VikramSharma – खेल मैदान से अपराध जगत तक का सफर
VikramSharma – देहरादून में हाल ही में मारे गए विक्रम शर्मा का नाम वर्षों से झारखंड के आपराधिक हलकों में चर्चा में रहा है। कभी जूडो-कराटे सिखाने वाला एक कोच बाद में संगठित अपराध से जुड़ा चेहरा बन गया। उस पर हत्या, अपहरण सहित कई गंभीर मामलों में आरोप लगे और अलग-अलग राज्यों में उसकी गतिविधियों की जांच होती रही। पुलिस अभिलेख बताते हैं कि 1990 के दशक के अंत से उसका नाम आपराधिक घटनाओं से जुड़ने लगा था।

खेल प्रशिक्षक से बदली जीवन की दिशा
1992 के आसपास जमशेदपुर के सिदगोड़ा इलाके में वह जूडो-कराटे का प्रशिक्षण देता था। स्थानीय मैदान में नियमित अभ्यास सत्र आयोजित होते थे, जहां कई युवा प्रशिक्षण लेने आते थे। इन्हीं दिनों उसकी मुलाकात अखिलेश सिंह से हुई, जो बाद में झारखंड के कुख्यात अपराधियों में गिना जाने लगा। शुरुआत में यह संबंध खेल तक सीमित था, लेकिन धीरे-धीरे दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ीं।
जानकार बताते हैं कि प्रशिक्षण के दौरान बनी पहचान आगे चलकर कारोबारी साझेदारी में बदली। उस दौर में जमशेदपुर औद्योगिक गतिविधियों के कारण तेजी से विकसित हो रहा था और परिवहन क्षेत्र में अवसर बढ़ रहे थे।
ट्रांसपोर्ट कारोबार से बढ़ी सक्रियता
1990 के दशक की शुरुआत में दोनों ने मिलकर ट्रांसपोर्ट व्यवसाय में कदम रखा। शुरुआती दौर में यह एक सामान्य व्यावसायिक पहल थी, लेकिन समय के साथ उनके नाम ठेकेदारी और वर्चस्व की प्रतिस्पर्धा से भी जुड़ने लगे। शहर में बढ़ती आर्थिक गतिविधियों के बीच परिवहन नेटवर्क पर नियंत्रण को लेकर कई समूह सक्रिय थे।
पुलिस सूत्रों के अनुसार, इसी दौरान आपसी गठजोड़ मजबूत हुआ और बाद में आपराधिक मामलों में दोनों के नाम सामने आने लगे। हालांकि हर मामले में अंतिम निर्णय अदालतों के स्तर पर ही तय होना था, लेकिन जांच एजेंसियों की रिपोर्ट में उनकी भूमिका पर चर्चा होती रही।
चर्चित हत्याकांड के बाद सुर्खियों में आया नाम
1998 में जमशेदपुर के चर्चित काबरा अपहरण और हत्या प्रकरण ने पूरे क्षेत्र को हिला दिया था। इसी मामले के बाद विक्रम शर्मा का नाम व्यापक रूप से सामने आया। जांच के दौरान कई संदिग्धों की पहचान की गई, जिनमें उसका भी उल्लेख हुआ।
उसी वर्ष 18 दिसंबर को बिष्टूपुर में ट्रांसपोर्टर अशोक शर्मा की दिनदहाड़े हत्या ने भी सनसनी फैलाई। इस मामले में स्थानीय पुलिस के साथ CID ने भी जांच की। रिपोर्ट में अखिलेश सिंह गिरोह का जिक्र हुआ और आरोप लगा कि हत्या की साजिश में विक्रम की भूमिका रही।
फर्जी दस्तावेज और बहुराज्यीय संपत्तियां
बाद की जांच में यह भी सामने आया कि विभिन्न नामों से पहचान पत्र बनवाकर कई राज्यों में संपत्तियां खरीदी गईं। आर्थिक लेन-देन की जटिल परतों ने जांच एजेंसियों का ध्यान खींचा। प्रवर्तन से जुड़ी एजेंसियों ने भी अलग-अलग चरणों में कार्रवाई की और संपत्तियों की जांच की गई।
आरोप था कि अवैध गतिविधियों से अर्जित धन को निवेश के जरिए वैध स्वरूप देने की कोशिश की गई। हालांकि कई मामलों में कानूनी प्रक्रिया लंबी चली और संपत्तियों को लेकर अदालतों में सुनवाई होती रही।
जेल में बंद सहयोगी से जुड़ाव
दुमका जेल में बंद अखिलेश सिंह के आर्थिक नेटवर्क की निगरानी को लेकर भी विक्रम का नाम सामने आया। जांच में संकेत मिले कि जेल के बाहर से वित्तीय गतिविधियों का प्रबंधन कुछ भरोसेमंद लोगों के जरिए किया जा रहा था। 2017 में बिरसानगर स्थित एक फ्लैट में छापेमारी के दौरान कई दस्तावेज बरामद किए गए, जिससे आर्थिक लेन-देन की जानकारी मिली। बाद में न्यायालय के आदेशों के अनुसार कुछ संपत्तियों को मुक्त भी किया गया।
पारिवारिक पृष्ठभूमि और शुरुआती जीवन
विक्रम शर्मा का परिवार मूल रूप से उत्तराखंड से जुड़ा था। उसके पिता गोविंद शर्मा टाटा स्टील में कार्यरत थे और परिवार सिदगोड़ा स्थित कंपनी आवास में रहता था। पिता के सेवानिवृत्त होने के बाद परिवार देहरादून चला गया। शुरुआती दिनों में विक्रम खेल प्रशिक्षण से जुड़ा रहा, लेकिन समय के साथ उसका नाम अलग संदर्भों में लिया जाने लगा।
विक्रम शर्मा की कहानी एक ऐसे व्यक्ति की है जिसने खेल से शुरुआत की, व्यवसाय में कदम रखा और फिर गंभीर आरोपों के बीच सुर्खियों में रहा। हालिया घटनाक्रम के बाद उसके अतीत की परतें एक बार फिर सामने आ रही हैं।



