Corbett National Park: उत्तराखंड के जंगलों में बाघों और हाथियों की भारी भीड़, सिमटता दायरा बना बड़ी चुनौती
Corbett National Park: उत्तराखंड के विश्व प्रसिद्ध जिम कार्बेट नेशनल पार्क और राजाजी टाइगर रिजर्व से वन्यजीव संरक्षण को लेकर सुखद लेकिन चिंताजनक खबरें सामने आ रही हैं। इन जंगलों में बाघों और हाथियों का कुनबा इस कदर बढ़ गया है कि अब यह प्राकृतिक क्षेत्र उनके लिए छोटा पड़ने लगा है। आंकड़ों की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि साल 2000 में जितने वन क्षेत्र में एक बाघ विचरण करता था, आज उसी दायरे में 14 से 17 बाघों का बसेरा है। जगह की कमी के कारण अब ये शिकारी जीव नए ठिकानों की तलाश में अल्मोड़ा और पौड़ी जैसे पहाड़ी जिलों की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे इंसानी बस्तियों पर खतरा मंडराने लगा है।

आबादी में रिकॉर्ड बढ़ोत्तरी और सिमटती धारण क्षमता
वन विभाग के आधिकारिक आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि पिछले 25 वर्षों में राज्य में बाघों की संख्या 166 से बढ़कर 560 तक पहुंच गई है। इनमें से अकेले कार्बेट नेशनल पार्क में 260 और राजाजी पार्क में 54 बाघ मौजूद हैं, जबकि शेष अन्य वन प्रभागों में रह रहे हैं। वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, सामान्यतः एक वयस्क बाघ को लगभग 60 वर्ग किलोमीटर का इलाका चाहिए होता है, जबकि बाघिन 15 से 30 वर्ग किलोमीटर के दायरे में अपना प्रभुत्व रखती है। इस गणित के हिसाब से कार्बेट की क्षमता अधिकतम 175 बाघों की है, लेकिन वहां क्षमता से कहीं अधिक 260 बाघ एक-दूसरे के क्षेत्रों में अतिक्रमण कर रहे हैं।
राजाजी पार्क में हाथियों की संख्या तीन गुना बढ़ी
बाघों के साथ-साथ हाथियों के मामले में भी स्थिति गंभीर होती जा रही है। राजाजी टाइगर रिजर्व में कभी हाथियों की कुल संख्या 135 हुआ करती थी, जो अब बढ़कर करीब 450 हो गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस पार्क की प्राकृतिक धारण क्षमता अधिकतम 300 हाथियों की ही है। भोजन और पानी की तलाश में हाथियों के झुंड अब अक्सर पार्क की सीमाओं को लांघकर आबादी वाले क्षेत्रों या कृषि भूमि में घुस रहे हैं। हाथियों की इस बढ़ती तादाद ने वनों के भीतर के इकोसिस्टम पर भी दबाव बढ़ा दिया है, जिससे उनके बीच आपसी संघर्ष की घटनाएं बढ़ने की आशंका है।
विशेषज्ञों ने जताई मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ने की चिंता
एपीसीसीएफ वाइल्डलाइफ डॉ. विवेक पांडे ने इस स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि 100 वर्ग किलोमीटर में बाघों का घनत्व इतना बढ़ना प्राकृतिक संतुलन के लिए चुनौती है। उन्होंने जोर दिया कि अब हमें वैज्ञानिक संस्थानों की मदद से जंगलों की वास्तविक धारण क्षमता का पुनर्मूल्यांकन करना होगा। यदि समय रहते वन्यजीवों के लिए सुरक्षित कॉरिडोर और नए पर्यावास विकसित नहीं किए गए, तो मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं को रोकना मुश्किल हो जाएगा। बाघों का पहाड़ी जिलों में मिलना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि वे अपने पारंपरिक क्षेत्रों से बाहर धकेले जा रहे हैं।
रेस्क्यू सेंटर भी हुए हाउसफुल, प्रबंधन में आ रही दिक्कत
जंगलों के बाहर पकड़े गए या घायल वन्यजीवों के लिए बनाए गए रेस्क्यू सेंटर भी अब अपनी क्षमता खो चुके हैं। हरिद्वार के चिड़ियापुर रेस्क्यू सेंटर में 10 की क्षमता के मुकाबले 23 गुलदार रखे गए हैं। यही हाल कार्बेट के ढेला और हल्द्वानी के रानीपुर सेंटर का है, जहां क्षमता से अधिक वन्यजीवों को रखने के कारण उनके स्वास्थ्य और व्यवहार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। अल्मोड़ा का केंद्र भी पूरी तरह भर चुका है। विभाग के लिए अब सबसे बड़ी चुनौती इन बढ़ते वन्यजीवों के बेहतर प्रबंधन और उनके लिए नए सुरक्षित ठिकानों की व्यवस्था करना है।



