RupeeFall – तेल कीमतों के दबाव के बीच RBI ने बढ़ाया बाजार हस्तक्षेप
RupeeFall – अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ती अनिश्चितता और कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के बीच भारतीय रुपये पर दबाव बढ़ गया है। हाल के दिनों में रुपया अपने अब तक के सबसे निचले स्तर के करीब पहुंच गया था, जिसके बाद भारतीय रिजर्व बैंक ने स्थिति को संभालने के लिए बाजार में सक्रिय हस्तक्षेप बढ़ाया है। केंद्रीय बैंक ने शुक्रवार को घोषणा की कि वह इस महीने बाजार से लगभग 10.9 अरब डॉलर मूल्य के सरकारी बॉन्ड खरीदेगा, जिसकी भारतीय मुद्रा में कीमत करीब एक लाख करोड़ रुपये के आसपास बैठती है।

हालांकि मंगलवार को शुरुआती कारोबार में रुपये ने थोड़ी मजबूती दिखाई और यह अपने रिकॉर्ड निचले स्तर से उबरते हुए 7 पैसे की बढ़त के साथ 92.14 प्रति डॉलर के आसपास पहुंच गया। विशेषज्ञों का मानना है कि केंद्रीय बैंक की रणनीति का उद्देश्य बाजार में स्थिरता बनाए रखना और वित्तीय प्रणाली में संतुलन बनाए रखना है।
तेल कीमतों ने बढ़ाया दबाव
आर्थिक विश्लेषकों के अनुसार हालिया दबाव का एक बड़ा कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें हैं। मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के कारण ऊर्जा बाजार में अस्थिरता देखने को मिली, जिससे तेल के दाम तेजी से ऊपर गए।
महंगे तेल का असर आयात करने वाले देशों पर ज्यादा पड़ता है और भारत भी उनमें शामिल है। जब तेल की कीमत बढ़ती है तो आयात बिल बढ़ जाता है, जिससे व्यापार घाटा बढ़ने की आशंका होती है। यही स्थिति स्थानीय मुद्रा पर अतिरिक्त दबाव पैदा कर सकती है।
बाजार में RBI के हस्तक्षेप की वजह
रिपोर्टों के अनुसार केंद्रीय बैंक ने विदेशी मुद्रा बाजार में भी सक्रिय भूमिका निभाई है। अनुमान लगाया जा रहा है कि रुपये की तेज गिरावट को रोकने के लिए हाल के दिनों में केंद्रीय बैंक ने बड़े पैमाने पर डॉलर बेचे।
इसके अलावा नकदी की उपलब्धता बनाए रखने के लिए खरीद-बिक्री स्वैप जैसे उपाय भी अपनाए गए हैं। फरवरी के अंत तक भारत का विदेशी मुद्रा भंडार लगभग 728.5 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर के आसपास था, जिसे इस तरह की परिस्थितियों में बाजार संतुलन बनाए रखने के लिए उपयोग किया जा सकता है।
लंबे समय तक चल सकता है दबाव
कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि मध्य पूर्व में चल रहा तनाव लंबा खिंचता है तो भारतीय अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। खासकर भुगतान संतुलन और विदेशी मुद्रा प्रवाह पर इसका असर देखने को मिल सकता है।
ऐसी स्थिति में केंद्रीय बैंक को बार-बार बाजार में हस्तक्षेप करना पड़ सकता है। इसके साथ ही बॉन्ड खरीद जैसे उपायों को भी बढ़ाया जा सकता है ताकि वित्तीय प्रणाली में नकदी की उपलब्धता बनी रहे।
रुपये की चाल पर बाजार की नजर
हाल के दिनों में रुपया 92 रुपये प्रति डॉलर के स्तर से ऊपर पहुंच चुका है, जो एक महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक सीमा मानी जाती है। कुछ वैश्विक निवेश बैंकों के विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा परिस्थितियों में रुपये पर दबाव बना रह सकता है।
उनके अनुसार वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों और भू-राजनीतिक परिस्थितियों का सीधा असर मुद्रा बाजार पर पड़ रहा है। यदि ऊर्जा कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं तो रुपये की चाल पर इसका असर जारी रह सकता है।
बॉन्ड खरीद का बाजार पर संभावित असर
केंद्रीय बैंक द्वारा बॉन्ड खरीद की योजना का उद्देश्य सिर्फ रुपये को स्थिर करना ही नहीं बल्कि वित्तीय बाजार में नकदी संतुलन बनाए रखना भी है। जब केंद्रीय बैंक सरकारी बॉन्ड खरीदता है तो बाजार में तरलता बढ़ती है, जिससे ब्याज दरों पर दबाव कम करने में मदद मिल सकती है।
विश्लेषकों के अनुसार हाल के समय में सरकारी बॉन्ड की पैदावार में भी बढ़ोतरी देखी गई है। ऐसे में बॉन्ड खरीद कार्यक्रम का इस्तेमाल सरकार की उधारी लागत को नियंत्रित रखने और बाजार को स्थिर संकेत देने के लिए किया जा सकता है।
आगे की रणनीति पर नजर
वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि केंद्रीय बैंक मौजूदा स्थिति को देखते हुए संतुलित रणनीति अपना सकता है। यदि वैश्विक परिस्थितियां लंबे समय तक अस्थिर रहती हैं तो केंद्रीय बैंक अपने विदेशी मुद्रा भंडार का इस्तेमाल सावधानी से करेगा।
नीतिगत स्तर पर यह भी देखा जाएगा कि तेल कीमतों, वैश्विक तनाव और घरेलू आर्थिक परिस्थितियों के बीच संतुलन कैसे बनाए रखा जाए। फिलहाल बाजार की नजर इस बात पर है कि आने वाले समय में केंद्रीय बैंक किस तरह की नीतिगत कार्रवाई करता है और वैश्विक परिस्थितियां किस दिशा में आगे बढ़ती हैं।



