झारखण्ड

Ranchi Court Acquittal News: रिश्तों पर लगे खून के दाग धुले, 6 साल बाद बेगुनाह साबित हुआ कातिल बेटा…

Ranchi Court Acquittal News: झारखंड की राजधानी रांची से न्याय की एक ऐसी मिसाल सामने आई है, जो भावुक भी करती है और कानूनी पेचीदगियों पर सोचने को मजबूर भी। टाटीसिल्वे थाना क्षेत्र के सिलवई गांव के कृष्णा महतो के लिए 18 सितंबर 2019 की वो तारीख काल बनकर आई थी, जब उसे अपनी ही मां की हत्या के संगीन आरोप में गिरफ्तार किया गया था। तब से लेकर आज तक, यानी 6 साल 3 महीने और 17 दिनों तक वह (Longest Jail Detention) की पीड़ा झेलता रहा। आज जब अदालत ने उसे बाइज्जत बरी किया है, तो सवाल यह उठता है कि उसकी जिंदगी के जो कीमती साल सलाखों के पीछे बर्बाद हुए, उसका हर्जाना कौन भरेगा?

Ranchi Court Acquittal News
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साक्ष्यों के अभाव में ढह गई अभियोजन की कहानी

अपर न्यायायुक्त शैलेंद्र कुमार की अदालत में जब इस मामले की सुनवाई शुरू हुई, तो पुलिस और अभियोजन पक्ष के दावों की पोल खुलती चली गई। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया कि कृष्णा महतो के खिलाफ (Lack of Forensic Evidence) इस कदर था कि उसे दोषी मानना न्याय का गला घोंटने जैसा होता। न तो कोई चश्मदीद गवाह सामने आया और न ही पुलिस कोई ऐसा वैज्ञानिक साक्ष्य पेश कर पाई जो यह साबित कर सके कि बेटे ने ही मां का गला घोटा था। जांच अधिकारी ने भी अंततः यह स्वीकार किया कि पूरी कहानी केवल संदेह पर आधारित थी।

गवाहों का मुकरना और कमजोर पड़ती पुलिसिया तफ्तीश

सुनवाई के दौरान आईओ संतोष कुमार ने अदालत के समक्ष कुल सात गवाहों को पेश किया था। लेकिन जैसे-जैसे जिरह आगे बढ़ी, अभियोजन की नींव हिल गई क्योंकि (Witness Hostility in Court) के कारण अधिकांश गवाह अपने पिछले बयानों से मुकर गए। जब मामले की मुख्य कड़ी ही टूट गई, तो अदालत के पास कृष्णा को रिहा करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा। कानून का यह स्थापित सिद्धांत है कि सौ गुनहगार भले छूट जाएं, लेकिन एक निर्दोष को सजा नहीं होनी चाहिए, और कृष्णा का मामला इसी सिद्धांत की जीत है।

जमीन विवाद और मां की मौत का वो काला दिन

इस पूरी त्रासदी की शुरुआत 16 सितंबर 2019 को हुई थी, जब घर के भीतर मुन्नी देवी का शव बरामद हुआ था। अगले ही दिन एक रिश्तेदार के बयान पर (Property Dispute Allegations) को आधार बनाकर टाटीसिल्वे थाने में केस दर्ज कर लिया गया। आरोप लगाया गया कि कृष्णा अपनी मां पर जमीन अपने नाम करने का दबाव बना रहा था और नाकाम होने पर उसने उनकी जान ले ली। इसी एक आरोप ने एक बेटे को समाज की नजरों में कातिल बना दिया और उसे वर्षों तक जेल की कालकोठरी में सड़ने के लिए मजबूर कर दिया।

पूर्व मंत्री के बेटे पर लगा सनसनीखेज आरोप

रांची की न्यायपालिका में जहां एक तरफ कृष्णा महतो को राहत मिली, वहीं दूसरी तरफ एक हाई-प्रोफाइल मामला भी चर्चा में है। पूर्व मंत्री योगेंद्र साव के पुत्र अमित राज पर अपहरण के प्रयास और जबरन वाहन ले जाने का गंभीर आरोप लगा है। बड़गाई निवासी पंकज नाथ ने (Criminal Complaint Against High Profile) के तहत डीजीपी और एसएसपी से गुहार लगाई है। आरोप है कि 25 दिसंबर की शाम को हिसाब-किताब के बहाने उन्हें बुलाकर अगवा करने की कोशिश की गई। पुलिस इस समय मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए हर पहलू की जांच कर रही है।

जान बचाकर भागे पंकज और अनसुलझा विवाद

पंकज नाथ की शिकायत के अनुसार, खेलगांव हाउसिंग सोसाइटी में उन्हें ले जाकर जान से मारने की धमकी दी गई। इस घटना के दौरान (Kidnapping Attempt Investigation) अब पुलिस के लिए चुनौती बन गई है क्योंकि इसमें एक रसूखदार परिवार का नाम शामिल है। पीड़ित का कहना है कि आरोपी उनकी गाड़ी भी छीन ले गए। खेलगांव थाना पुलिस अब घटनास्थल के आसपास के सीसीटीवी फुटेज खंगाल रही है ताकि सच सामने आ सके कि उस शाम वास्तव में क्या हुआ था और क्या यह महज पैसों का लेनदेन है या कोई गहरी साजिश।

न्याय में देरी और व्यवस्था पर उठते सवाल

कृष्णा महतो का 6 साल बाद जेल से बाहर आना जहां उनके परिवार के लिए खुशी की बात है, वहीं यह (Delayed Justice System) पर एक बड़ा प्रहार भी है। यदि वह निर्दोष था, तो उसे इतने वर्षों तक जेल में क्यों रहना पड़ा? क्या हमारी जांच एजेंसियां इतनी कमजोर हैं कि वे निर्दोष और अपराधी के बीच का अंतर समय रहते नहीं पहचान पातीं? कृष्णा की रिहाई उन हजारों कैदियों के लिए एक उम्मीद की किरण है जो बिना किसी ठोस सबूत के बरसों से ट्रायल का इंतजार कर रहे हैं।

समाज और परिवार के बीच कृष्णा की नई शुरुआत

अब जब कृष्णा महतो जेल की दीवारों से बाहर आ चुके हैं, तो उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती समाज का सामना करना और अपनी उजड़ी हुई जिंदगी को दोबारा पटरी पर लाना है। (Rehabilitation of Acquitted Persons) के लिए हमारे समाज में बहुत कम जगह है। जिस बेटे पर मां की हत्या का कलंक लगा हो, उसे बेगुनाही के बाद भी सम्मान पाना मुश्किल होता है। उम्मीद है कि अदालत के इस फैसले के बाद समाज उन्हें अपनी मुख्यधारा में वापस स्वीकार करेगा और वे शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत कर पाएंगे

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