उत्तराखण्ड

Uttarakhand Forest Land Encroachment Case: देवभूमि के जंगलों पर भू-माफियाओं ने किया खूनी प्रहार

Uttarakhand Forest Land Encroachment Case: उत्तराखंड की शांत वादियों में इन दिनों एक ऐसा तूफान उठा है जिसने न्यायपालिका से लेकर शासन तक को हिलाकर रख दिया है। देवभूमि की लगभग 2866 एकड़ अधिसूचित वन भूमि पर जिस तरह से निजी कब्जों का जाल फैलाया गया है, उसने (Himalayan Ecology Preservation) की संवेदनशीलता को खतरे में डाल दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे घटनाक्रम को केवल एक जमीन विवाद नहीं, बल्कि पर्यावरण के खिलाफ एक सुनियोजित साजिश करार दिया है। माननीय न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि इसी गति से जंगलों को निगला गया, तो आने वाली पीढ़ियां केवल कंक्रीट के पहाड़ ही देख पाएंगी।

Uttarakhand Forest Land Encroachment Case
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मूक दर्शक बना प्रशासन और भू-माफियाओं की चांदी

जंगलों की इस खुली लूट पर देश की सबसे बड़ी अदालत ने राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर तीखे सवाल उठाए हैं। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने अपनी टिप्पणी में राज्य के अधिकारियों की भूमिका को लेकर (Environmental Law Enforcement) की विफलता पर गहरी नाराजगी व्यक्त की है। कोर्ट ने हैरानी जताते हुए कहा कि हजारों एकड़ बेशकीमती वन भूमि अधिकारियों की आंखों के सामने हड़प ली गई और शासन ‘मूक दर्शक’ बनकर तमाशा देखता रहा। यह स्थिति न केवल प्रशासनिक लापरवाही को दर्शाती है, बल्कि तंत्र की मिलीभगत की ओर भी इशारा करती है।

पशुलोक सेवा समिति और लीज के नाम पर ऐतिहासिक खेल

इस विवाद की जड़ें दशकों पुरानी हैं, जो साल 1950 के दौर से जुड़ी हुई हैं। उस समय ऋषिकेश की पशुलोक सेवा समिति को भूमिहीन लोगों के कल्याण के लिए जमीन लीज पर आवंटित की गई थी। हालांकि, समय बीतने के साथ यह जनहित का कार्य (Land Mafia Operations) का जरिया बन गया। साल 1984 में समिति द्वारा कुछ हिस्सा वापस किया गया, लेकिन शेष भूमि पर अवैध कब्जों का सिलसिला शुरू हो गया। आज वही भूमि निजी संपत्ति की तरह इस्तेमाल की जा रही है, जो वास्तव में राज्य की वन संपदा का हिस्सा होनी चाहिए थी।

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक हस्तक्षेप और स्वतः संज्ञान

मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अब इस याचिका के दायरे को बढ़ा दिया है। अनिता कंडवाल की याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने इसे (Suo Motu Judicial Action) के तौर पर आगे बढ़ाने का निर्णय लिया है। मुख्य न्यायाधीश ने साफ कर दिया है कि हिमालयी क्षेत्र की सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं किया जाएगा। अब इस मामले की जांच के लिए एक विशेष कमेटी का गठन किया गया है, जिसमें मुख्य सचिव और प्रधान वन संरक्षक को अपनी विस्तृत रिपोर्ट पेश करनी होगी।

वन भूमि की खरीद-फरोख्त पर न्यायालय का पूर्ण प्रतिबंध

न्यायालय ने विवादित 2866 एकड़ भूमि को लेकर बेहद सख्त आदेश जारी किए हैं। वर्तमान में इस भूमि पर ‘यथास्थिति’ (Status Quo Maintenance) बनाए रखने का निर्देश दिया गया है। इसका अर्थ यह है कि अब इस जमीन की न तो बिक्री की जा सकती है और न ही इसे किसी तीसरे पक्ष को हस्तांतरित किया जा सकता है। इसके साथ ही, खाली पड़ी जमीन पर वन विभाग और जिला कलेक्टर को तुरंत कब्जा लेने के आदेश दिए गए हैं, ताकि भविष्य में होने वाले अतिक्रमण को रोका जा सके।

अवैध निर्माण पर रोक और बेदखली की तैयारी

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अब उस चिन्हित भूमि पर किसी भी प्रकार के नए निर्माण पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई है। हालांकि, कोर्ट ने मानवीय पक्ष को ध्यान में रखते हुए पुराने आवासीय मकानों को फिलहाल राहत दी है, लेकिन (Forest Land Reclamation) की प्रक्रिया को तेज करने के निर्देश दिए हैं। जो जमीन खाली है, उसे तुरंत वन विभाग के अधीन किया जाएगा ताकि वहां फिर से वनीकरण का कार्य शुरू हो सके और पर्यावरण संतुलन को बहाल किया जा सके।

जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाओं का अलार्म

उत्तराखंड पिछले कुछ वर्षों से लगातार प्राकृतिक आपदाओं का सामना कर रहा है, जिसमें जंगलों का घटता दायरा एक प्रमुख कारण है। जब वन भूमि पर अतिक्रमण होता है, तो वह सीधे तौर पर (Climate Change Mitigation) के प्रयासों को कमजोर करता है। जंगलों के कटने से भूस्खलन और अचानक आने वाली बाढ़ जैसी घटनाएं बढ़ रही हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इसी नाजुक स्थिति को समझते हुए कहा है कि यह अतिक्रमण हिमालय की जैव विविधता को अपूरणीय क्षति पहुंचा रहा है, जिसे रोकना अनिवार्य है।

5 जनवरी की तारीख और न्याय की उम्मीद

इस महत्वपूर्ण मामले की अगली सुनवाई के लिए 5 जनवरी 2026 की तारीख तय की गई है। तब तक जांच कमेटी को अपनी रिपोर्ट सौंपनी होगी और राज्य सरकार को यह बताना होगा कि आखिर इतनी बड़ी लापरवाही कैसे हुई। उत्तराखंड की जनता और पर्यावरण प्रेमी अब (Judicial Accountability) की ओर टकटकी लगाए देख रहे हैं। यह फैसला न केवल उत्तराखंड के लिए, बल्कि पूरे देश के आरक्षित वनों की सुरक्षा के लिए एक मिसाल बनेगा, ताकि भविष्य में कोई भी वन भूमि पर आंख उठाने का साहस न कर सके।

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