Jharkhand High Court: हाईकोर्ट ने अवैध खनन और जहरीली हवा पर सरकार को घेरा, 11 फरवरी तक मांगा पूरा हिसाब
Jharkhand High Court: झारखंड की धरती से निकलने वाले खनिज संसाधनों की लूट और उससे बिगड़ते पर्यावरण को लेकर झारखंड हाईकोर्ट ने बेहद सख्त रुख अख्तियार किया है। राज्य में जारी अवैध खनन और बेकाबू होते वायु प्रदूषण पर अंकुश लगाने के लिए अदालत ने राज्य सरकार से जवाब तलब किया है। चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद की खंडपीठ ने (Environment Protection Laws in Jharkhand) मामले की गंभीरता को देखते हुए सरकार से स्पष्ट पूछा है कि आखिर इस विनाशकारी खेल को रोकने के लिए अब तक क्या ठोस कदम उठाए गए हैं। अदालत की इस सक्रियता ने राज्य के प्रशासनिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है।

11 फरवरी तक सरकार को देना होगा हलफनामा
अदालत (Jharkhand High Court) ने इस संवेदनशील मामले की अगली सुनवाई के लिए 11 फरवरी की तारीख मुकर्रर की है। तब तक राज्य सरकार को विस्तृत जवाब दाखिल कर यह बताना होगा कि (State Government Accountability in Mining) जमीनी स्तर पर अवैध उत्खनन को रोकने के लिए क्या तंत्र विकसित किया गया है। यह आदेश ग्रामीण एकता मंच द्वारा दायर की गई एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान आया है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि धनबाद और उसके आसपास के क्षेत्रों में खुलेआम नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं, जिससे आम जनता का जीना मुहाल हो गया है।
बीसीसीएल ने झाड़ा पल्ला, जिम्मेदारी सरकार पर डाली
सुनवाई के दौरान भारत कोकिंग कोल लिमिटेड (BCCL) ने अपना पक्ष रखते हुए कोर्ट को आश्वस्त करने की कोशिश की कि उनकी ओर से सभी कार्य कानूनी दायरे में रहकर किए जा रहे हैं। कंपनी ने स्पष्ट रूप से कहा कि वह किसी भी प्रकार के अवैध खनन में संलिप्त नहीं है और (Coal Mining Regulations India) का पूरी तरह पालन कर रही है। हालांकि, बीसीसीएल ने एक महत्वपूर्ण तर्क देते हुए कहा कि अवैध खनन की गतिविधियों को रोकना और उन पर नियंत्रण पाना मुख्य रूप से राज्य सरकार की जिम्मेदारी है। कंपनी के इस बयान ने गेंद अब सीधे सरकार के पाले में डाल दी है।
जहरीली हवा का बनेगा ‘फैक्ट टेबल और चार्ट’
हाईकोर्ट ने केवल मौखिक दलीलों पर भरोसा न करते हुए वैज्ञानिक डेटा की मांग की है। खंडपीठ ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया है कि वायु प्रदूषण की भयावहता को साबित करने के लिए (Air Quality Index Tracking) से संबंधित तथ्यात्मक आंकड़े जुटाए जाएं। इन आंकड़ों को टेबल और चार्ट के माध्यम से अदालत के समक्ष प्रस्तुत करने को कहा गया है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि नियमों की अनदेखी कर की जा रही ढुलाई से हवा कितनी जहरीली हो चुकी है। कोर्ट का यह आदेश वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर न्याय सुनिश्चित करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
धनबाद और आसपास के इलाकों में नारकीय जीवन
याचिका में मुख्य रूप से धनबाद और उसके सटे हुए कोयला क्षेत्रों की दुर्दशा का वर्णन किया गया है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि खनिज पदार्थों की ढुलाई के दौरान (Illegal Mineral Transportation Issues) की वजह से सड़कों पर धूल का गुबार छाया रहता है। बिना ढके ट्रकों से होने वाली कोयले की ढुलाई न केवल नियमों का उल्लंघन है, बल्कि यह फेफड़ों की गंभीर बीमारियों का कारण भी बन रही है। याचिकाकर्ता ने अदालत से गुहार लगाई है कि इन अवैध गतिविधियों पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाई जाए ताकि आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित पर्यावरण मिल सके।
खनिज संपदा की लूट और प्रशासनिक विफलता
झारखंड जैसे संसाधन संपन्न राज्य में अवैध खनन एक नासूर बन चुका है, जो न केवल राजस्व की हानि कर रहा है बल्कि पारिस्थितिकी तंत्र को भी नष्ट कर रहा है। अदालत ने इस बात पर चिंता जताई है कि (Administrative Oversight in Mining) के अभाव में माफिया तत्व सक्रिय हैं। बिना लीज और बिना पर्यावरण क्लीयरेंस के हो रहे खनन से जंगलों का सफाया हो रहा है और जल स्रोत सूख रहे हैं। हाईकोर्ट अब यह सुनिश्चित करना चाहता है कि सरकार केवल कागजों पर योजनाएं न बनाए, बल्कि धरातल पर अपराधियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई नजर आए।
नियमों को ताक पर रखकर हो रही खनिज ढुलाई
अदालत के समक्ष यह तथ्य भी रखा गया कि निजी ट्रांसपोर्टर्स और ठेकेदार अधिक मुनाफे के चक्कर में सुरक्षा मानकों की अनदेखी कर रहे हैं। खनिज पदार्थों की (Sustainable Mining Practices) को बढ़ावा देने के बजाय पुरानी और प्रदूषण फैलाने वाली तकनीकों का सहारा लिया जा रहा है। सड़कों पर क्षमता से अधिक लदे ट्रक न केवल प्रदूषण बढ़ा रहे हैं, बल्कि आए दिन होने वाली दुर्घटनाओं का सबब भी बन रहे हैं। हाईकोर्ट ने संकेत दिया है कि यदि सरकार संतोषजनक जवाब नहीं देती, तो सख्त दंडात्मक कार्रवाई के निर्देश दिए जा सकते हैं।
भविष्य की कार्ययोजना पर टिकी सबकी निगाहें
11 फरवरी को होने वाली सुनवाई झारखंड के पर्यावरण और खनिज नीति के लिए निर्णायक साबित हो सकती है। राज्य की जनता को उम्मीद है कि (Judicial Intervention for Pollution) के माध्यम से उन्हें स्वच्छ हवा में सांस लेने का अधिकार वापस मिलेगा। मुख्यमंत्री और संबंधित विभागों के लिए यह एक कड़ी परीक्षा है कि वे कोर्ट के सामने अपना पक्ष कैसे रखते हैं। क्या सरकार अवैध खनन के सिंडिकेट को तोड़ने में सफल होगी या प्रदूषण की मार झेल रही जनता को अभी और इंतजार करना होगा, यह आने वाला वक्त ही बताएगा।



