Sasaram Electricity Supply Cut Controversy: सासाराम के जिगना गांव में बिजली विभाग की दबंगई, बूंद-बूंद पानी को तरसे ग्रामीण
Sasaram Electricity Supply Cut Controversy: बिहार के सासाराम से एक ऐसी घटना सामने आई है जिसने सरकारी तंत्र की संवेदनहीनता और अधिकारियों की मनमानी को उजागर कर दिया है। शिवसागर थाना क्षेत्र के जिगना गांव में बिजली विभाग के एक इंजीनियर और एक स्थानीय व्यक्ति के बीच हुए विवाद ने पूरे गांव के लिए मुसीबत खड़ी कर दी है। आरोप है कि मामूली कहासुनी और कथित मारपीट के बाद विभाग ने (Official power abuse) का परिचय देते हुए पूरे गांव की बिजली काट दी। शनिवार की सुबह से ही गांव की सप्लाई बंद है, जिसके कारण हजारों की आबादी पिछले कई घंटों से अंधेरे में रहने को मजबूर है।

नल-जल योजना ठप और पानी के लिए मचा हाहाकार
बिजली कटने का सबसे बुरा असर गांव की जलापूर्ति पर पड़ा है। सरकार की महत्वाकांक्षी नल-जल योजना बिजली पर आधारित है, और आपूर्ति बंद होने से पानी की टंकियां खाली हो गई हैं। ग्रामीणों का कहना है कि वे (Drinking water crisis) का सामना कर रहे हैं और बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे हैं। आलम यह है कि लोग दूसरे गांवों से बाल्टियों में पानी भरकर ला रहे हैं। स्वच्छ पेयजल न मिलने से गांव में बीमारी फैलने का डर भी सता रहा है, लेकिन विभाग अपनी जिद पर अड़ा हुआ है।
अंधेरे में डूबा गांव और ठप हुई बच्चों की पढ़ाई
सूरज ढलते ही पूरा जिगना गांव गहरे अंधेरे के आगोश में समा जाता है। बिजली न होने से न केवल घरेलू कामकाज प्रभावित हो रहे हैं, बल्कि छोटे बच्चों की पढ़ाई पर भी इसका गहरा असर पड़ा है। (Academic loss for students) की चिंता करते हुए अभिभावकों ने बताया कि परीक्षाओं के समय में इस तरह की अघोषित कटौती उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ है। इतना ही नहीं, मोबाइल चार्जिंग से लेकर दैनिक जीवन की छोटी-छोटी जरूरतों के लिए भी लोगों को मीलों दूर दौड़ लगानी पड़ रही है।
क्या सामूहिक सजा देना संवैधानिक रूप से जायज है?
गांव के सामाजिक कार्यकर्ता मनोज सिंह ने इस कार्रवाई पर कड़े सवाल उठाए हैं। उन्होंने तर्क दिया कि यदि किसी एक व्यक्ति ने विभाग के साथ दुर्व्यवहार किया है, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए, जैसा कि एफआईआर (Legal FIR filing) के जरिए किया भी गया है। लेकिन एक व्यक्ति की गलती की सजा पूरे गांव के ईमानदार उपभोक्ताओं को देना सरासर गलत है। गांव के अधिकांश लोग नियमित रूप से बिजली बिल का भुगतान करते हैं, ऐसे में सामूहिक रूप से बिजली काटना मानवाधिकारों का उल्लंघन है।
अधिकारियों की दलील: चोरी या रंजिश?
इस पूरे मामले पर विद्युत बोर्ड के कार्यपालक अभियंता ब्रविन ने एक अजीबोगरीब बयान दिया है। उन्होंने कहा कि जेई के साथ मारपीट की गई थी और इलाके में चोरी से बिजली जलाई जा रही थी। हालांकि, उन्होंने (Administrative negligence) को छिपाते हुए यह भी कह दिया कि उन्हें पूरे गांव की लाइन कटने की जानकारी नहीं है और यदि ऐसा है तो वे इसे जुड़वाएंगे। विभाग के अधिकारियों के बयानों में विरोधाभास साफ तौर पर प्रशासनिक तालमेल की कमी को दर्शाता है।
अनुमंडल पदाधिकारी का हस्तक्षेप और कार्रवाई का भरोसा
मामला बढ़ता देख स्थानीय प्रशासन हरकत में आया है। अनुमंडल पदाधिकारी डॉ. नेहा कुमारी ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि उपभोक्ताओं के साथ मारपीट के मामले में प्राथमिकी दर्ज हो चुकी है, लेकिन पूरे गांव की (Mass power disconnection) करना पूरी तरह गलत और नियम विरुद्ध है। उन्होंने आश्वासन दिया है कि बिजली विभाग के इंजीनियरों से बात कर जल्द से जल्द आपूर्ति बहाल कराई जाएगी। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द सुधार नहीं हुआ तो वे जिला अधिकारी (DM) के पास न्याय की गुहार लगाएंगे।
व्यवस्था पर सवाल: क्या जनता की सुविधा सर्वोपरि नहीं?
यह घटना बिहार में अफसरशाही के उस चेहरे को दिखाती है जहां अधिकारी अपनी ताकत का इस्तेमाल जनसेवा के बजाय रंजिश निकालने के लिए करते हैं। सरकार की योजनाओं को (Public service disruption) के जरिए ठप करना सरकारी संपत्ति का भी नुकसान है। जिगना गांव के लोग अब न्याय के साथ-साथ यह भी मांग कर रहे हैं कि बिजली विभाग के उन दोषी अधिकारियों पर भी कार्रवाई हो जिन्होंने एक तुच्छ विवाद की खातिर पूरे गांव को नरक जैसी स्थिति में धकेल दिया।



