Judiciary Corruption – रिश्वत मामले में आरोपी वकील को राहत से इनकार
Judiciary Corruption – सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को उस वकील की जमानत याचिका पर सुनवाई करने से साफ इनकार कर दिया, जिस पर तलाक के एक मामले में अनुकूल आदेश दिलाने के नाम पर 30 लाख रुपये की कथित रिश्वत मांगने का आरोप है। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि यह केवल धोखाधड़ी नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ा मुद्दा है। पीठ के रुख को देखते हुए याचिकाकर्ता के वकील ने अंततः याचिका वापस लेने का फैसला किया।

पीठ की तीखी टिप्पणी
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने सुनवाई के दौरान कड़ा रुख अपनाया। अदालत ने टिप्पणी की कि आरोपी ने न्यायपालिका को “बाजार में बेचने” की कोशिश की है, जो अत्यंत गंभीर मामला है। यह याचिका पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती देती थी, जिसमें आरोपी को जमानत देने से इनकार किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट संकेत दिया कि ऐसे मामलों में राहत देने से पहले बेहद सावधानी बरती जाएगी।
आरोप तय न होने का तर्क
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने दलील दी कि आरोपी को अगस्त 2025 में गिरफ्तार किया गया था और वह पिछले आठ महीने से हिरासत में है, जबकि अभी तक आरोप तय नहीं हुए हैं। इस पर अदालत ने कहा कि केवल समय बीत जाने के आधार पर राहत नहीं दी जा सकती, खासकर जब मामला न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने से जुड़ा हो। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में सहानुभूति की गुंजाइश बेहद सीमित है।
उम्र और स्वास्थ्य का हवाला भी बेअसर
बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि आरोपी लगभग 70 वर्ष का है और स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहा है। हालांकि अदालत ने इस तर्क को भी स्वीकार नहीं किया। पीठ ने टिप्पणी की कि उम्र के इस पड़ाव पर इस तरह के गंभीर आरोप और भी चिंताजनक हैं। अदालत ने दोहराया कि यह कोई साधारण आपराधिक मामला नहीं है, बल्कि न्यायिक प्रणाली की निष्पक्षता पर असर डालने वाला मुद्दा है।
याचिका वापस लेने का फैसला
जब यह स्पष्ट हो गया कि अदालत जमानत देने के पक्ष में नहीं है, तो याचिकाकर्ता के वकील ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी। सुप्रीम कोर्ट ने इसे स्वीकार कर लिया। साथ ही यह भी उल्लेख किया गया कि हाईकोर्ट ने पहले ही आरोपी को यह छूट दी थी कि वह अभियोजन के प्रमुख गवाहों से जिरह के बाद दोबारा जमानत के लिए आवेदन कर सकता है।
रिश्वत मांगने के आरोप की पृष्ठभूमि
प्राथमिकी के अनुसार, आरोपी वकील ने पंजाब की एक अदालत में लंबित तलाक के मामले में अनुकूल फैसला दिलाने के लिए शिकायतकर्ता से 30 लाख रुपये की मांग की थी। शिकायत में यह भी आरोप है कि उसने एक न्यायिक अधिकारी पर अपने प्रभाव का दावा करते हुए सकारात्मक आदेश दिलाने का आश्वासन दिया था। यह आरोप सीधे तौर पर न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल खड़े करता है।
सीबीआई की कार्रवाई
इस मामले में सीबीआई ने कार्रवाई करते हुए एक ट्रैप ऑपरेशन आयोजित किया। जांच एजेंसी के अनुसार, आरोपी के निर्देश पर एक सह-आरोपी ने शिकायतकर्ता से चार लाख रुपये की राशि ली, जिसे कथित रूप से रिश्वत का हिस्सा बताया गया। इसके बाद अगस्त 2025 में आरोपी को गिरफ्तार कर लिया गया। बाद में चंडीगढ़ स्थित विशेष सीबीआई अदालत ने भी उसकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी।
उच्च न्यायालय में दलीलें
पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान आरोपी की ओर से कहा गया था कि उसे झूठा फंसाया गया है। वहीं, सीबीआई ने अदालत में यह तर्क रखा कि आरोप गंभीर प्रकृति के हैं और मामले में ठोस साक्ष्य मौजूद हैं। हाईकोर्ट ने इन दलीलों को देखते हुए जमानत देने से इनकार कर दिया था।