WestBengalPolitics – चुनाव से पहले राष्ट्रपति शासन की अटकलों से तेज हुई सियासी बहस
WestBengalPolitics – पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक माहौल तेजी से गरमाता दिखाई दे रहा है। राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाए जाने की संभावनाओं को लेकर सियासी हलकों में चर्चा तेज हो गई है। हाल के दिनों में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के दौरे को लेकर विवाद, राज्यपाल के अचानक बदले जाने और चुनाव आयोग की टीम के दौरे के दौरान हुए विरोध प्रदर्शनों ने इस बहस को और हवा दी है। हालांकि अभी तक केंद्र सरकार या चुनाव आयोग की ओर से इस विषय में कोई आधिकारिक संकेत नहीं दिया गया है, लेकिन घटनाक्रमों ने राजनीतिक दलों और विश्लेषकों के बीच कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

बंगाल में राष्ट्रपति शासन का सीमित इतिहास
पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन लागू होने की घटनाएं बहुत कम रही हैं। राज्य में आखिरी बार 30 अप्रैल 1977 को राष्ट्रपति शासन लागू किया गया था, जब तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे की सरकार को बर्खास्त कर दिया गया था। उस समय यह व्यवस्था लगभग 52 दिनों तक लागू रही थी और बाद में वाम मोर्चा सरकार के गठन के साथ समाप्त हो गई थी।
करीब पांच दशक बाद एक बार फिर इसी तरह की चर्चाएं सामने आ रही हैं। मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल सात मई तक है। यदि उस समय तक चुनाव प्रक्रिया पूरी नहीं होती और नई सरकार का गठन नहीं हो पाता, तो संवैधानिक प्रावधानों के तहत राष्ट्रपति शासन लागू करने की स्थिति बन सकती है।
चुनाव आयोग के दौरे के बाद बढ़ी चर्चा
हाल ही में चुनाव आयोग की पूर्ण पीठ ने कोलकाता में तीन दिनों का दौरा किया। इस दौरान आयोग के सदस्यों ने विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के साथ-साथ प्रशासन और पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात कर चुनावी तैयारियों की समीक्षा की।
दौरे के अंतिम दिन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने प्रेस से बातचीत में चुनाव की तारीखों को लेकर कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी। उन्होंने कहा कि दिल्ली लौटने के बाद राज्य की कानून व्यवस्था और प्रशासनिक स्थिति की विस्तृत समीक्षा के आधार पर चुनाव कार्यक्रम तय किया जाएगा। इसके बाद आयोग की रिपोर्ट पर केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया को लेकर भी उत्सुकता बनी हुई है।
विरोध प्रदर्शनों से बढ़ा राजनीतिक तनाव
चुनाव आयोग के इस दौरे के दौरान कोलकाता और आसपास के इलाकों में विरोध प्रदर्शन भी देखने को मिले। तृणमूल कांग्रेस समर्थकों ने आयोग के खिलाफ नारेबाजी की और काले झंडे दिखाए। कुछ प्रदर्शनकारियों ने पोस्टर और बैनर के जरिए आयोग के खिलाफ नाराजगी भी जाहिर की।
हालांकि आयोग का कहना है कि चुनाव शांतिपूर्ण तरीके से कराने के लिए सभी आवश्यक तैयारियां की जा रही हैं। अधिकारियों के अनुसार हर मतदान केंद्र पर वेबकास्टिंग की व्यवस्था की जाएगी और किसी भी केंद्र पर मतदाताओं की संख्या 1,200 से अधिक नहीं रखी जाएगी। साथ ही उम्मीदवारों को मतदान के सात दिनों के भीतर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन की जांच कराने की सुविधा भी दी जाएगी।
राज्यपाल परिवर्तन से भी उठे सवाल
हाल ही में राज्यपाल के पद पर हुए बदलाव ने भी राजनीतिक चर्चा को और तेज कर दिया है। सी.वी. आनंद बोस के इस्तीफे के बाद तमिलनाडु के राज्यपाल आर.एन. रवि को पश्चिम बंगाल का नया राज्यपाल नियुक्त किया गया है। आमतौर पर विधानसभा चुनाव से ठीक पहले किसी राज्य में इस तरह का बदलाव कम ही देखने को मिलता है, इसलिए इस फैसले को लेकर कई राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी इस नियुक्ति पर सवाल उठाते हुए कहा कि केंद्र सरकार के कदमों से कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। उन्होंने यह भी कहा कि यदि राष्ट्रपति शासन लागू होता है तो वह लोकतांत्रिक तरीके से इसका विरोध करेंगी।
मतदाता सूची सत्यापन प्रक्रिया भी बना मुद्दा
राज्य में पिछले वर्ष नवंबर से चल रही एसआईआर प्रक्रिया भी राजनीतिक बहस का बड़ा विषय बन गई है। इस प्रक्रिया के तहत बड़ी संख्या में मतदाताओं के दस्तावेजों की जांच की जा रही है। रिपोर्टों के अनुसार करीब 60 लाख मतदाताओं के नाम फिलहाल विचाराधीन श्रेणी में हैं।
इस काम की निगरानी कलकत्ता हाईकोर्ट के निर्देश पर की जा रही है और इसमें कई न्यायिक अधिकारी भी जुड़े हुए हैं। अब तक इन मामलों में सीमित संख्या में दस्तावेजों की जांच पूरी हो सकी है, जिसके कारण चुनावी प्रक्रिया के समय को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि दस्तावेजों की जांच समय पर पूरी होती है या नहीं। यदि इसमें देरी होती है तो चुनाव कार्यक्रम और राज्य की राजनीतिक स्थिति दोनों पर इसका प्रभाव पड़ सकता है।



