JharkhandHighCourt – लेक्चरर नियुक्ति पर पुरानी प्रक्रिया में दखल से कोर्ट का इनकार
JharkhandHighCourt – झारखंड हाईकोर्ट ने फिजिक्स विषय के लेक्चरर पद से जुड़ी एक पुरानी नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि दशकों से लागू चयन प्रक्रिया को अब पलटना न्यायोचित नहीं होगा।

पहले मामले में नियुक्ति विवाद पर हाईकोर्ट का रुख
झारखंड हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी की अदालत ने उस रिट याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें फिजिक्स लेक्चरर पद पर नियुक्ति को लेकर सवाल उठाए गए थे। अदालत ने कहा कि जिन शिक्षकों की नियुक्ति को चुनौती दी गई है, वे करीब 25 वर्षों से सेवा दे रहे हैं। ऐसे में इतने लंबे समय बाद इस प्रक्रिया में हस्तक्षेप करना न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं माना जा सकता।
याचिकाकर्ता की ओर से क्या दलील दी गई
याचिकाकर्ता ने अदालत के समक्ष यह दावा रखा कि उन्होंने मगध विश्वविद्यालय से प्रथम श्रेणी में एमएससी (फिजिक्स) की डिग्री हासिल की है। साथ ही यह भी कहा गया कि बिहार कॉलेज सेवा आयोग की अनुशंसा होने के बावजूद उन्हें जेएम कॉलेज, भुरकुंडा में लेक्चरर पद पर नियुक्ति नहीं दी गई। याचिका में आरक्षण नीति के उल्लंघन का आरोप भी लगाया गया और चयन प्रक्रिया को पक्षपातपूर्ण बताया गया।
हस्तक्षेपकर्ता ने कोर्ट को क्या जानकारी दी
मामले में हस्तक्षेपकर्ता के रूप में पेश हुए बिनोद कुमार सिंह ने अदालत को बताया कि संबंधित नियुक्ति विज्ञापन संख्या 1418/1994 के तहत हुई थी। उनके अनुसार, तीसरे पद के लिए केवल एक ही रिक्ति थी, जिस पर आरक्षण का प्रावधान लागू नहीं होता था। उन्होंने यह भी जानकारी दी कि वे 19 अप्रैल 2000 से निरंतर सेवा में हैं और वर्ष 2011 में उनकी नियुक्ति की विधिवत पुष्टि हो चुकी है।
अदालत का स्पष्ट संदेश
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि जब आयोग द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया को उस समय वैध माना गया और वर्षों तक उस पर अमल भी होता रहा, तो अब इतने लंबे अंतराल के बाद यू-टर्न लेना उचित नहीं है। अदालत ने इस आधार पर याचिका को खारिज करते हुए लंबित सभी अंतरिम अर्जियों का भी निपटारा कर दिया।
दूसरे मामले में सीयूजे पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
इसी बीच झारखंड हाईकोर्ट ने एक अन्य मामले में सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ झारखंड से जुड़े प्रकरण पर कड़ा रुख अपनाया है। जस्टिस राजेश कुमार की अदालत ने पीएचडी प्रवेश से संबंधित याचिका की सुनवाई के दौरान विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होने का निर्देश दिया है। उन्हें गुरुवार सुबह 10:30 बजे पेश होने को कहा गया है।
शपथ पत्र को बताया गया भ्रामक
अदालत ने विश्वविद्यालय की ओर से दाखिल शपथ पत्र को प्रथम दृष्टया झूठा और भ्रामक माना है। यह टिप्पणी इंटरनेशनल रिलेशंस विभाग में शैक्षणिक सत्र 2023-24 की पीएचडी प्रवेश नीति को लेकर की गई। याचिकाकर्ता अमित कुमार चौबे ने इस नीति को चुनौती दी है और चयन प्रक्रिया में अनियमितताओं का आरोप लगाया है।
सीट मैट्रिक्स को लेकर उठे सवाल
यूनिवर्सिटी ने 22 अगस्त 2025 को दाखिल पूरक शपथ पत्र में दावा किया था कि संबंधित सत्र में ओबीसी वर्ग की तीन सीटें खाली थीं, जिन्हें सामान्य वर्ग को नहीं दिया जा सकता था और इसलिए उन्हें अगले सत्र के लिए कैरी फॉरवर्ड कर दिया गया। इसके विपरीत, याचिकाकर्ता ने 13 नवंबर 2025 को दाखिल शपथ पत्र में विस्तृत सीट मैट्रिक्स पेश किया, जिसमें कुल छह सीटों का उल्लेख था। इसमें एससी की एक सीट, एसटी की कोई सीट नहीं, ओबीसी की चार सीटें, ईडब्ल्यूएस की कोई सीट नहीं और यूआर वर्ग की एक सीट दर्शाई गई थी।
अगली सुनवाई पर टिकी निगाहें
हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणियों के बाद अब इस मामले में विश्वविद्यालय प्रशासन की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। रजिस्ट्रार की व्यक्तिगत उपस्थिति के बाद अदालत इस पूरे विवाद पर आगे की दिशा तय करेगी।



