US Greenland Geopolitical Crisis: क्या सैन्य बल से बदलेगी सरहद की दीवार, दुनिया हैरान और नाटो परेशान…
US Greenland Geopolitical Crisis: दुनिया अभी वेनेजुएला के घटनाक्रमों को देख ही रही थी कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक और साहसी लेकिन विवादित दांव चल दिया है। वाइट हाउस की हालिया घोषणा ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की मेज पर खलबली मचा दी है, जिसमें खनिज संसाधनों से लबालब ग्रीनलैंड पर नियंत्रण पाने की बात कही गई है। इस (International Diplomatic Relations) को प्रभावित करने वाले फैसले ने यूरोपीय देशों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। ट्रंप की इस नई महत्वाकांक्षा ने न केवल डेनमार्क के साथ संबंधों को तनावपूर्ण बना दिया है, बल्कि वैश्विक सुरक्षा के पुराने ढांचे पर भी सवालिया निशान लगा दिए हैं।

राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर सैन्य विकल्पों की आहट
वाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि ग्रीनलैंड अब अमेरिका के लिए महज एक द्वीप नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय सुरक्षा प्राथमिकता बन चुका है। अमेरिका का तर्क है कि आर्कटिक क्षेत्र में रूस और चीन की बढ़ती गतिविधियों को रोकने के लिए ग्रीनलैंड का अधिग्रहण (National Security Strategy) के दृष्टिकोण से अनिवार्य है। प्रशासन ने यह भी संकेत दिया है कि इस विदेश नीति लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए कमांडर-इन-चीफ के रूप में राष्ट्रपति ट्रंप अमेरिकी सेना का उपयोग करने जैसे कड़े विकल्पों पर भी गंभीरता से विचार कर रहे हैं।
क्या है ट्रंप की रणनीति और पसंदीदा विकल्प
विशेषज्ञों और मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो इस समय ट्रंप की उस योजना को अमली जामा पहनाने में जुटे हैं, जिसके तहत ग्रीनलैंड को खरीदने का प्रस्ताव दिया जा सकता है। हालांकि (Foreign Policy Objectives) को पूरा करने के लिए खरीदारी का विकल्प सबसे ऊपर है, लेकिन जिस तरह से सैन्य चर्चाएं की जा रही हैं, उसने डेनमार्क को रक्षात्मक मुद्रा में ला खड़ा किया है। वाइट हाउस का मानना है कि ग्रीनलैंड की भौगोलिक स्थिति भविष्य के महाशक्ति संघर्षों में अमेरिका को एक अजेय बढ़त दिला सकती है।
नाटो के अस्तित्व पर मंडराता सबसे बड़ा संकट
डेनमार्क ने इस पूरे प्रकरण पर कड़ी नाराजगी व्यक्त करते हुए चेतावनी दी है कि ग्रीनलैंड पर किसी भी तरह का बलपूर्वक नियंत्रण 80 साल पुराने ट्रांसअटलांटिक संबंधों की नींव हिला देगा। जानकारों का कहना है कि यदि अमेरिका सैन्य कार्रवाई करता है, तो यह (NATO Security Alliance) के अनुच्छेद 5 का सीधा उल्लंघन होगा। यह अनुच्छेद कहता है कि एक सदस्य पर हमला सभी पर हमला माना जाएगा। ऐसे में एक सदस्य देश का दूसरे पर ही आक्रमण करना नाटो के पूरे अस्तित्व को समाप्त कर सकता है और यूरोप को सुरक्षा के लिए नए रास्ते खोजने पर मजबूर कर सकता है।
ग्रीनलैंड का दोटूक जवाब: “हम बिकाऊ नहीं हैं”
ग्रीनलैंड की प्रधानमंत्री जेन्स-फ्रेडरिक निल्सन ने वैश्विक मंच पर अपनी संप्रभुता का पुरजोर बचाव करते हुए कहा है कि उनका द्वीप किसी भी कीमत पर बिकाऊ नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ग्रीनलैंड का भविष्य वहां रहने वाले 57,000 निवासियों के हाथों में है, न कि किसी बाहरी शक्ति की मेज पर। इस (Territorial Sovereignty Rights) की रक्षा के लिए ग्रीनलैंड और डेनमार्क के नेताओं ने अमेरिकी नेतृत्व से मिलने का समय मांगा है, लेकिन अभी तक वाशिंगटन से कोई सकारात्मक जवाब नहीं आया है, जिससे अनिश्चितता का माहौल और गहरा हो गया है।
यूरोपीय देशों की एकजुटता और कड़ा विरोध
ट्रंप के इस रुख के खिलाफ यूरोपीय शक्तियों ने भी लामबंदी शुरू कर दी है। ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली और स्पेन जैसे प्रमुख देशों ने डेनमार्क के साथ खड़े होने का संकल्प लिया है। इन देशों ने एक साझा बयान जारी कर कहा है कि किसी भी देश की क्षेत्रीय अखंडता के साथ खिलवाड़ करना (International Law Compliance) के खिलाफ है और सभ्य समाज में इसकी कोई जगह नहीं है। कनाडा ने भी इस मुद्दे पर डेनमार्क का समर्थन किया है और कहा है कि ग्रीनलैंड का निर्णय वहां की जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों के अधीन होना चाहिए।
स्थानीय स्तर पर आक्रोश और नाराजगी का ज्वार
ग्रीनलैंड के भीतर स्थानीय निवासियों और बिजनेस एसोसिएशनों में इस चर्चा को लेकर गहरी नफरत देखी जा रही है। ‘ग्रीनलैंड बिजनेस एसोसिएशन’ का मानना है कि अमेरिका का यह व्यवहार एक आधुनिक और सभ्य दुनिया के मानकों के साथ मेल नहीं खाता। हालांकि (Global Economic Interests) के कारण अमेरिका इस क्षेत्र पर नजर गड़ाए हुए है, लेकिन स्थानीय लोग इसे अपनी पहचान और संस्कृति पर हमले के रूप में देख रहे हैं। ट्रंप के डिप्टी चीफ ऑफ स्टाफ स्टीफन मिलर के बयानों ने इस आग में और घी डालने का काम किया है, जिसमें उन्होंने कहा कि कोई भी सैन्य रूप से अमेरिका का सामना नहीं कर पाएगा।
आर्कटिक में पहले से मौजूद अमेरिकी सैन्य ढांचा
यह भी उल्लेखनीय है कि ग्रीनलैंड में अमेरिका की मौजूदगी बिल्कुल नई नहीं है। वहां के पिटुफिक स्पेस बेस पर पहले से ही करीब 150 अमेरिकी सैन्यकर्मी तैनात हैं। आर्कटिक का यह आधार अमेरिकी (Military Surveillance Systems) के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। ट्रंप प्रशासन इसी मौजूदगी को अब पूर्ण नियंत्रण में बदलना चाहता है ताकि इस क्षेत्र के अपार प्राकृतिक संसाधनों और सामरिक महत्व का उपयोग रूस और चीन के खिलाफ किया जा सके। भविष्य में यह द्वीप वैश्विक संघर्षों का सबसे गर्म केंद्र बनने की राह पर है।
भविष्य की अनिश्चितता और कूटनीतिक चुनौतियां
आने वाले महीनों में ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका और यूरोप के बीच की यह तकरार कूटनीति के लिए एक कठिन परीक्षा होगी। यदि ट्रंप अपनी जिद पर अड़े रहते हैं, तो दुनिया एक ऐसे विभाजन की गवाह बनेगी जो शीत युद्ध के बाद कभी नहीं देखा गया। (Geopolitical Power Shift) के इस दौर में ग्रीनलैंड की नियति केवल भूगोल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय नियमों और संप्रभुता की परिभाषा को फिर से लिखने का आधार बन सकती है। फिलहाल पूरी दुनिया की नजरें वाइट हाउस के अगले कदम पर टिकी हैं।



