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SupremeCourt – सुधार के नाम पर धर्म में दखल पर अदालत ने की सख्त टिप्पणी

SupremeCourt – सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों वाली संविधान पीठ ने धार्मिक परंपराओं और सुधार के मुद्दे पर अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि किसी भी बदलाव के नाम पर धर्म की मूल संरचना को कमजोर नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि सदियों से चली आ रही धार्मिक प्रथाओं में हस्तक्षेप करते समय संतुलन बनाए रखना जरूरी है, क्योंकि यह आस्था और अंतरात्मा से जुड़े संवेदनशील विषय हैं। पीठ ने यह भी संकेत दिया कि हर मामले को केवल न्यायिक दृष्टिकोण से नहीं देखा जा सकता।

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संविधान पीठ की अहम टिप्पणी

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता में चल रही सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी उस समय सामने आई, जब विभिन्न धार्मिक स्थलों में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े मामलों पर विस्तृत बहस हो रही थी। पीठ ने कहा कि अदालतें सुधार के नाम पर धर्म की मूल पहचान को खत्म नहीं कर सकतीं। न्यायाधीशों ने यह भी माना कि आस्था से जुड़े मामलों को पूरी तरह कानूनी विवाद के रूप में देखना हमेशा उचित नहीं होता, क्योंकि इनमें सामाजिक और सांस्कृतिक पहलू भी जुड़े होते हैं।

सबरीमाला विवाद पर फिर चर्चा

सुनवाई के दौरान सबरीमाला मंदिर से जुड़े मुद्दे पर भी चर्चा हुई, जो पहले से ही देशभर में बहस का विषय रहा है। 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में सभी आयु वर्ग की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी थी। उसी फैसले के बाद मंदिर में प्रवेश करने वाली महिलाओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने अदालत के सामने अपना पक्ष रखा। उन्होंने संविधान के प्रावधानों का हवाला देते हुए व्यक्तिगत धार्मिक स्वतंत्रता को प्रमुख बताया।

व्यक्तिगत अधिकार बनाम धार्मिक परंपरा

इंदिरा जयसिंह ने दलील दी कि संविधान का अनुच्छेद 25(1) हर व्यक्ति को अपने धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता देता है, और यह अधिकार अनुच्छेद 26 के तहत धार्मिक संस्थाओं को मिले अधिकारों से ऊपर माना जाना चाहिए। उनके अनुसार अदालतें धार्मिक मामलों से पूरी तरह दूरी नहीं बना सकतीं, क्योंकि न्यायिक समीक्षा संविधान की मूल विशेषता है। उन्होंने यह भी कहा कि संविधान एक गतिशील दस्तावेज है, जिसकी व्याख्या समय के साथ बदलते सामाजिक संदर्भ में की जानी चाहिए।

न्यायपालिका की भूमिका पर सवाल

इस सुनवाई ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि धार्मिक मामलों में न्यायपालिका की सीमा क्या होनी चाहिए। एक ओर जहां व्यक्तिगत अधिकारों की रक्षा का दायित्व है, वहीं दूसरी ओर धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं का सम्मान भी जरूरी है। अदालत ने संकेत दिया कि इन दोनों के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं है और हर मामले को उसके विशेष संदर्भ में समझना होगा।

आगे की सुनवाई पर नजरें

मामले की सुनवाई जारी है और आने वाले दिनों में इस पर और विस्तृत बहस होने की संभावना है। यह फैसला केवल एक धार्मिक स्थल तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देशभर में धार्मिक स्वतंत्रता और समानता से जुड़े मामलों पर इसका प्रभाव पड़ सकता है। ऐसे में सभी पक्षों की दलीलों और अदालत की टिप्पणियों पर कानूनी विशेषज्ञों की नजर बनी हुई है।

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