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ClimateImpact – खान-पान की आदतें बढ़ा रहीं उत्सर्जन, रिपोर्ट में बड़ा खुलासा

ClimateImpact – जलवायु परिवर्तन पर चर्चा अक्सर उद्योग, वाहनों और ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित रहती है, लेकिन एक नई रिपोर्ट ने इस धारणा को चुनौती दी है। जर्मनी के एक शोध संस्थान की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, लोगों की रोजमर्रा की खान-पान की आदतें भी ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में बड़ी भूमिका निभा रही हैं। अध्ययन में पाया गया है कि देश में कुल उत्सर्जन का लगभग एक चौथाई हिस्सा सीधे तौर पर खाद्य उपभोग और उससे जुड़ी प्रक्रियाओं से आता है, जो इस मुद्दे की गंभीरता को उजागर करता है।

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खान-पान से जुड़ा बड़ा उत्सर्जन आंकड़ा
रिपोर्ट के मुताबिक, जर्मनी में हर साल लगभग 23.5 करोड़ टन कार्बन उत्सर्जन केवल खाद्य आपूर्ति श्रृंखला से उत्पन्न होता है। इसमें खेती, उत्पादन, परिवहन और उपभोग तक की पूरी प्रक्रिया शामिल है। शोधकर्ताओं का कहना है कि इस कुल उत्सर्जन का करीब 70 प्रतिशत हिस्सा पशु-आधारित खाद्य पदार्थों, जैसे मांस और डेयरी उत्पादों के कारण होता है। यह संकेत देता है कि भोजन के चयन का पर्यावरण पर सीधा प्रभाव पड़ता है।

प्रति व्यक्ति खपत और खाद्य अपव्यय
अध्ययन में यह भी सामने आया कि जर्मनी में एक व्यक्ति औसतन साल भर में करीब 642 किलोग्राम खाद्य सामग्री खरीदता है। यानी हर दिन लगभग 1.7 किलोग्राम खाद्य पदार्थ खरीदे जाते हैं। हालांकि, इसका एक बड़ा हिस्सा उपयोग से पहले ही बर्बाद हो जाता है। आंकड़ों के अनुसार, करीब 120 किलोग्राम यानी 18 प्रतिशत से अधिक हिस्सा केवल डेयरी उत्पादों का होता है, जो उपभोग और अपव्यय दोनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

कृषि और आयात का मिश्रित प्रभाव
रिपोर्ट में बताया गया है कि जर्मनी अपनी खाद्य जरूरतों का बड़ा हिस्सा खुद ही उत्पादन करता है। कृषि भूमि का लगभग 55 प्रतिशत हिस्सा देश के भीतर है, जबकि शेष 45 प्रतिशत भूमि विदेशों में स्थित है, जहां से कुछ जरूरी खाद्य पदार्थ आयात किए जाते हैं। दूध, मांस और अनाज जैसे उत्पाद स्थानीय स्तर पर तैयार होते हैं, जबकि जैतून, मेवे और खट्टे फल जैसे उत्पाद बाहर से लाए जाते हैं। इस वैश्विक आपूर्ति प्रणाली का भी उत्सर्जन में योगदान होता है।

पशु उत्पाद क्यों बढ़ाते हैं उत्सर्जन
विशेषज्ञों के अनुसार, पशु-आधारित खाद्य पदार्थों से अधिक उत्सर्जन के पीछे कई कारण हैं। पहला, पशुओं के पालन-पोषण में ऊर्जा की खपत होती है। दूसरा, उनके लिए चारा उगाने में अतिरिक्त संसाधनों की जरूरत पड़ती है। तीसरा, पशुओं के पाचन के दौरान मीथेन गैस का उत्सर्जन होता है, जो कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में कई गुना अधिक प्रभावशाली होती है। यही वजह है कि मांस और डेयरी उत्पादों का पर्यावरणीय प्रभाव अधिक माना जाता है।

डेयरी उत्पादों का अलग प्रभाव
रिपोर्ट में खास तौर पर डेयरी उत्पादों, विशेषकर चीज, को लेकर भी चिंता जताई गई है। एक किलो चीज बनाने के लिए बड़ी मात्रा में दूध की जरूरत होती है, जिससे उत्सर्जन बढ़ता है। उदाहरण के तौर पर, एक किलो हार्ड चीज के उत्पादन में करीब 13 लीटर दूध लगता है, जो इसके कार्बन प्रभाव को और बढ़ा देता है। इस कारण डेयरी सेक्टर का योगदान कुल उत्सर्जन में काफी ज्यादा है।

समाधान के तौर पर आहार में बदलाव
विशेषज्ञों का मानना है कि खान-पान में छोटे-छोटे बदलाव से भी बड़ा असर डाला जा सकता है। मांस और डेयरी उत्पादों की जगह फल, सब्जियां और दाल जैसे विकल्प अपनाने से उत्सर्जन कम किया जा सकता है। साथ ही, सौर और पवन ऊर्जा जैसे नवीनीकृत स्रोतों के उपयोग को बढ़ावा देना भी जरूरी है। इसके अलावा, कृषि भूमि के बेहतर प्रबंधन और दलदली क्षेत्रों के संरक्षण से भी कार्बन उत्सर्जन को नियंत्रित किया जा सकता है।

भविष्य के लिए संकेत और नीतियां
रिपोर्ट में एक विशेष संकेतक का भी जिक्र किया गया है, जो प्रति व्यक्ति खाद्य उपभोग से होने वाले उत्सर्जन को मापने में मदद करता है। वर्तमान में यह स्तर करीब 2.8 टन प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष है, जिसे प्रभावी नीतियों के जरिए घटाकर 0.7 टन तक लाया जा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सही कदम उठाए जाएं, तो खाद्य उत्पादन और उपभोग के जरिए भी जलवायु लक्ष्यों को हासिल करना संभव है।

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