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West Bengal Voter List Revision 2025: बंगाल की मतदाता सूची में हुआ भारी उलटफेर, क्या अब भी सुरक्षित है आपके वोट का अधिकार…

West Bengal Voter List Revision 2025: पश्चिम बंगाल की राजनीति में उस वक्त हड़कंप मच गया जब विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दूसरे चरण के बाद ड्राफ्ट मतदाता सूची जारी की गई। इस नई सूची ने सबको चौंका दिया है क्योंकि राज्य में मतदाताओं की कुल संख्या घटकर अब 7.1 करोड़ रह गई है। चुनाव आयोग द्वारा की गई इस (voter roll verification) प्रक्रिया का मुख्य उद्देश्य फर्जीवाड़े को रोकना और केवल वास्तविक नागरिकों को ही मतदान का अधिकार सुनिश्चित करना है। इस भारी कटौती ने राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है कि आखिर इतनी बड़ी संख्या में नाम कैसे कम हो गए।

West Bengal Voter List Revision 2025
West Bengal Voter List Revision 2025

58 लाख नामों पर गिरी गाज: आखिर क्यों?

अक्टूबर 2025 के अंत तक बंगाल में मतदाताओं का आंकड़ा 7.6 करोड़ के करीब था, लेकिन जांच के बाद इसमें से 7.6 प्रतिशत नाम हटा दिए गए हैं। लगभग 58 लाख लोगों के नाम सूची से बाहर करने के पीछे मुख्य कारण (electoral database cleanup) बताया जा रहा है, जिसमें मृत व्यक्ति, स्थानांतरित लोग और एक से अधिक स्थान पर पंजीकृत मतदाता शामिल हैं। आयोग का मानना है कि एक स्वच्छ लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए सूची से इन विसंगतियों को दूर करना अनिवार्य था ताकि चुनाव की शुचिता बनी रहे।

1.9 करोड़ मतदाताओं को नोटिस की तैयारी

जांच के दौरान अधिकारियों को डेटा में भारी तार्किक खामियां मिली हैं, जिसके कारण लगभग 1.9 करोड़ मतदाताओं की पहचान पर सवाल खड़े हो गए हैं। इन सभी लोगों को जल्द ही (election commission notice) जारी किए जाएंगे, जिसमें उन्हें अपनी नागरिकता और पते की स्थिति स्पष्ट करनी होगी। यदि ये मतदाता निर्धारित समय सीमा के भीतर सुनवाई के दौरान उपस्थित नहीं होते या ठोस सबूत पेश नहीं कर पाते, तो उनका नाम अंतिम सूची से स्थायी रूप से हटा दिया जाएगा। यह कदम पारदर्शी चुनाव प्रक्रिया की दिशा में एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है।

अजीबोगरीब गलतियों का हुआ सनसनीखेज खुलासा

मतदाता सूची के विश्लेषण में ऐसी जानकारियां सामने आई हैं जो किसी को भी हैरान कर सकती हैं। डेटा एंट्री के दौरान एक ही अभिभावक के साथ छह से ज्यादा बच्चों के नाम दर्ज होना या पिता और संतान की आयु में असामान्य अंतर जैसी (logical data inconsistencies) कई त्रुटियां पकड़ी गई हैं। इसके अलावा 45 वर्ष से अधिक उम्र के ऐसे लोग भी बड़ी संख्या में मिले हैं जिनका पहले कभी कोई चुनावी रिकॉर्ड नहीं था। नियमों में ढील के कारण पिछले चरणों में दस्तावेज अनिवार्य नहीं थे, जिसका फायदा उठाकर कई गलत प्रविष्टियां सिस्टम में शामिल हो गई थीं।

कोलकाता में रिकॉर्ड स्तर पर कटे नाम

हैरानी की बात यह है कि ग्रामीण इलाकों की तुलना में कोलकाता जैसे महानगरों में नाम कटने की दर सबसे अधिक रही है। आंकड़ों के अनुसार कोलकाता उत्तर में लगभग 25.9 प्रतिशत और कोलकाता दक्षिण में 23.8 प्रतिशत मतदाताओं के नाम (delisting of voters) की प्रक्रिया के तहत हटाए गए हैं। इसके विपरीत पूर्व मेदिनीपुर में यह गिरावट सबसे कम यानी मात्र 3.3 प्रतिशत दर्ज की गई। जिलों के बीच का यह बड़ा अंतर यह दर्शाता है कि शहरी क्षेत्रों में मतदाता सूचनाओं के अपडेशन में भारी लापरवाही बरती गई थी।

सीमावर्ती जिलों में पिता के नाम पर उलझा पेंच

बांग्लादेश की सीमा से सटे जिलों में नाम कटने की दर भले ही राज्य के औसत से कम रही हो, लेकिन वहां एक अलग तरह की समस्या सामने आई है। मालदा, उत्तर दिनाजपुर और मुर्शिदाबाद जैसे संवेदनशील जिलों में (parental name mismatch) की समस्या सबसे ज्यादा देखी गई है, जहां 12 से 16 प्रतिशत मामलों में पिता के नाम में गंभीर विसंगतियां पाई गई हैं। इन जिलों में डेटा की शुद्धता सुनिश्चित करना चुनाव आयोग के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो रहा है, क्योंकि यहां की जनसांख्यिकी बेहद संवेदनशील है।

राजस्थान और गोवा समेत अन्य राज्यों का हाल

वोटर लिस्ट में सुधार का यह अभियान केवल पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के अन्य हिस्सों में भी इसी तरह की कार्रवाई की गई है। राजस्थान में भी 7.6 प्रतिशत मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं, जबकि गोवा में यह आंकड़ा 8.45 प्रतिशत और पुडुचेरी में 10.1 प्रतिशत रहा है। इस (national voter list update) अभियान के तहत लक्षद्वीप में सबसे कम 2.47 प्रतिशत नाम काटे गए हैं। इससे साफ जाहिर होता है कि चुनाव आयोग पूरे देश के चुनावी डेटा को डिजिटल रूप से शुद्ध और सटीक बनाने के मिशन पर काम कर रहा है।

कैसे और कब तक सुधारें अपनी गलती

चुनाव आयोग ने अब गेंद जनता और राजनीतिक दलों के पाले में डाल दी है। मृत और डुप्लीकेट मतदाताओं की विस्तृत सूची बूथ लेवल एजेंटों को सौंप दी गई है और इसे आधिकारिक वेबसाइट पर भी अपलोड कर दिया गया है। जिन लोगों के नाम कट गए हैं या जिन्हें नोटिस मिला है, वे (claims and objections) दाखिल करने के लिए 15 जनवरी 2026 तक का समय ले सकते हैं। इसके बाद 7 फरवरी तक सत्यापन की प्रक्रिया पूरी की जाएगी और अंततः 14 फरवरी को वह सूची आएगी जिसके आधार पर भविष्य के चुनावों का फैसला होगा।

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