FertilityLaw – 50 से अधिक उम्र में इलाज पर रोक को HC में मिली चुनौती
FertilityLaw – देश में प्रजनन उपचार से जुड़े कानून को लेकर एक महत्वपूर्ण मामला बॉम्बे हाई कोर्ट में सामने आया है, जहां 50 वर्ष से अधिक उम्र की दो विवाहित महिलाओं ने मौजूदा आयु सीमा को चुनौती दी है। यह मामला उस प्रावधान से जुड़ा है, जिसमें तय किया गया है कि 50 साल से अधिक उम्र की महिलाएं फर्टिलिटी ट्रीटमेंट का लाभ नहीं ले सकतीं। अदालत ने इस पर सुनवाई करते हुए दोनों याचिकाकर्ताओं को अंतरिम राहत दी है और उन्हें मेडिकल जांच की प्रक्रिया आगे बढ़ाने की अनुमति दे दी है।

उम्र सीमा से जुड़े नियम क्या कहते हैं
भारत में सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2021 के तहत फर्टिलिटी उपचार के लिए स्पष्ट आयु सीमा निर्धारित की गई है। इस कानून के अनुसार, महिलाओं के लिए अधिकतम उम्र 50 वर्ष और पुरुषों के लिए 55 वर्ष तय की गई है। इसका मतलब यह है कि इस सीमा के बाद कोई भी व्यक्ति कानूनी रूप से आईवीएफ या अन्य संबंधित चिकित्सा प्रक्रियाओं का सहारा नहीं ले सकता।
ART तकनीक को सरल भाषा में समझें
जब किसी दंपति को प्राकृतिक तरीके से संतान प्राप्ति में कठिनाई होती है, तब आधुनिक चिकित्सा पद्धतियां मदद करती हैं। इसी को सहायक प्रजनन तकनीक कहा जाता है। इसमें आईवीएफ जैसी प्रक्रियाएं शामिल हैं, जिनके जरिए अंडाणु और शुक्राणु को प्रयोगशाला में निषेचित कर गर्भधारण कराया जाता है। कई मामलों में डोनर की मदद भी ली जाती है, जिससे संतान प्राप्ति संभव हो पाती है।
याचिकाकर्ताओं की आपत्ति क्या है
इन महिलाओं का कहना है कि कानून में तय की गई आयु सीमा तार्किक नहीं है और यह उनके मौलिक अधिकारों के खिलाफ है। उनका तर्क है कि यदि वे चिकित्सकीय रूप से सक्षम हैं, तो सिर्फ उम्र के आधार पर उन्हें मातृत्व के अवसर से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने अदालत से इस प्रावधान को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की है।
अदालत की कार्यवाही और अंतरिम राहत
मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति रवींद्र घुगे और न्यायमूर्ति अभय मंत्री की पीठ ने प्रारंभिक तौर पर महिलाओं को राहत देते हुए उन्हें मेडिकल फिटनेस जांच कराने की अनुमति दी। इससे पहले अदालत ने यह जानने के लिए वैज्ञानिक और चिकित्सीय आधार पर जानकारी मांगी थी कि इस आयु में गर्भधारण सुरक्षित है या नहीं। इसके जवाब में याचिकाकर्ताओं ने विशेषज्ञ डॉक्टर से प्राप्त प्रमाणपत्र पेश किए, जिसमें उन्हें गर्भधारण के लिए उपयुक्त बताया गया है।
न्यायालय की सहायता के लिए विशेषज्ञ की नियुक्ति
इस मामले की जटिलता को देखते हुए हाई कोर्ट ने एक वरिष्ठ विधि विशेषज्ञ को न्यायालय का सहयोगी नियुक्त किया है। महाराष्ट्र के पूर्व महाधिवक्ता आशुतोष कुंभकोणी को इस मामले में एमिकस क्यूरी बनाया गया है, ताकि वे कानूनी और नीतिगत पहलुओं पर अदालत को निष्पक्ष सलाह दे सकें।
संभावित असर क्या हो सकता है
यदि अदालत अंत में याचिकाकर्ताओं के पक्ष में फैसला देती है और आयु सीमा से जुड़े प्रावधान को निरस्त करती है, तो इसका व्यापक प्रभाव देखने को मिल सकता है। यह फैसला देश में प्रजनन अधिकारों की व्याख्या को नया रूप दे सकता है। साथ ही यह बहस भी तेज हो सकती है कि मातृत्व का अधिकार केवल उम्र के आधार पर सीमित किया जाना कितना उचित है।
बहस का दायरा और सामाजिक पहलू
यह मामला सिर्फ कानून तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके सामाजिक और नैतिक पहलू भी जुड़े हुए हैं। एक ओर चिकित्सा विज्ञान की प्रगति ने नई संभावनाएं खोली हैं, वहीं दूसरी ओर स्वास्थ्य जोखिम और नीतिगत संतुलन भी महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में अदालत का अंतिम निर्णय आने वाले समय में इस दिशा में एक अहम मार्गदर्शक साबित हो सकता है।