफी के साये में पोस्टमार्टम

होटल प्रबंधन की सूचना पर जब पुलिस ने दरवाजा तोड़ा, तो सुखवंत सिंह लहूलुहान अवस्था में मिले। अस्पताल ले जाने पर उन्हें मृत घोषित कर दिया गया, जिसके बाद पुलिस ने साक्ष्य जुटाने के लिए (forensic evidence collection) की प्रक्रिया शुरू की। एसएसपी नैनीताल मंजूनाथ टीसी ने बताया कि मामले की निष्पक्षता बनाए रखने के लिए शव का पोस्टमार्टम डॉक्टरों के एक विशेष पैनल से कराया गया है और पूरी प्रक्रिया की वीडियोग्राफी भी की गई है। मौके से मिले सुसाइड नोट और वीडियो को मुख्य साक्ष्य माना जा रहा है।

सियासत का अखाड़ा बना एक परिवार का मातम

दुख की इस घड़ी में राजनीतिक रोटियां सेंकने का सिलसिला भी शुरू हो गया है। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने इस घटना को भाजपा सरकार के कुशासन और किसानों की अनदेखी का नतीजा करार दिया है। विपक्ष का कहना है कि अगर समय रहते पुलिस ने (public grievance redressal) की प्रक्रिया का पालन किया होता, तो आज एक परिवार अनाथ नहीं होता। उधर, सरकार ने पीड़ित परिवार को हर संभव आर्थिक और कानूनी सहायता देने का भरोसा दिलाया है ताकि न्याय की प्रक्रिया में कोई कमी न रहे।

क्या अब लौटेगा जनता का सिस्टम पर भरोसा?

मुख्यमंत्री धामी ने शोक संतप्त परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए कहा है कि सरकार इस मुश्किल घड़ी में उनके साथ चट्टान की तरह खड़ी है। प्रशासन को निर्देश दिए गए हैं कि पीड़ित परिवार को (legal justice insurance) प्रदान की जाए ताकि दोषियों को सजा मिल सके। लेकिन सवाल अब भी वही है कि क्या जांच के ये आदेश उस मासूम बेटे के पिता को वापस ला पाएंगे? क्या अब उत्तराखंड की पुलिस उन दो दर्जन रसूखदारों पर हाथ डालने की हिम्मत दिखाएगी जिनका नाम सुखवंत ने मरते वक्त लिया था?

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