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Surya Kant : CJI सूर्यकांत के रोहिंग्या बयान ने काटा बवाल, 44 रिटायर्ड जजों ने दिया समर्थन कवच…

Surya Kant CJI : भारतीय न्यायालयों के 44 से अधिक पूर्व न्यायाधीशों ने हाल ही में एक दुर्लभ और प्रभावशाली बयान जारी कर न्यायपालिका पर हो रहे हमलों के प्रति अपनी गहरी चिंता व्यक्त की है। रोहिंग्या प्रवासियों से जुड़े एक मामले में मुख्य न्यायाधीश द्वारा की गई टिप्पणियों को गलत तरीके से प्रस्तुत किए जाने पर यह सामूहिक प्रतिक्रिया सामने आई। उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के विवेक पर प्रश्न उठाना न्याय व्यवस्था की जड़ों को कमजोर करता है, विशेषकर जब न्यायिक प्रक्रिया को गलत ढंग से राजनीतिक चश्मे से देखा जाए। इस प्रसंग ने एक बार फिर दिखाया कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता किसी भी लोकतंत्र का मुख्य pillar होती है।

Surya Kant CJI
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खुले पत्र का विवाद और न्यायपालिका पर हमला

5 दिसंबर को जारी एक खुले पत्र में आरोप लगाया गया कि सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां पूर्वाग्रही थीं, जिससे पूरा विवाद शुरू हुआ। इस पत्र में दावा किया गया कि रोहिंग्या शरणार्थियों पर पूछे गए सवाल न्यायिक निष्पक्षता पर प्रश्न उठाते हैं। हालांकि, पूर्व जजों का कहना है कि इस तरह के आरोप न्यायपालिका को कमजोर करने के उद्देश्य से किए जाते हैं और इन्हें गंभीरता से लिया जाना चाहिए। उनका मानना है कि न्यायिक कार्यवाही की निष्पक्ष आलोचना तो स्वीकार्य है, लेकिन जानबूझकर की गई गलत व्याख्या एक गंभीर misinformation बन जाती है।


अवमानना अस्वीकार्य’—पूर्व जजों की कड़ी प्रतिक्रिया

साझा बयान में स्पष्ट तौर पर कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट की अवमानना किसी भी परिस्थिति में स्वीकार नहीं की जा सकती। न्यायिक संस्थाओं पर बिना ठोस आधार के किए गए हमले लोकतांत्रिक मूल्यों को ठेस पहुंचाते हैं। उनका कहना था कि न्यायपालिका की आलोचना तर्कपूर्ण और तथ्यपरक होनी चाहिए, न कि दुर्भावनापूर्ण। यहां पूर्व न्यायाधीशों ने यह भी कहा कि अदालत की प्रक्रिया को पूर्वाग्रहपूर्ण बताकर इसे अवैध ठहराने का प्रयास एक खतरनाक narrative तैयार करता है।


मुख्य न्यायाधीश पर निशाना—असल मुद्दे की अनदेखी

पूर्व न्यायाधीशों ने यह भी कहा कि मुख्य न्यायाधीश Surya Kant से पूछे गए मूलभूत कानूनी सवालों को जानबूझकर तोड़कर पेश किया गया। उन्होंने याद दिलाया कि अदालत ने स्पष्ट कहा था कि भारत में रहने वाले हर व्यक्ति—नागरिक हो या विदेशी—की गरिमा और मानवाधिकारों का संरक्षण किया जाएगा। लेकिन इन टिप्पणियों को नजरअंदाज कर केवल एकतरफा चित्रण पेश किया गया। बयान में कहा गया कि इस तरह का गलत प्रस्तुतिकरण एक खतरनाक agenda बन जाता है।


 ‘न्यायपालिका पर भरोसा’—पूर्व जजों का संदेश

संयुक्त बयान में पूर्व जजों ने सुप्रीम कोर्ट और मुख्य न्यायाधीश पर पूरा भरोसा जताया। उन्होंने कहा कि असहमति को व्यक्तिगत हमले के रूप में पेश करना दुर्भाग्यपूर्ण है और संविधानिक व्यवस्था के लिए हानिकारक भी। देश की न्याय प्रणाली में मानवता और विवेक दोनों की आवश्यकता है, और यह संतुलन तभी बना रह सकता है जब संस्था पर निराधार हमले बंद हों। न्यायपालिका के प्रति इस सामूहिक समर्थन ने न्यायिक credibility को मजबूती दी है।


रोहिंग्या विवाद की जड़ें क्या हैं?

भारत में रोहिंग्याओं की स्थिति लंबे समय से बहस का विषय रही है। म्यांमार के रखाइन प्रांत से विस्थापित होकर भारत पहुंचे इन समुदायों को शरणार्थी का दर्जा देने के लिए भारत के पास कोई वैधानिक ढांचा नहीं है, क्योंकि भारत 1951 के शरणार्थी सम्मेलन का हस्ताक्षरकर्ता नहीं है। ऐसे में रोहिंग्याओं का दर्जा मुख्यतः संवैधानिक सिद्धांतों और मानवाधिकार मानकों पर आधारित है। इस अनिश्चितता ने पूरे मामले को जटिल legal-status का मुद्दा बना दिया है।


CJI द्वारा उठाया गया मूल प्रश्न

हालिया सुनवाई में मुख्य न्यायाधीश Surya Kant ने यह मूलभूत प्रश्न उठाया कि रोहिंग्या जिस दर्जे का दावा कर रहे हैं, वह दर्जा उन्हें किस कानून से प्राप्त होता है। अदालत का कहना था कि बिना कानूनी मान्यता के किसी दर्जे को स्वीकार करना न्यायिक प्रक्रिया के खिलाफ है। यही सवाल विवाद का केंद्र बन गया, जबकि यह एक बेहद तकनीकी interpretation से जुड़ा मुद्दा था।


‘रेड कार्पेट बिछाने’ वाली टिप्पणी—क्या था उसका संदर्भ?

सुप्रीम कोर्ट ने तीखी टिप्पणी करते हुए पूछा कि क्या देश को हर घुसपैठिए के लिए रेड कार्पेट बिछा देना चाहिए, जबकि देश के अपने नागरिक गरीबी से संघर्ष कर रहे हैं। यह टिप्पणी उन याचिकाओं के संदर्भ में आई, जिनमें आरोप लगाया गया था कि कुछ रोहिंग्या पुलिस हिरासत से लापता हो गए हैं। अदालत का कहना था कि बिना कानूनी अनुमति के भारत में प्रवेश करना घुसपैठ कहलाता है, और ऐसे मामलों में देश की सुरक्षा और जनसंख्या पर पड़ने वाला असर भी ध्यान में रखना पड़ता है। यह टिप्पणी मुख्यतः security चिंता से जुड़ी थी।


 नागरिकों के अधिकारों पर जोर—अदालत की प्राथमिकता

मुख्य न्यायाधीश ने यह भी सवाल उठाया कि अवैध रूप से प्रवेश करने वालों को सभी सुविधाएं देना कितना उचित है, जब देश में असंख्य नागरिक अभी भी गरीबी और बुनियादी सुविधाओं के लिए जूझ रहे हैं। उन्होंने कहा कि मानवता का अर्थ अव्यवस्था नहीं होता। अवैध प्रवास का समाधान कानून के दायरे में रहकर ही किया जा सकता है। अदालत की यह सोच राष्ट्रीय priorities को दर्शाती है।


44 पूर्व न्यायाधीश—एकजुट और स्पष्ट रुख

इस पूरे विवाद पर हस्ताक्षर करने वाले 44 पूर्व न्यायाधीशों की सूची काफी लंबी और प्रभावशाली है। इसमें कई सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के पूर्व जज शामिल हैं, जिनमें जस्टिस अनिल दवे, जस्टिस हेमंत गुप्ता, जस्टिस एस. एन. ढींगरा, जस्टिस विनीत कोठारी और कई अन्य प्रमुख नाम शामिल हैं। इन सभी न्यायाधीशों का यह एकजुट रुख बताता है कि देश की न्यायपालिका संबंधी बहसें केवल भावनाओं पर नहीं, बल्कि संस्थागत integrity पर आधारित होनी चाहिए।

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