Demography – आरएसएस शताब्दी कार्यक्रम में भागवत का राष्ट्रीय दृष्टिकोण
Demography – राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के तहत आयोजित कार्यक्रम में रविवार को सरसंघचालक मोहन भागवत ने देश की मजबूती, सामाजिक संतुलन और भविष्य की दिशा को लेकर कई महत्वपूर्ण विचार रखे। देहरादून के गढ़ी कैंट स्थित सांस्कृतिक केंद्र में आयोजित इस कार्यक्रम में उन्होंने स्पष्ट कहा कि भारत को इतना सक्षम बनाना होगा कि कोई भी देश उसे आर्थिक दबाव या टैरिफ की धमकी देकर प्रभावित न कर सके। उनके मुताबिक, वैश्विक मंच पर सम्मान उन्हीं को मिलता है जो शक्ति और आत्मविश्वास के साथ खड़े होते हैं।

राष्ट्रीय शक्ति और वैश्विक प्रतिष्ठा पर जोर
भागवत ने अपने संबोधन में कहा कि जब कोई राष्ट्र सुरक्षित और सशक्त होता है, तभी वह विश्व समुदाय में सम्मानपूर्वक स्थान बना पाता है। उन्होंने कहा कि इतिहास गवाह है, कमजोर राष्ट्रों को अक्सर दबाव झेलना पड़ता है। ऐसे में जरूरी है कि भारत आर्थिक, सामाजिक और सामरिक रूप से आत्मनिर्भर बने। स्वदेशी व्यवस्थाओं को मजबूत करने की बात करते हुए उन्होंने कहा कि आत्मनिर्भरता ही विकसित राष्ट्र बनने की पहली शर्त है।
उन्होंने यह भी कहा कि यदि देश भीतर से संगठित और संतुलित रहेगा तो बाहरी चुनौतियों का सामना भी मजबूती से किया जा सकेगा। संसद या राजनीतिक मतभेद लोकतंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन राष्ट्रीय हित के मुद्दों पर एकजुटता आवश्यक है।
शिक्षा व्यवस्था में बदलाव की आवश्यकता
भागवत ने वर्तमान शिक्षा प्रणाली पर टिप्पणी करते हुए कहा कि औपनिवेशिक दौर में बनी व्यवस्थाओं में बदलाव समय की मांग है। उन्होंने संकेत दिया कि शिक्षा को भारतीय मूल्यों और आधुनिक तकनीक के संतुलन के साथ आगे बढ़ाना होगा। उनके अनुसार, केवल तकनीकी दक्षता पर्याप्त नहीं है, बल्कि संस्कार और अनुशासन भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
उन्होंने युवाओं को भविष्य के लिए तैयार करने के लिए कौशल विकास पर बल दिया। साथ ही कहा कि नई पीढ़ी सवाल पूछती है, इसलिए उन्हें ठोस और तथ्यपूर्ण जवाब देना जरूरी है। परिवारों की भूमिका भी इस दिशा में अहम बताई गई।
संघ और राजनीति के संबंध पर स्पष्टता
संघ प्रमुख ने इस धारणा को भी संबोधित किया कि संगठन किसी राजनीतिक दल को नियंत्रित करता है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि संघ सत्ता की इच्छा नहीं रखता और उसका मूल कार्य व्यक्ति निर्माण और समाज संगठन है। उनके अनुसार, जो स्वयंसेवक राजनीति में सक्रिय होते हैं, वे स्वतंत्र रूप से अपनी भूमिका निभाते हैं। संघ का कार्यक्षेत्र सामाजिक है, राजनीतिक नहीं।
जनसंख्या संतुलन और तीन बच्चों का सुझाव
कार्यक्रम में जनसंख्या संतुलन का विषय भी प्रमुख रहा। भागवत ने कहा कि जनसांख्यिकीय असंतुलन किसी भी राष्ट्र के लिए चुनौती बन सकता है। उन्होंने तीन बच्चों के मानक को सुरक्षित बताया और कहा कि दीर्घकालिक योजना बनाते समय शिक्षा, स्वास्थ्य और संसाधनों को ध्यान में रखना होगा।
उन्होंने यह भी कहा कि जनसंख्या को बोझ नहीं बल्कि संसाधन के रूप में देखना चाहिए, बशर्ते उसकी उचित योजना और प्रबंधन हो। किसी भी कानून से पहले समाज में जागरूकता और सहमति आवश्यक है।
स्वतंत्रता आंदोलन और संघ की भूमिका का उल्लेख
संघ के इतिहास का जिक्र करते हुए भागवत ने संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के योगदान को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि हेडगेवार स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े रहे और देश की स्वाधीनता के लिए सक्रिय रहे। बाद में उन्होंने संगठन की स्थापना कर सामाजिक संगठन और व्यक्तित्व निर्माण पर ध्यान केंद्रित किया।
सामाजिक समरसता और एक डीएनए की बात
अपने संबोधन में भागवत ने कहा कि भारत के सभी लोगों की सांस्कृतिक जड़ें एक ही हैं। उन्होंने कहा कि पूजा-पद्धति, खानपान या परंपराएं अलग हो सकती हैं, लेकिन मूल पहचान साझा है। समाज को जोड़ना ही वास्तविक राष्ट्र निर्माण है।
उन्होंने सामाजिक संगठन को समय की आवश्यकता बताया और कहा कि यदि समाज बंटा रहेगा तो वह कमजोर होगा। एकता और पारस्परिक सम्मान से ही स्थायी मजबूती संभव है।
आरक्षण पर संघ प्रमुख का मत
आरक्षण के मुद्दे पर भागवत ने कहा कि जब तक समाज में भेदभाव मौजूद है, तब तक आरक्षण की आवश्यकता बनी रहेगी। उन्होंने संविधान में दिए गए प्रावधानों के पालन की बात कही। उनके अनुसार, सामाजिक विषमता खत्म करने के लिए समरसता और संवेदनशीलता जरूरी है।
उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि समाज में सकारात्मक बदलाव के संकेत दिखाई दे रहे हैं, जहां सक्षम लोग स्वेच्छा से अवसर छोड़ रहे हैं। फिर भी, जब तक असमानता पूरी तरह समाप्त नहीं होती, तब तक संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।



