उत्तर प्रदेश

गाजियाबाद त्रासदी ने बच्चों की डिजिटल लत पर सवाल उठाए

Online Gaming Addiction – मोबाइल, तेज़ इंटरनेट और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी तकनीकों ने रोज़मर्रा की ज़िंदगी को पहले से कहीं अधिक आसान और रफ्तार भरी बना दिया है। पढ़ाई, संवाद, कारोबार और मनोरंजन—हर क्षेत्र अब डिजिटल प्लेटफॉर्म पर निर्भर होता जा रहा है। मगर इस तकनीकी चमक के पीछे एक गहरी चिंता भी पनप रही है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ लगातार आगाह कर रहे हैं कि बच्चों और किशोरों में इंटरनेट और ऑनलाइन गेमिंग पर बढ़ती निर्भरता उनके मानसिक स्वास्थ्य, व्यवहार और पारिवारिक रिश्तों को गंभीर रूप से प्रभावित कर रही है। हाल के महीनों में कई अध्ययनों और रिपोर्टों में यह भी सामने आया है कि अत्यधिक स्क्रीन टाइम और एआई आधारित ऐप्स के इस्तेमाल से अवसाद, बेचैनी और अकेलेपन का खतरा बढ़ रहा है।

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गाजियाबाद की वह सुबह जिसने शहर को झकझोर दिया

बुधवार, 4 फरवरी की सुबह गाजियाबाद के एक रिहायशी इलाके से आई खबर ने पूरे प्रदेश को स्तब्ध कर दिया। एक बहुमंजिला इमारत की नौवीं मंजिल से तीन सगी बहनों ने छलांग लगा दी, जिससे तीनों की मौके पर ही मौत हो गई। मृतकों की उम्र 12, 14 और 16 साल बताई जा रही है। यह घटना केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि उस बढ़ते संकट की भयावह झलक है जो डिजिटल दुनिया में पल रहा है। प्रारंभिक जांच में पुलिस को यह संकेत मिले हैं कि तीनों बच्चियां एक कोरियन ऑनलाइन टास्क-बेस्ड गेमिंग ऐप की आदी थीं, जिसने धीरे-धीरे उनकी सोच और व्यवहार पर गहरा असर डाला।

जांच, सुसाइड नोट और परिवार की पीड़ा

पुलिस ने घटनास्थल से एक संक्षिप्त सुसाइड नोट बरामद किया है, जिसमें सिर्फ इतना लिखा था—“मम्मी, पापा, सॉरी।” परिजनों के मुताबिक, वे लंबे समय से बेटियों की ऑनलाइन गेमिंग की आदत को लेकर चिंतित थे और उन्हें बार-बार समझाने की कोशिश कर रहे थे। पड़ोसियों ने भी बताया कि तीनों अक्सर देर रात तक मोबाइल पर सक्रिय रहती थीं। फिलहाल पुलिस उनके फोन, गेमिंग अकाउंट और डिजिटल गतिविधियों की जांच कर रही है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि किस तरह का दबाव या प्रभाव उन्हें इस कदम तक ले गया।

देशभर में पहले भी सामने आए ऐसे मामले

यह घटना कोई अलग-थलग उदाहरण नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में देश के अलग-अलग हिस्सों से ऑनलाइन गेमिंग से जुड़ी आत्महत्याओं की खबरें आती रही हैं। अगस्त 2025 में इंदौर में सातवीं कक्षा के एक छात्र ने सिर्फ इसलिए फांसी लगा ली क्योंकि वह ऑनलाइन गेम में 2,800 रुपये हार गया था। उसने अपनी मां का डेबिट कार्ड गेमिंग अकाउंट से जोड़ रखा था और पैसे कटने के बाद वह भय और अपराधबोध से घिर गया। जून 2025 में राजस्थान में एक युवक ने भारी कर्ज के चलते पत्नी के साथ आत्महत्या कर ली, जिसका कारण ऑनलाइन गेमिंग की लत बताई गई। बिजनौर में एक कारोबारी ने भी करोड़ों रुपये ऑनलाइन गेम में गंवाने के बाद जान दे दी थी। इसी तरह कुशीनगर में 18 वर्षीय छात्र की मौत भी गेमिंग की लत से जुड़ी मानी गई।

गेमिंग डिसऑर्डर—मनोरंजन से कहीं आगे की समस्या

मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, ऑनलाइन बैटल गेम्स अब केवल मनोरंजन नहीं रह गए हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने “गेमिंग डिसऑर्डर” को मानसिक स्वास्थ्य विकार के रूप में मान्यता दी है, जिसमें व्यक्ति खेल पर नियंत्रण खो देता है और पढ़ाई, काम, रिश्तों और सेहत की उपेक्षा करने लगता है। भारत में कई सर्वे बताते हैं कि किशोर रोजाना कई घंटे ऑनलाइन गेमिंग में बिताते हैं, जिससे उनकी दिनचर्या, नींद और व्यवहार प्रभावित हो रहा है।

आंकड़े क्या कहते हैं

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के 2023 के आंकड़ों के अनुसार, देश में 85 से अधिक आत्महत्याओं का सीधा संबंध ऑनलाइन गेमिंग से पाया गया। हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि वास्तविक संख्या इससे अधिक हो सकती है, क्योंकि कई मामलों में कारण स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं किए जाते।

दिमाग पर पड़ता गहरा असर

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ की रिपोर्ट बताती है कि अत्यधिक गेमिंग दिमाग के रिवार्ड सिस्टम को प्रभावित करती है। बार-बार जीतने पर मिलने वाला वर्चुअल इनाम डोपामिन रिलीज करता है, जिससे खेलने की लत और बढ़ती जाती है। जब कोई खिलाड़ी हारता है या उसका फोन छीन लिया जाता है, तो वह तीव्र बेचैनी, गुस्सा और निराशा महसूस कर सकता है। लंबे समय तक इस चक्र में रहने से आत्म-नियंत्रण कमजोर पड़ता है और आवेगपूर्ण फैसलों का खतरा बढ़ जाता है।

विशेषज्ञों की चेतावनी और जरूरी कदम

मनोचिकित्सकों का कहना है कि यह समस्या केवल गेमिंग तक सीमित नहीं है, बल्कि बच्चों की भावनात्मक परिपक्वता और पारिवारिक संवाद से भी जुड़ी है। कई गेम इस तरह डिजाइन किए जाते हैं कि वे खिलाड़ी के आत्मसम्मान और पहचान से जुड़ जाते हैं। जब कोई बच्चा पैसे हारता है, तो उसे सिर्फ आर्थिक नुकसान नहीं, बल्कि गहरी आत्मग्लानि महसूस होती है। विशेषज्ञों का मानना है कि खतरनाक टास्क-बेस्ड गेम्स पर कड़ी निगरानी, सख्त नियम और जागरूकता अभियानों की तत्काल जरूरत है, साथ ही अभिभावकों को भी बच्चों की डिजिटल गतिविधियों पर सजग नजर रखनी होगी।

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