स्वास्थ्य

Causes of afternoon slump after lunch: जानें लंच के बाद क्यों भारी होने लगती हैं पलकें, आलस नहीं बल्कि शरीर का ‘पावर गेम’ है असली वजह…

Causes of afternoon slump after lunch: दोपहर का खाना खाते ही पलकों का भारी होना, दिमाग का सुस्त पड़ जाना और काम करने की प्रेरणा में अचानक कमी आना एक ऐसी स्थिति है जिससे लगभग हर कामकाजी व्यक्ति जूझता है। अक्सर लोग इसे अपनी इच्छाशक्ति की कमी या केवल आलस मान लेते हैं, लेकिन मेडिकल साइंस के नजरिए से यह (Physiological changes after eating) का एक हिस्सा है। डॉक्टरों का स्पष्ट कहना है कि लंच के बाद महसूस होने वाली यह झपकी महज आपकी कल्पना नहीं है, बल्कि भोजन के बाद शरीर के भीतर होने वाले वास्तविक परिवर्तनों का परिणाम है।

Causes of afternoon slump after lunch
Causes of afternoon slump after lunch

क्या कहते हैं सेहत के जानकार और विशेषज्ञ

शारदा केयर हेल्थसिटी के सीनियर कंसल्टेंट और जनरल मेडिसिन्स डॉ. नीरज कुमार के अनुसार, दोपहर के भोजन के बाद एकाग्रता में कमी आना एक सामान्य जैविक प्रक्रिया है। कई बार लोग सिर भारी होने और आंखों के बंद होने की शिकायत करते हैं, जिसे समाज में काम से बचने की आदत के रूप में देखा जाता है। हालांकि, (Biological response to food intake) को समझना जरूरी है क्योंकि यह स्थिति किसी गंभीर बीमारी का संकेत होने के बजाय शरीर की प्राकृतिक कार्यप्रणाली का एक हिस्सा मात्र है जिसे सही आदतों से नियंत्रित किया जा सकता है।

पाचन प्रक्रिया और शरीर की ऊर्जा का वितरण

जैसे ही हम भोजन ग्रहण करते हैं, हमारे शरीर की प्राथमिकता बदल जाती है और सारा ध्यान पाचन पर केंद्रित हो जाता है। डॉ. नीरज बताते हैं कि पेट और आंतों को भोजन के विघटन के लिए अधिक ऊर्जा और रक्त के प्रवाह की आवश्यकता होती है। इस दौरान (Digestive system energy demand) बढ़ने की वजह से मस्तिष्क और शरीर के अन्य हिस्सों की ऊर्जा कुछ समय के लिए पाचन तंत्र की ओर मुड़ जाती है। इसी कारण दिमाग को मिलने वाली तात्कालिक ऊर्जा में कमी महसूस होती है और हमें सुस्ती व नींद का एहसास होने लगता है।

बॉडी क्लॉक और सर्कैडियन रिदम का प्रभाव

सुस्ती के पीछे हमारी आंतरिक जैविक घड़ी यानी सर्कैडियन रिदम का भी हाथ होता है। पूरे दिन के दौरान शरीर की सतर्कता का स्तर एक जैसा नहीं रहता और दोपहर के समय, विशेष रूप से दो से चार बजे के बीच, (Circadian rhythm dip in alertness) स्वाभाविक रूप से होता है। इस विशिष्ट समय अंतराल में यदि भारी भोजन किया जाए, तो शरीर की थकान और नींद आने की प्रवृत्ति कई गुना बढ़ जाती है। यही कारण है कि लंच के बाद ऑफिस या घर पर काम करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।

कार्बोहाइड्रेट और शुगर लेवल का खतरनाक खेल

हम क्या खा रहे हैं, इसका सीधा असर हमारी ऊर्जा के स्तर पर पड़ता है। अत्यधिक तला-भुना, बहुत अधिक मीठा या कार्बोहाइड्रेट से भरपूर भोजन करने से रक्त में शर्करा का स्तर तेजी से बढ़ता है। शुरुआत में भले ही आपको ऊर्जा महसूस हो, लेकिन जल्द ही (Blood sugar fluctuations and fatigue) की प्रक्रिया शुरू हो जाती है और शुगर लेवल गिरते ही शरीर बुरी तरह थक जाता है। इसके विपरीत, एक संतुलित आहार शरीर को लंबे समय तक स्थिर ऊर्जा प्रदान करने में सक्षम होता है।

अधूरी नींद और शारीरिक निष्क्रियता की भूमिका

दोपहर की सुस्ती उन लोगों के लिए और भी भारी हो जाती है जिनकी रात की नींद पूरी नहीं होती। जब शरीर रात में पर्याप्त विश्राम नहीं कर पाता, तो वह दोपहर के भोजन के बाद (Impact of sleep deprivation) को कम करने के लिए झपकी लेने की कोशिश करता है। इसके साथ ही, लंबे समय तक एक ही जगह बैठे रहने और शारीरिक गतिविधि की कमी से मेटाबॉलिज्म धीमा पड़ जाता है, जिससे आलस और सुस्ती का अनुभव और अधिक बढ़ जाता है।

सुस्ती को मात देने के लिए जीवनशैली में बदलाव

डॉ. नीरज कुमार के मुताबिक, दोपहर की नींद को मात देने के लिए भारी भोजन के बजाय हल्का और संतुलित आहार लेना सबसे बेहतरीन उपाय है। अपने लंच में प्रोटीन, फाइबर और हरी सब्जियों को प्राथमिकता दें। भोजन के तुरंत बाद (Post meal physical activity) के रूप में 5 से 10 मिनट की हल्की वॉक करना पाचन को तेज करता है और मस्तिष्क को सतर्क रखने में मदद करता है। जीवनशैली में यह छोटा सा बदलाव आपकी उत्पादकता को कई गुना बढ़ा सकता है।

हाइड्रेशन और डॉक्टर की सलाह कब है जरूरी

दिन भर पर्याप्त मात्रा में पानी पीना शरीर को हाइड्रेटेड रखता है और विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने में मदद करता है। हालांकि, यदि पर्याप्त नींद और सही खान-पान के बावजूद आपको (Excessive daytime sleepiness symptoms) महसूस होती है या कमजोरी बनी रहती है, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऐसी स्थिति में यह किसी आंतरिक स्वास्थ्य समस्या का संकेत हो सकता है और विशेषज्ञ डॉक्टर से परामर्श लेना अनिवार्य हो जाता है ताकि समय रहते सही उपचार किया जा सके।

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